Shark Tank India 5: 17 साल तक की रिसर्च, बना दिया गजब का डिवाइस, खुद हिलने लगती हैं उंगलियां, चलने लगते हैं पैर

Shark Tank India 5 में डॉक्टर पराग गड़ का स्टार्टअप Vivatronix और उसका डिवाइस xStep शार्क्स के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं रहा. 17 साल की रिसर्च से बना यह डिवाइस बिना सर्जरी सेरेब्रल पालसी और स्पाइनल कॉर्ड इंजरी में मदद करता है. तीन शार्क्स ने 1 करोड़ रुपये की फंडिंग दी.
Shark Tank India 5: 17 साल तक की रिसर्च, बना दिया गजब का डिवाइस, खुद हिलने लगती हैं उंगलियां, चलने लगते हैं पैर

कहते हैं कि कोई ग्रेट चीज बनाने में वक्त लगता है. एक ऐसा ही ग्रेट प्रोडक्ट लेकर एक फाउंडर पहुंचे शार्क टैंक इंडिया के पांचवें सीजन (Shark Tank India 5) में. पेशे से डॉक्टर इस स्टार्टअप (Startup) फाउंडर ने करीब 17 सालों तक रिसर्च की और फिर बनाया एक ऐसा प्रोडक्ट, जिसे देखने को बाद तमाम शार्क हैरान रह गए. सभी ने कहा कि फाउंडर जो काम कर रहे हैं, वह बहुत ही ग्रेट है.

इस स्टार्टअप का नाम है Vivatronix, जिसकी शुरुआत की है बेंगलुरु के डॉक्टर पराग गड़ (Parag Gad). इसके तहत उन्होंने xStep नाम का एक गजब का डिवाइस बनाया है, जो किसी रिवॉल्यूशन से कम नहीं है. डॉक्टर ने मंच पर आते ही एक कहानी से अपनी पिच की शुरुआत की. वह बोले- एक छोटी सी बच्ची है खुशी, जो 3 महीने की उम्र में अपना सिर नहीं हिला पाता थी, 9 महीने की उम्र में वह पैरों के बल चल नहीं पाती थी. वहीं 1 साल की उम्र में खड़े होकर चलना उसके लिए किसी सपने से कम नहीं था.

सेरेब्रल पालसी से पीड़ित बच्चों की मदद करेगा ये डिवाइस

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देश में ऐसे करीब 25 लाख बच्चे हैं, जो सेरेब्रल पालसी (Cerebral Palsy) से पीड़ित हैं. इसमें दिमाग से बॉडी तक सिग्नल नहीं पहुंच पाता है. इसकी वजह से बच्चों का शरीर ठीक से डेवलप नहीं हो पाता. xStep की मदद से सेरेब्रल पालसी और स्पाइनल कॉर्ड इंजरी को ठीक किया जा सकता है. अच्छी बात ये है कि इसमें किसी सर्जरी की जरूरत भी नहीं होती है.

कैसे काम करता है ये प्रोडक्ट?

इस डिवाइस को बॉडी के अपर और लोअर बैक पर लगाया जाता है. इसके बाद डिवाइस के जरिए स्पाइनल कॉर्ड को इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजती है, जिससे ब्रेन, स्पाइनल कॉर्ड और पैरों के कनेक्शन रीएक्टिवेट होते हैं और इससे आपकी मोबिलिटी बेहतर होती है. फाउंडर ने कहा कि अभी इसमें और भी रिसर्च होनी बाकी है, जिससे और भी कई सॉल्यूशन निकल सकते हैं.

17 साल से कर रहे हैं इस टेक्नोलॉजी पर काम

पराग ने इस टेक्नोलॉजी को लॉस एंजेलिस से यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से अपनी पीएचडी प्रोग्राम के तहत डेवलप किया है. बता दें कि उन्होंने न्यूरो मॉड्युलेशन में अपनी पीएचडी की है. उन्होंने बताया कि वह पिछले 17 सालों से इस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं. भारत में 2023 में रीलोकेट हुए और जनवरी 2025 में उन्होंने कंपनी रजिस्टर की. सितंबर 2025 में ही फाउंडर ने इसे भारत में लॉन्च किया है, क्योंकि इससे पहले वह तमाम लाइसेंस और रेगुलेशन पर काम कर रहे थे.

दुनिया में इकलौती टेक्नोलॉजी, दूसरी कहीं नहीं

फाउंडर का दावा है कि यह अपनी तरह का पहला डिवाइस है और पूरी दुनिया में ऐसी कोई दूसरी टेक्नोलॉजी नहीं है. पराग ने बताया कि अभी तक इस डिवाइस से स्ट्रोक, स्पाइनल कॉर्ड इंजरी, मल्टिपल स्लेरोसिस और पार्किंसंस जैसी बीमारियों के मरीजों पर ट्रायल हो चुका है.

