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कल्पना कीजिए कि आप लैब में जाते हैं, एक मशीन में अपना हाथ रखते हैं और पलक झपकते ही वह मशीन सबसे सुरक्षित नस चुनकर बिना किसी गलती के खून का नमूना ले लेती है. यह अब केवल साइंस-फिक्शन नहीं, बल्कि एक हकीकत है. डच स्टार्टअप Vitestro ने अपनी इस अत्याधुनिक तकनीक को पूरी दुनिया में ले जाने के लिए 70 मिलियन डॉलर (करीब 650 करोड़ रुपये) का भारी-भरकम फंड जुटाया है. आइए, इस तकनीक के पीछे की कहानी, इसकी कार्यप्रणाली और स्वास्थ्य सेवा पर इसके बड़े असर को विस्तार से समझते हैं.
किसी भी बड़े अविष्कार के पीछे अक्सर एक व्यक्तिगत अनुभव होता है. विटेस्ट्रो के को-फाउंडर और सीईओ टून ओवरबीक (Toon Overbeeke) को इस मशीन का विचार तब आया जब उनके एक दोस्त के पिता को कीमोथेरेपी के दौरान बार-बार सुई चुभाने के दर्द से गुजरना पड़ा. नस न मिल पाने के कारण उन्हें बार-बार पंक्चर (Puncture) किया जाता था. टून ने सोचा, "क्या तकनीक के जरिए इस प्रक्रिया को बेहतर नहीं बनाया जा सकता?" बस यहीं से 2017 में विटेस्ट्रो की नींव पड़ी.
इस डिवाइस का नाम Aletta® है, जिसे 'ऑटोनॉमस रोबोटिक फ्लेबोटोमी डिवाइस' (ARPD™) कहा जाता है. यह कोई साधारण मशीन नहीं है, बल्कि यह तीन बड़ी तकनीकों का संगम है:
मल्टीमॉडल इमेजिंग (Multimodal Imaging): यह मशीन इंफ्रारेड और अल्ट्रासाउंड तकनीक का उपयोग करती है ताकि त्वचा के नीचे की नसों का 3D मैप तैयार किया जा सके.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): AI यह तय करता है कि कौन सी नस खून निकालने के लिए सबसे सटीक और सुरक्षित है.
एडवांस्ड रोबोटिक्स: रोबोटिक आर्म बहुत ही सूक्ष्मता के साथ सुई को नस के भीतर डालती है और सैंपल कलेक्ट करती है.
प्रक्रिया: मरीज मशीन के पास बैठता है, अपनी पहचान वेरिफाई करता है और अपना हाथ मशीन में रखता है. इसके बाद मशीन खुद टूनिकेट (Tourniquet) लगाती है, नस ढूंढती है और खून निकालकर ट्यूब को इनवर्ट (मिक्स) भी कर देती है.
ताजा फंडिंग में कंपनी ने 70 मिलियन डॉलर जुटाए हैं. विटेस्ट्रो ने अब तक कुल 104 मिलियन डॉलर जुटाए हैं. इस बार के 'Series B' राउंड में दुनिया के नामी संस्थानों ने पैसा लगाया है:
दिग्गज निवेशक: मेयो क्लिनिक (Mayo Clinic), लैबकॉर्प (Labcorp), सटर हेल्थ और सोन्डर कैपिटल.
फंड का उपयोग: इस पैसे का इस्तेमाल अमेरिका में FDA (De Novo) रेगुलेटरी अप्रूवल पाने, बड़े पैमाने पर निर्माण (Manufacturing) शुरू करने और यूरोप के बाहर विस्तार करने के लिए किया जाएगा.
आज पूरी दुनिया में अस्पतालों और लैब में फ्लेबोटोमिस्ट (Phlebotomists) यानी खून निकालने वाले विशेषज्ञों की भारी कमी है.
स्टाफ की कमी: अकेले अमेरिका में क्लीनिकल लैब में कर्मचारियों की भारी कमी है, जिससे मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है.
इनकंसिस्टेंसी (Variability): हर इंसान की सुई चुभाने की कला अलग होती है. कोई बिना दर्द के निकाल लेता है, तो किसी से बार-बार गलती होती है. रोबोट इस 'मानवीय त्रुटि' को खत्म कर देता है.
70% क्लिनिकल निर्णय: मेडिकल रिपोर्ट के 70% फैसले ब्लड टेस्ट पर आधारित होते हैं, इसलिए इस प्रक्रिया का सटीक और तेज होना बेहद जरूरी है.
विटेस्ट्रो की यह सफलता केवल एक स्टार्टअप की जीत नहीं है, बल्कि यह भविष्य की उस चिकित्सा प्रणाली की झलक है जहाँ मशीनें और इंसान मिलकर काम करेंगे. 70 मिलियन डॉलर की यह फंडिंग न केवल रोबोट्स को क्लिनिक तक पहुंचाएगी, बल्कि उन अरबों मरीजों को एक सुरक्षित और दर्द-मुक्त अनुभव देगी जो हर साल ब्लड टेस्ट करवाते हैं. क्या आप अगली बार अपना ब्लड टेस्ट किसी रोबोट से करवाना चाहेंगे?
1- क्या विटेस्ट्रो का रोबोट भारत में उपलब्ध है?
फिलहाल यह यूरोप में तैनात किया जा रहा है और अमेरिका में FDA की मंजूरी का इंतजार कर रहा है. भारत में इसके आने में कुछ समय लग सकता है.
2- क्या यह मशीन पूरी तरह सुरक्षित है?
हां, इसके क्लिनिकल ट्रायल में 3000 से अधिक मरीजों पर परीक्षण किया गया है और इसे CE मार्क (यूरोपीय सुरक्षा मानक) प्राप्त है.
3- क्या यह रोबोट मेरी नस ढूंढ पाएगा अगर वह मुश्किल से मिलती हो?
हां, इसमें अल्ट्रासाउंड और इंफ्रारेड इमेजिंग का उपयोग किया जाता है, जो उन नसों को भी देख सकती है जो इंसानी आँखों को नजर नहीं आतीं.
4- क्या इस मशीन के आने से लैब स्टाफ की नौकरियां चली जाएंगी?
नहीं, यह मशीन मौजूदा स्टाफ की कमी को भरने और रूटीन काम को आसान बनाने के लिए है, ताकि स्वास्थ्यकर्मी अधिक जटिल कार्यों पर ध्यान दे सकें.
5- इस फंडिंग राउंड में किन बड़े नामों ने निवेश किया है?
मेयो क्लिनिक, लैबकॉर्प और सटर हेल्थ जैसे दुनिया के टॉप हेल्थकेयर लीडर्स ने इसमें निवेश किया है.
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