Startups के लिए राजधानी बन पाएगी पहली पसंद? एक फाउंडर ने ही बता दिया किन मामलों में दिल्ली है बेंगलुरु से बेहतर

लॉन्ड्री स्टार्टअप Uclean के फाउंडर अरुणाभ सिन्हा ने लिंक्डइन पर लिखा कि दिल्ली-एनसीआर (Delhi NCR) को अक्सर सोशल मीडिया पर नफरत झेलनी पड़ती है, लेकिन अब यहां तेजी से स्टार्टअप कल्चर (Startup Culture) पनप रहा है. उनका मानना है कि सही नीयत और तैयारी के साथ दिल्ली, इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure), टैलेंट (Talent) और अकादमिक (Academia) के दम पर जल्द ही बेंगलुरु (Bengaluru) को पीछे छोड़ सकती है.
Startups के लिए राजधानी बन पाएगी पहली पसंद? एक फाउंडर ने ही बता दिया किन मामलों में दिल्ली है बेंगलुरु से बेहतर

दिल्ली-एनसीआर को लेकर सोशल मीडिया पर जितनी नफरत मिलती है, शायद ही किसी और मेट्रो सिटी को मिलती हो. यहां के लोग, कल्चर, ट्रैफिक और अब तो स्टार्टअप ईकोसिस्टम (Startup Ecosystem) तक को अक्सर ट्रोल किया जाता है.

लेकिन अरुणाभ सिन्हा की कहानी कुछ और ही कहती है. बिहार के रहने वाले और मुंबई में 7 साल बिताने के बाद, जब वह सितंबर 2010 में दिल्ली आए तो उन्होंने भी शहर को नापसंद किया. पर धीरे-धीरे दिल्ली ने उन्हें अपनाया. इसी शहर ने उन्हें प्यार दिया, पहला घर और कार दिलाई और पहली बार स्टार्टअप शुरू करने का मौका भी दिया.

दिल्ली की स्टार्टअप पॉलिसी और बड़ा सपना

इसी महीने से दिल्ली सरकार ने अपनी नई Startup Policy 2025 पेश की है. इस पॉलिसी का सबसे बड़ा विजन है दिल्ली को सिलिकॉन वैली जैसा बनाना. दिल्ली सरकार 2035 तक दिल्ली को तमाम स्टार्टअप के लिए पहली पसंद बनाना चाहती है. बता दें कि अभी बेंगलुरु को भारत का सिलिकॉन वैली कहा जाता है, जो स्टार्टअप्स का हब है.

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लॉन्ड्री स्टार्टअप यूक्लीन (Uclean) के फाउंडर अरुणाभ सिन्हा के मुताबिक, अगर आप पॉलिसी को ध्यान से पढ़ें तो दिल्ली सरकार का इरादा बिल्कुल साफ दिखता है. यह पॉलिसी न केवल निवेश आकर्षित करने के लिए बनी है, बल्कि अकेडेमिक्स और इंडस्ट्री को जोड़ने की भी कोशिश है.

क्यों दिल्ली आगे निकल सकती है बेंगलुरु से?

अरुणाभ सिन्हा ने अपने पोस्ट में कई अहम कारण गिनाए हैं, जिनसे दिल्ली स्टार्टअप राजधानी बन सकती है.

1- दिल्ली का इंफ्रास्ट्रक्चर

बेंगलुरु की सबसे बड़ी समस्या है ट्रैफिक. वहां गाड़ियां घंटों जाम में फंसी रहती हैं. इसके मुकाबले दिल्ली का ट्रैफिक भले खराब हो, लेकिन चलता जरूर है. मेट्रो नेटवर्क और सड़कों का फैलाव दिल्ली को बढ़त देता है.

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2- टैलेंट पूल

बेंगलुरु में काम करने वाला बड़ा हिस्सा पूर्वी भारत से आता है. अगर दिल्ली मजबूत ईकोसिस्टम बना ले तो यही टैलेंट दिल्ली को चुनेगा, क्योंकि दिल्ली पास भी है और सांस्कृतिक रूप से भी ज्यादा करीब.

3- भाषा की आजादी

दिल्लीवालों को चाहे जितना तेज और बिंदास कह लें, लेकिन यहां किसी पर भाषा थोपने का दबाव नहीं है. न हिंदी जानने की मजबूरी, न किसी और बोली का दबाव. यह ओपन कल्चर स्टार्टअप्स के लिए सही माहौल देता है.

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4- बेहतर अकेडेमिक सिस्टम

दिल्ली के स्कूल और यूनिवर्सिटीज पहले से ही मजबूत हैं. अगर इन्हें इंडस्ट्री से जोड़ा गया तो यहां से सीधे स्कूल ड्रॉपआउट्स भी उद्यमी बनकर निकलेंगे.

फैक्टरदिल्ली (Delhi)बेंगलुरु (Bengaluru)
ट्रैफिकजाम है लेकिन चलता हैजाम पूरी तरह ठहर जाता है
टैलेंटपूर्वी भारत से सीधा कनेक्शनपूर्वी भारत का आकर्षण लेकिन दूरी ज्यादा
भाषाकोई थोपने का दबाव नहींलोकल भाषा को लेकर बहस होती रहती है
शिक्षाDU, JNU, IIT Delhi जैसे बड़े संस्थानIIMB, IISc, कुछ प्राइवेट यूनिवर्सिटीज
इंफ्रास्ट्रक्चरमेट्रो, सड़कों का मजबूत नेटवर्कपब्लिक ट्रांसपोर्ट कमज़ोर

'बेंगलुरु वाली गलती मत दोहराना'

सिन्हा का मानना है कि दिल्ली को सबसे ज्यादा सतर्क रहना होगा. जैसे बेंगलुरु दबाव झेल नहीं पा रहा और टूटने की कगार पर है, वैसे ही अगर दिल्ली ने तैयारी नहीं की तो वही हाल यहां भी हो सकता है. खासकर, ब्यूरोक्रेसी (Bureaucracy) को कंट्रोल में रखना होगा. अगर सरकारी लालफीताशाही बढ़ी तो पॉलिसी का फायदा आधा हो जाएगा.

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