विनीता पर किया डेमो, खुद-ब-खुद हिलने लगीं उंगलियां

फाउंडर ने विनीता सिंह के हाथ पर मशीन को लगाकर उसका ट्रायल भी किया. उन्होंने फाउंडर को ये भी कहा कि वह ग्रेट काम कर रहे हैं. जब फाउंडर ने ये मशीन विनीता के हाथ में लगाई तो उनके हाथ की उंगलियां हिलने लगीं. फाउंडर ने कहा कि इसी तरह मसल्स को इस डिवाइस के जरिए कंट्रोल किया जाता है.

मशीन लगाते ही चलने लगा बच्चा, बैठने लगा शख्स

उन्होंने एक 4 साल के बच्चे पर यह डिवाइस लगाकर भी दिखाई. फाउंडर के अनुसार महज 5 मिनट में वह बच्चा खुद से पैर हिलाने लगा और चलने की कोशिश करने लगा, जो पहले नहीं चल पा रहा था. एक दूसरे शख्स का वीडियो भी उन्होंने दिखाया, जिसमें लेग इंजरी से परेशान एक शख्स ये डिवाइस लगाने के बाद पहले की तुलना में तेज चलने लगा. एक शख्स इस डिवाइस को लगाने के बाद आराम से बैठ पा रहा था, जिसे पहले ठीक से बैठने में दिक्कत होती थी.

कुणाल बोले- ये तो जादू है, पराग ने कहा- ये 17 साल का विज्ञान है

ये सब देखते ही कुणाल बहल बोले- यह तो जादू जैसा है. डॉक्टर पराग ने कहा कि ये 17 सालों का विज्ञान आपके सामने है. विराज बहल ने तो उनके काम के लिए बहुत बधाई दी. अभी तक 60 सेरेब्रल पालसी के बच्चों पर इसे टेस्ट किया है और 92 फीसदी इफिकेसी के साथ इस डिवाइस ने काम किया है. पार्किंसंस जैसी बीमारियों पर भी वह टेस्टिंग कर रहे हैं. डॉक्टर पराग का दावा है कि अभी इससे बहुत सारे सॉल्यूशन निकल सकते हैं, जिन पर रिसर्च जारी है और टेस्टिंग भी की जा रही है.

कितनी है प्रोडक्ट की कीमत, कितनी मिलती है वारंटी?

यह भारत में अभी 46 हजार रुपये में बनता है. जो आगे चलकर 20-25 हजार में बन सकता है. 3 हफ्तों में ही कंपनी ने करीब 3 लाख रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बेचा है. आने वाले 2 सालों में इसे 1 लाख रुपये तक लाने का प्लान है. फाउंडर इस प्रोडक्ट पर 3 साल की वारंटी देते हैं, लेकिन यह भी दावा कर रहे हैं कि अगले 5-6 साल तक यह चल सकते हैं.

कितनी मिली फंडिंग?

फाउंडर ने अपने स्टार्टअप की 1 फीसदी इक्विटी के लिए 1 करोड़ रुपये की फंडिंग मांगी. विराज ने कहा कि वह कोई वैल्यू ऐड नहीं कर सकते हैं, लेकिन वीबा फाउंडेशन उनसे 20 डिवाइस खरीदेगी और उन्हें जरूरतमंदों तक पहुंचाएगी. वरुण ने भी इस डील में हिस्सा नहीं लिया. आखिरकार कुणाल, विनीता और नमिता ने 10 फीसदी इक्विटी के बदले 1 करोड़ रुपये की फंडिंग दी. बता दें कि यह स्टार्टअप बूटस्ट्रैप्ड है और इसकी 90 फीसदी हिस्सेदारी इस डील के बाद भी डॉक्टर पराग के पास ही है.

Conclusion

Vivatronix की कहानी यह साबित करती है कि डीप-टेक और मेडिकल इनोवेशन में वक्त लगता है, लेकिन असर पीढ़ियों तक रहता है. 17 साल की रिसर्च से बना xStep सिर्फ एक प्रोडक्ट नहीं, बल्कि लाखों बच्चों और मरीजों के लिए उम्मीद है. Shark Tank में मिली फंडिंग से इस टेक्नोलॉजी को बड़े स्तर पर पहुंचाने का रास्ता खुल गया है.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. xStep डिवाइस क्या करता है?

यह डिवाइस इलेक्ट्रिकल सिग्नल के जरिए ब्रेन, स्पाइनल कॉर्ड और मसल्स के कनेक्शन को रीएक्टिवेट करता है.

Q2. किन बीमारियों में यह डिवाइस मदद करता है?

सेरेब्रल पालसी, स्पाइनल कॉर्ड इंजरी, स्ट्रोक, पार्किंसंस और मल्टिपल स्क्लेरोसिस में.

Q3. क्या इसमें सर्जरी की जरूरत होती है?

नहीं, यह पूरी तरह नॉन-इनवेसिव यानी बिना सर्जरी वाला डिवाइस है.

Q4. xStep की कीमत कितनी है?

अभी यह करीब 3 लाख रुपये में बिक रहा है, भविष्य में इसे सस्ता करने का प्लान है.

Q5. Shark Tank में कितनी फंडिंग मिली?

Vivatronix को 10% इक्विटी के बदले 1 करोड़ रुपये की फंडिंग मिली.

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