Shark Tank India-4: इस Startup पर बोले अमन-'आपको सरकार से अवॉर्ड मिलना चाहिए', हुई 3 शार्क डील, मिले ₹1 करोड़

शार्क टैंक इंडिया के चौथे सीजन (Shark Tank India Season 4) में एक ऐसा हेल्थकेयर स्टार्टअप (Startup) आया, जिसने बच्चों की एक बड़ी समस्या की ओर सबका ध्यान केंद्रित किया. इस समस्या का नाम है ऑटिज्म (autism), जिसमें बच्चों का बर्ताव बहुत बदल जाता है.
Shark Tank India-4: इस Startup पर बोले अमन-'आपको सरकार से अवॉर्ड मिलना चाहिए', हुई 3 शार्क डील, मिले ₹1 करोड़

शार्क टैंक इंडिया के चौथे सीजन (Shark Tank India Season 4) में एक ऐसा हेल्थकेयर स्टार्टअप (Startup) आया, जिसने बच्चों की एक बड़ी समस्या की ओर सबका ध्यान केंद्रित किया. इस समस्या का नाम है ऑटिज्म (autism), जिसमें बच्चों का बर्ताव बहुत बदल जाता है. वह अकेले रहने लगते है, गुस्सैल हो जाते हैं और बाकी बच्चों की तरह हर काम आसानी से नहीं कर पाते. इस स्टार्टअप का नाम है AI.gnosis, जिसकी शुरुआत की है जयपुर के रहने वाले 22 साल के दिव्यांश मंगल और 26 साल के रक्षित जैन ने.

फाउंडर्स का कहना है कि ऑटिज्म की समस्या बच्चों में सिर्फ 2 साल की उम्र में ही दिखने लग जाती है. ऐसे में हर बच्चे की स्क्रीनिंग जरूरी है, क्योंकि जितनी जल्दी इसका पता चलेगा, उतनी ही जल्दी बच्चे को मदद मिल सकेगी. फाउंडर्स के अनुसार भारत में हर साल करीब 2.5 करोड़ बच्चे पैदा होते हैं, जिनमें से 1.5 फीसदी को ऑटिज्म होता है. अधिकतर बच्चों में इसका पता ही नहीं चल पाता है, जिसकी वजह से वह कभी अपनी पूरी क्षमता से कोई काम नहीं कर पाते हैं.

700 रुपये में होता है टेस्ट

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अपने स्टार्टअप के जरिए ये स्टार्टअप ना सिर्फ डिटेक्शन टेस्ट ऑफर कर रहा है, बल्कि एक्सपर्ट से कंसल्टेशन भी बुक किया जा सकता है. फाउंडर्स का कहना है कि जिस टेस्ट को वह सिर्फ 5 मिनट में और महज 700 रुपये में कर रहे हैं, वह बाहर कराने पर 2-3 घंटे भी लगते हैं और उसमें करीब 5000 रुपये का खर्च भी आता है. बता दें कि अभी इस स्टार्टअप का प्रोडक्ट लॉन्च नहीं हुआ है, कुछ वक्त में लॉन्च होने वाला है.

देर से पता चलती है दिक्कत

फाउंडर्स ने कहा कि 7-7 साल पर माएं अपने बच्चों को डॉक्टर के पास ले जाती हैं. लोगों को लगता है कि बच्चा शर्मीला है, लेकिन ऐसा नहीं है. सबको लगता है बच्चा ठीक है और ऐसे ही देर हो जाती है. बता दें कि दिव्यांश और रक्षित दोनों के ही पिता बच्चों के डॉक्टर हैं. वहीं दोनों की मां भी डॉक्टर्स ही हैं.

रक्षित ने एआई से बीटेक किया है. वहीं दिव्यांश ने पहले बिट्स पिलानी से बैचलर और मास्टर्स की, उसके बाद यूरोप से एआई इन क्वाइंटम थ्योरी में रिसर्च की. दिव्यांश ने देखा कि उनकी रिसर्च बहुत खास है, लेकिन उसका इंपैक्ट बहुत छोटा है, जबकि वह 100 गुना इंपैक्ट करना चाहते हैं. ऐसे में जब वह भारत आए तो रक्षित के साथ मिलकर ये स्टार्टअप शुरू किया.

बड़े डॉक्टर हैं इन फाउंडर्स के मेंटर

इस स्टार्टअप का मॉडल भी डॉक्टर ने चेक किया है. फाउंडर्स ने बताया कि इंडियन कॉलेज ऑफ पीडिएट्रिक्स के वाइस चांसलर एस सीतारमन ने इस स्टार्टअप को वेरिफाई किया है, जो फाउंडर्स के मेंटर भी हैं. रक्षित बताते हैं कि दिव्यांश के पिता के चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर हैं, जहां 6-6 महीने का तो सिर्फ वेटिंग पीरियड होता है. ऐसे में ऑटिज्म की समस्या से निपटना आसान नहीं है.

कंपनी का मॉडल बी2बी है. वह 250 सेंटर्स के साथ जुड़े हैं. उन्होंने बताया कि डॉक्टर ही रिपोर्ट चेक करेंगे, कंसल्टेशन होगा और इसी रिपोर्ट से थेरेपी प्लान भी बनेंगे. कंपनी के बिजनेस मॉडल और काम करने के तरीके से तो शार्क सहमत नहीं हो पाए, लेकिन ऑटिज्म पर काम करने की दिशा में उठाया गया ये कदम सभी को अच्छा लगा.

अमन बोले- आपको तो सरकार से अवॉर्ड मिलना चाहिए

फाउंडर्स ने अपने इस स्टार्टअप के लिए 50 लाख रुपये फंडिंग मांगी और बदले में अपनी कंपनी की 4 फीसदी इक्विटी देने का ऑफर दिया. बता दें कि कंपनी को एक 55 लाख रुपये का ग्रांट भी मिला हुआ है. इस डील से नमिता और अनुपम तो आउट हो गए, लेकिन अमन, वरुण और पीयूष ने साथ मिलकर 8 फीसदी इक्विटी के बदले 1 करोड़ रुपये की फंडिंग दी. अमन गुप्ता ने तो यहां तक कहा कि आपको तो सरकार से अवॉर्ड मिलना चाहिए, अगर ये समस्या सॉल्व हो जाए तो.

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