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विज्ञान और तकनीक की दुनिया में अक्सर ऐसी खबरें आती हैं, जो किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसी लगती हैं. लेकिन अब यह हकीकत बनने जा रही है. कल्पना कीजिए कि सूरज डूब चुका है, रात हो गई है, लेकिन आप एक ऐप बटन दबाते हैं और आपके घर या खेत के ऊपर सूरज की रोशनी चमकने लगती है.
कैलिफोर्निया स्थित स्टार्टअप 'रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल' ठीक यही करने की योजना बना रहा है. इसे सोशल मीडिया पर "सनलाइट का उबर ईट्स" (Uber Eats of Sunlight) कहा जा रहा है. आइए, इस क्रांतिकारी और विवादित प्रोजेक्ट के हर छोटे-बड़े पहलू को विस्तार से समझते हैं.
रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जिसमें अंतरिक्ष में विशाल दर्पणों यानी शीशों वाले उपग्रहों (Satellites) का उपयोग किया जाएगा. ये उपग्रह रात के समय सूरज की रोशनी को मोड़कर धरती के उन हिस्सों पर भेजेंगे जहां अंधेरा हो चुका है. मांग के आधार पर (On-demand) धरती के किसी भी हिस्से को रोशन किया जाएगा.
यह विचार सुनने में जितना पेचीदा है, इसका सिद्धांत उतना ही सरल है- परावर्तन (Reflection).
सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट (Sun-Synchronous Polar Orbit): कंपनी अपने सैटेलाइट्स को धरती से लगभग 600 से 625 किलोमीटर ऊपर इस विशेष कक्षा में स्थापित करेगी. यह उपग्रह 'टर्मिनेटर लाइन' (दिन और रात की सीमा रेखा) के साथ यात्रा करेंगे.
हमेशा धूप में: इस ऊंचाई और स्थिति के कारण, जब धरती के नीचे वाले हिस्से में रात होगी, तब भी सैटेलाइट अंतरिक्ष में सूरज की रोशनी के संपर्क में रहेंगे.
विशाल दर्पण (Mylar Mirrors): प्रत्येक सैटेलाइट में हल्का, लेकिन मजबूत 'मायलर' (Mylar) मटेरियल से बना फोल्डिंग आईना होगा. इनका आकार 10 मीटर से लेकर 54 मीटर तक हो सकता है.
प्रोग्रामेबल रोटेशन: ये आईने मोटराइज्ड होंगे. ऐप से सिग्नल मिलते ही ये आईने एक निश्चित कोण (Angle) पर झुक जाएंगे और सीधे आपकी जीपीएस लोकेशन पर धूप को रिफ्लेक्ट कर देंगे.
ग्राहक रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के ऐप या वेबसाइट के जरिए सूरज की रोशनी के 'स्पॉटलाइट' की रिक्वेस्ट कर सकेंगे.
समय की सीमा: चूंकि ये सैटेलाइट लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में बहुत तेज गति से घूमते हैं, इसलिए एक सैटेलाइट एक बार में केवल 4 मिनट तक ही रोशनी दे पाएगा.
रोशनी का दायरा: धरती पर जो रोशनी पड़ेगी, वह लगभग 5 किलोमीटर (3 से 5 मील) व्यास का एक गोलाकार हिस्सा कवर करेगी.
कितनी तेज होगी रोशनी: इसकी चमक 0.8 से 2.3 लक्स (Lux) के बीच होगी. आसान भाषा में कहें तो यह एक पूर्णिमा के चांद (Full Moon) की चमक के बराबर या उससे 4 गुना ज्यादा तक हो सकती है.
कंपनी ने इस रोशनी के कई व्यावहारिक उपयोग बताए हैं:
सौर ऊर्जा (Solar Energy): सबसे बड़ा फायदा सोलर फार्म्स को होगा. रात में भी धूप मिलने से वे बिजली बनाना जारी रख सकेंगे, जिससे रिन्यूएबल एनर्जी की क्षमता बढ़ जाएगी.
कृषि (Agriculture): किसान अपनी फसलों के लिए प्रकाश चक्र (Lighting Cycles) को नियंत्रित कर सकेंगे.
आपातकालीन स्थिति (Disaster Relief): भूकंप या बाढ़ जैसी आपदाओं के समय राहत और बचाव कार्यों के लिए रात में रोशनी की व्यवस्था की जा सकेगी.
इंडस्ट्रियल ऑपरेशंस: दूरदराज के इलाकों में चल रहे निर्माण कार्यों या माइनिंग प्रोजेक्ट्स को रात में भी जारी रखा जा सकेगा.
