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साल 2021 में दो युवा उद्यमियों आदित्य कुमार (Aditya Kumar) और संकल्प माथुर (Sankalp Mathur) ने Niro की शुरुआत की थी. उस वक्त कंपनी का मकसद साफ था, हर कंज्यूमर इंटरनेट कंपनी को फाइनेंशियल सर्विस (financial service) से जोड़ना. उनका मॉडल बेहद अनोखा था.
ये एक B2B2C लेंडिंग प्लेटफॉर्म (B2B2C lending platform) था जो ई-कॉमर्स, गेमिंग या अन्य कंज्यूमर प्लेटफॉर्म्स को अपने यूजर को आसानी से लोन देने की सुविधा देता था. लेकिन सिर्फ 4 साल में कहानी पलट गई. कभी $100 मिलियन AUM (Assets Under Management) तक पहुंचने वाला ये स्टार्टअप आज इतिहास बन गया.
Niro की शुरुआत ऐसे समय में हुई थी जब भारत में डिजिटल लोनिंग सेक्टर (digital lending sector) बूम पर था. कंपनी का मॉडल सीधा था, जिन प्लेटफॉर्म (जैसे ट्रैवल, ई-कॉमर्स या गेमिंग ऐप्स) के पास करोड़ों यूजर हैं, उन्हें बैंक या NBFC से जोड़कर उन यूजर्स को लोन सर्विस ऑफर करवाना.
Niro के जरिए ₹50,000 से ₹7 लाख तक के लोन 6 से 72 महीने की अवधि के लिए दिए जाते थे. ब्याज दर 12% से 28% तक रहती थी. सिर्फ दो साल में ही कंपनी ने ₹100 मिलियन का AUM खड़ा कर लिया और 170 मिलियन से ज्यादा यूजर्स तक पहुंच गई.
Niro के बिजनेस मॉडल ने जल्दी ही इन्वेस्टर्स का ध्यान खींचा. कंपनी ने लगभग $20 मिलियन (करीब ₹166 करोड़) की फंडिंग जुटाई थी. इनमें से ज्यादातर निवेशकों ने कंपनी के मजबूत टेक मॉडल और स्केलेबिलिटी पर भरोसा जताया था. आइए जानते हैं किन-किन निवेशकों ने कंपनी में लगाए थे पैसे.
| निवेशक का नाम | देश | भूमिका |
|---|---|---|
| Elevar Equity | भारत | लीड इन्वेस्टर |
| GMO Venture Partners | जापान | पार्टिसिपेटिंग इन्वेस्टर |
| Rebright Partners | सिंगापुर | सीरीज राउंड इन्वेस्टर |
| Mitsui Sumitomo Insurance VC | जापान | स्ट्रैटेजिक इन्वेस्टर |
| Innoven Capital | भारत | डेट इन्वेस्टर |
सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन 2023 के बाद हालात बदलने लगे. भारत में रेगुलेटरी सख्ती (regulatory tightening) बढ़ गई. RBI ने डिजिटल लोनिंग प्लेटफॉर्म्स के लिए नए नियम लागू किए, जिनके तहत बैंक और NBFC के बीच के सभी पार्टनरशिप लोन को पारदर्शी बनाना जरूरी हो गया.
क्लाइंट डेटा प्राइवेसी (data privacy) और क्रेडिट रिस्क (credit risk) की जिम्मेदारी तय की गई. इन बदलावों के बाद Niro के कई पार्टनर प्लेटफॉर्म्स ने अपनी लेंडिंग सर्विस रोक दी. दूसरी ओर, मार्केट में डिफॉल्ट (default) बढ़ने लगे और पूंजी जुटाना मुश्किल हो गया.
फाइनेंशियल रिपोर्ट बताती है कि Niro की स्थिति तेजी से खराब होती गई. वित्त वर्ष 2022-23 में कंपनी का रेवेन्यू 19.09 करोड़ रुपये रहा, जबकि कंपनी का घाटा 36.9 करोड़ रुपये हो गया. वहीं वित्त वर्ष 2023-24 में कंपनी का रेवेन्यू 7.86 करोड़ रुपये रहा, जबकि नुकसान 48.7 करोड़ रुपये हो गया. यानी रेवेन्यू का करीब 7 गुना नुकसान.
सिर्फ एक साल में कंपनी का रेवेन्यू 59% गिर गया, जबकि घाटा और बढ़ गया. कंपनी का FY25 का डेटा अभी जारी नहीं हुआ है, लेकिन संकेत साफ हैं कि कंपनी लोन रिकवरी और पार्टनरशिप दोनों में संघर्ष कर रही है.
कंपनी के फाउंडर आदित्य कुमार ने सोशल मीडिया पर कंपनी बंद करने का ऐलान किया. उन्होंने लिखा- “ये सफर बेहद कठिन लेकिन सीख देने वाला रहा. अगर मौका मिला तो मैं ये सब फिर से करना चाहूंगा.” उन्होंने टीम, पार्टनर्स और इन्वेस्टर्स का धन्यवाद किया और कहा कि Niro ने इंडस्ट्री में जो मॉडल बनाया, वो आने वाले समय में कई कंपनियों को प्रेरित करेगा.
Niro का बंद होना फिनटेक इंडस्ट्री के लिए एक चेतावनी है.भारत में हजारों लोन ऐप्स और प्लेटफॉर्म्स चल रहे हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ही RBI रेगुलेशन के अनुरूप हैं. इस घटना से ये साफ है कि सस्टेनेबल यूनिट इकॉनॉमिक्स (sustainable unit economics) और क्लियर रेगुलेटरी कॉम्प्लायंस (regulatory compliance) के बिना अब फिनटेक कंपनियां टिक नहीं पाएंगी.
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में कई छोटे डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म्स या तो बंद होंगे या मर्ज होंगे. हालांकि, मजबूत कंपनियां जो क्रेडिट अंडरराइटिंग (credit underwriting) और फ्रॉड डिटेक्शन (fraud detection) में बेहतर हैं, उनके लिए अभी भी बहुत स्कोप है.
Niro की कहानी ये सिखाती है कि सिर्फ आइडिया और फंडिंग काफी नहीं होती. फिनटेक सेक्टर में रेगुलेशन, ट्रस्ट और डेटा सेफ्टी अब सफलता की नई कुंजी हैं. 4 साल का ये सफर भले खत्म हो गया हो, लेकिन इसने भारत के डिजिटल लोनिंग ईकोसिस्टम में एक गहरी छाप जरूर छोड़ी है.
हां, अगर वो लोन या पेमेंट सर्विस ऑफर करता है.
नहीं, लेकिन अब इसे रेगुलेटेड फ्रेमवर्क में चलना होगा.
हां, उनका निवेश अक्सर डूब जाता है.
कुछ के पास होते हैं, जैसे इंश्योरेंस या डेटा एनालिटिक्स.
नहीं, उन्हें किसी NBFC या बैंक से पार्टनरशिप करनी होती है.
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