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स्टार्टअप की दुनिया में आपने फिनटेक, हेल्थटेक या एग्रीटेक जैसे नाम तो सुने होंगे, लेकिन क्या कभी "स्टील्थ स्टार्टअप" (Stealth Startup) के बारे में सुना है? ये ऐसे स्टार्टअप होते हैं जो शुरुआत में पूरी तरह चुपचाप काम करते हैं, ताकि उनका आइडिया या प्रोडक्ट कोई कॉपी न कर सके. आइए जानते हैं कैसे काम करते हैं ये स्टार्टअप.
स्टील्थ स्टार्टअप (Stealth Startup) ऐसे स्टार्टअप होते हैं जो लॉन्च के शुरुआती कुछ सालों तक सीक्रेट मोड में काम करते हैं. यानी न कोई प्रमोशन, न कोई पब्लिसिटी, न ही सोशल मीडिया पर कोई चर्चा. वह अपने आइडिया को छुपाकर रखते हैं ताकि कोई और कंपनी उनके प्रोडक्ट को कॉपी न कर सके. अक्सर ये स्टार्टअप शुरुआती फंडिंग भी नहीं लेते ताकि उनकी पहचान बाहर न जाए.
मुख्य वजह होती है कंपीटीशन से बचना (Competition Protection). अगर कोई स्टार्टअप किसी नए या यूनिक प्रोडक्ट पर काम कर रहा है, तो उसे डर होता है कि कोई और उसका आइडिया चुरा न ले. इसलिए ये कंपनियां अपने प्रोजेक्ट, टीम, या क्लाइंट्स के बारे में कोई जानकारी शेयर नहीं करतीं. कई बार तो इनकी टीम Non-Disclosure Agreement (NDA) साइन करती है ताकि अंदर की बात बाहर न जाए.
मान लीजिए किसी कंपनी के पास ऐसा आइडिया है जो मार्केट में क्रांति ला सकता है. अगर ये आइडिया किसी और को पहले पता चल जाए, तो वो बड़ी कंपनी उसे कॉपी करके जल्दी लॉन्च कर सकती है. ऐसे में असली इनोवेटर को नुकसान हो जाता है. इसलिए स्टील्थ स्टार्टअप तब तक पब्लिक नहीं होते जब तक उनका प्रोडक्ट पूरी तरह तैयार न हो जाए या पेटेंट (Patent) सुरक्षित न हो जाए.
इन स्टार्टअप्स का इंटरनेट पर नाम तो होता है, लेकिन असली काम छुपा रहता है. कई बार वेबसाइट पर सिर्फ इतना लिखा होता है- “हम एक नया प्रोडक्ट बना रहे हैं जो लोगों की जिंदगी आसान करेगा.” कुछ कंपनियां तो अपने असली नाम की जगह "Stealth Startup" ही लिख देती हैं. वेबसाइट लिंक की जगह ये कई बार विकीपीडिया का लिंक डाल देती हैं ताकि कोई यह न समझ पाए कि कंपनी कर क्या रही है.
जब कंपनी का प्रोडक्ट तैयार हो जाता है या उसे पेटेंट मिल जाता है, तब ये स्टार्टअप सार्वजनिक होते हैं. इसके बाद वे प्रेस रिलीज़, प्रमोशन और फंडिंग राउंड के जरिए मार्केट में आते हैं. तब जाकर लोगों को असली पता चलता है कि वो “रहस्यमयी कंपनी” असल में क्या बना रही थी. भारत में भी कई AI और DeepTech कंपनियां कुछ समय तक स्टील्थ मोड में रहकर बाद में लॉन्च हुई हैं.
आज के कॉम्पिटिटिव माहौल में इनोवेशन को प्रोटेक्ट रखना जरूरी हो गया है. टेक्नोलॉजी इतनी तेजी से बदल रही है कि आइडिया छिपाना भी एक बिजनेस स्ट्रेटेजी बन गया है. कई बड़े इन्वेस्टर्स भी अब स्टील्थ स्टार्टअप्स में पैसा लगाने लगे हैं क्योंकि उन्हें लॉन्ग टर्म रिटर्न की उम्मीद रहती है.
स्टील्थ स्टार्टअप्स वो होते हैं जो "बोलने से पहले करने" पर यकीन रखते हैं. ये चुपचाप काम करते हैं, अपने आइडिया को सुरक्षित रखते हैं और तभी सामने आते हैं जब उनकी तैयारी पूरी हो जाती है. भले ही ये तरीका रिस्क वाला हो, लेकिन अगर सही टाइम पर लॉन्च हो जाएं, तो ये स्टार्टअप अक्सर मार्केट के गेम-चेंजर साबित होते हैं.
ऐसा स्टार्टअप जो शुरुआती सालों में पब्लिक से छिपकर काम करता है ताकि उसका आइडिया कॉपी न हो.
नहीं, सिर्फ वही जो किसी यूनिक या इनोवेटिव आइडिया पर काम कर रहा हो.
जोखिम ज्यादा होता है, क्योंकि कंपनी की जानकारी सीमित होती है.
ये अपने प्रोडक्ट या सर्विस को लॉन्च के बाद उसे बेचकर रेवेन्यू कमाते हैं.
आमतौर पर तब तक जब तक प्रोडक्ट पूरी तरह तैयार या पेटेंट सुरक्षित न हो जाए.
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