इवेंट्स: बड़े आउटडोर इवेंट्स या सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए यह रोशनी का एक अनोखा जरिया बनेगा.
रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के सीईओ बेन नोवाक (Ben Nowack) ने इस सर्विस की कीमत और विस्तार की योजना का खुलासा किया है:
कीमत: कंपनी लगभग $5,000 (करीब ₹4.59 लाख) प्रति घंटा चार्ज करने की योजना बना रही है.
शर्त: यह कीमत उन ग्राहकों के लिए होगी जो कम से कम 1,000 घंटे का वार्षिक अनुबंध (Annual Contract) साइन करेंगे.
फंडिंग: स्टार्टअप ने अब तक $28 मिलियन (करीब ₹235 करोड़) से अधिक जुटाए हैं. दिग्गज निवेश फर्म 'सेक्विया' (Sequoia) ने भी इसमें निवेश किया है. कंपनी को अब तक 10,000 से ज्यादा पूछताछ (Inquiries) मिल चुकी हैं.
2025: दो और प्रोटोटाइप सैटेलाइट्स का लॉन्च. (पहला प्रोटोटाइप 'Earendil-1' 640 किमी की ऊंचाई पर 18.3 मीटर के आईने के साथ टेस्ट होगा).
2028 तक: 1000 बड़े सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में होंगे.
2030 तक: संख्या 5,000 सैटेलाइट्स तक पहुंचेगी.
2035 तक (अंतिम लक्ष्य): कुल 50,000 सैटेलाइट्स का एक विशाल नेटवर्क (Constellation) तैयार करना.
भले ही यह विचार सुनने में रोमांचक लगे, लेकिन वैज्ञानिकों और खगोलविदों (Astronomers) ने इस पर कड़े सवाल उठाए हैं.
खगोलीय बाधा: इतने सारे आईने और रिफ्लेक्टेड लाइट रात के अंधेरे को खत्म कर देंगे, जिससे दूरबीनों (Telescopes) के जरिए अंतरिक्ष का अध्ययन करना नामुमकिन हो सकता है.
पारिस्थितिक प्रभाव: रात में कृत्रिम धूप का होना पेड़ों, जानवरों और पक्षियों की जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) को बिगाड़ सकता है.
रेगुलेशन: रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल ने यूएस फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) के पास आवेदन किया है, लेकिन अंतरिक्ष में 'रोशनी के प्रदूषण' (Light Pollution) को लेकर अभी तक कोई कड़े अंतरराष्ट्रीय नियम नहीं हैं.
रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल का यह प्रोजेक्ट तकनीक की नई सीमाओं को छूने जैसा है. जहां एक ओर यह सौर ऊर्जा और आपातकालीन सेवाओं के लिए वरदान साबित हो सकता है, वहीं ₹4.5 लाख प्रति घंटे की कीमत इसे अभी आम आदमी की पहुंच से दूर रखती है. क्या हम वाकई एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहां 'अंधेरा' भी एक लग्जरी होगा जिसे आप पैसे देकर हटा सकेंगे? यह तो वक्त ही बताएगा.
1- क्या यह रोशनी असली सूरज की तरह गर्म होगी?
नहीं, यह केवल रोशनी (Visible Light) होगी. इसकी तीव्रता पूर्णिमा के चांद से 4 गुना तक ही होगी, इसलिए यह तापमान में बड़ी वृद्धि नहीं करेगी.
2- क्या मैं अपने घर के लिए इसे बुक कर सकता हूं?
तकनीकी रूप से हां, लेकिन इसकी कीमत (₹4.5 लाख/घंटा) और 1000 घंटे के मिनिमम कॉन्ट्रैक्ट को देखते हुए यह फिलहाल व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए ही ज्यादा व्यवहार्य है.
3- क्या 50,000 सैटेलाइट्स से अंतरिक्ष में कचरा (Space Debris) नहीं बढ़ेगा?
यह एक बड़ी चिंता है. कंपनी को इन सैटेलाइट्स के रिटायरमेंट और सुरक्षित निपटान (De-orbiting) के लिए कड़े नियमों का पालन करना होगा.
4- क्या बारिश या बादलों के मौसम में यह काम करेगा?
बादल सूरज की रोशनी को सोख सकते हैं या फैला सकते हैं, जिससे जमीन पर मिलने वाली रोशनी की तीव्रता काफी कम हो सकती है.
5- यह प्रोजेक्ट मस्क की किस कंपनी जैसा है?
यह एलन मस्क की Starlink (50,000+ सैटेलाइट्स का लक्ष्य) जैसा ही एक विशाल सैटेलाइट नेटवर्क बनाने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन इंटरनेट के लिए नहीं, रोशनी के लिए.
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