शॉपिंग के हैं शौकीन? आ गया गजब का स्टार्टअप, जो चाहे खरीदिए.. बैग्स उठाएगा 'कैरीमैन', जानिए कितने रुपये लेगा?

दिल्ली के एक नए स्टार्टअप 'कैरीमैन' (CarryMen) ने ग्राहकों के शॉपिंग बैग उठाने और बाजारों में उनकी मदद करने के लिए ₹149 प्रति घंटे की दर से 'शॉपिंग असिस्टेंट' हायर करने की सुविधा शुरू की है. यह असिस्टेंट न केवल बैग उठाएगा, बल्कि खाने की लाइनों में लगेगा और पार्किंग या मेट्रो स्टेशन तक साथ जाएगा. कंपनी एक्स्ट्रा चार्ज पर पावर बैंक, छाता और फोल्डेबल चेयर जैसी सुविधाएं भी दे रही है.
शॉपिंग के हैं शौकीन? आ गया गजब का स्टार्टअप, जो चाहे खरीदिए.. बैग्स उठाएगा 'कैरीमैन', जानिए कितने रुपये लेगा?

दिल्ली के इस स्टार्टअप से आप मात्र ₹149/घंटे में एक 'कैरीमैन' बुक कर सकते हैं जो आपके बैग उठाएगा. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)

दिल्ली के लाजपत नगर, सरोजनी नगर या चांदनी चौक के बाजारों में घूमना और जमकर खरीदारी करना अपने आप में एक बेहतरीन अनुभव है. लेकिन इस शॉपिंग एडवेंचर में सबसे बड़ी मुसीबत तब आती है, जब दोनों हाथ भारी-भरकम शॉपिंग बैग्स से भर जाते हैं. एक हाथ में पर्स, दूसरे में मोबाइल और उंगलियों में फंसे ढेरों बैग्स के साथ भीड़भाड़ वाली तंग गलियों में चलना, मोलभाव करना और गोलगप्पे खाना किसी जंग जीतने जैसा हो जाता है.

इसी परेशानी का एक अनोखा और मजेदार हल लेकर आया है दिल्ली का एक नया स्टार्टअप, जिसने सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है. 'कैरीमैन' (CarryMen) नाम के इस स्टार्टअप ने देश में पहली बार 'शॉपिंग असिस्टेंस' (Shopping Assistance) यानी खरीदारी में मदद करने की सर्विस शुरू की है, वो भी केवल ₹149 प्रति घंटे की शुरुआती कीमत पर.

इनका सीधा सा नारा (Tagline) है- "यू शॉप, वी कैरी" (You Shop, We Carry) यानी आप शॉपिंग कीजिए, बैग हम उठाएंगे. आइए इस अनोखे स्टार्टअप और इसके बिजनेस मॉडल के बारे में समझते हैं.

कैरीमैन (CarryMen) के पैकेज और सुविधाएं

कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, ग्राहकों की सुविधा के लिए अलग-अलग समय और बजट के हिसाब से कई पैकेज तैयार किए गए हैं:

30 मिनट का पैकेज: केवल ₹79 में तुरंत मदद.

1 घंटे का पैकेज: ₹149 प्रति घंटा.

4 घंटे का पैकेज (लॉन्ग ट्रिप): ₹599 में आधे दिन की शॉपिंग के लिए.

क्या-क्या काम करेगा आपका 'कैरीमैन'?

यह स्टार्टअप बाजार में पूरी तरह ट्रेनिंग पाए हुए प्रोफेशनल और सभ्य असिस्टेंट मुहैया कराता है. कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, बुक किया गया असिस्टेंट आपके पीछे-पीछे चलेगा और कई कामों में आपकी मदद करेगा, जैसे:

  • आपके सभी भारी शॉपिंग बैग्स को अपने हाथों में सुरक्षित संभालेगा, ताकि आपके हाथ पूरी तरह फ्री रहें.
  • आपको भीड़भाड़ वाले बाजारों से सुरक्षित निकालते हुए पास के पार्किंग एरिया या नजदीकी मेट्रो स्टेशन तक छोड़कर आएगा.
  • सबसे मजेदार बात यह है कि जब आप शॉपिंग के बाद थक जाएंगे या आपको भूख लगेगी, तो यह असिस्टेंट आपके लिए चाट-पकौड़ी या खाने के स्टॉल्स की लंबी लाइनों (Queues) में खुद खड़ा होगा, ताकि आपका समय बचे.

एक्स्ट्रा पैसे देकर मिलेंगी ये वीआईपी सुविधाएं

अगर ग्राहक थोड़ा अतिरिक्त भुगतान करते हैं, तो वह अपनी शॉपिंग को और आरामदायक बनाने के लिए कुछ ऑन-द-गो (चलते-फिरते) सामान भी ऑर्डर कर सकते हैं, जैसे:

  • बच्चों को संभालने के लिए बेबी कैरियर या बेबी प्रैम (बच्चों की गाड़ी).
  • धूप या अचानक बारिश से बचने के लिए छाता और प्रदूषण से सुरक्षा के लिए N95 मास्क.
  • फोन की बैटरी खत्म होने पर ऑन-द-गो मोबाइल चार्जिंग (पावर बैंक) की सुविधा.
  • बाजार के बीच में कहीं भी आराम से बैठने के लिए फोल्डेबल चेयर (तह होने वाली कुर्सी), जिसे असिस्टेंट आपके थकने पर तुरंत बिछा देगा.

सोशल मीडिया पर क्यों छिड़ गई है बहस?

एक्स (X) पर एक यूजर ने जैसे ही इस स्टार्टअप की जानकारी शेयर की, इंटरनेट की जनता दो धड़ों में बंट गई. देखते ही देखते इस पोस्ट पर लाखों व्यूज आ गए और लोगों ने अपने-अपने कड़े तर्क देने शुरू कर दिए:

सकारात्मक पक्ष (रोजगार का नया जरिया): कई लोगों का मानना है कि भारत जैसे देश में जहां बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है, यह स्टार्टअप अनस्किल्ड (गैर-तकनीकी) युवाओं को सीधे तौर पर कमाई का एक नया जरिया दे रहा है. बुजुर्ग महिलाओं या अकेले शॉपिंग करने जाने वाले लोगों के लिए यह सर्विस बेहद मददगार है, बशर्ते बैंक या कंपनी इन वर्कर को एक अच्छी और सम्मानजनक दिहाड़ी दे.

नकारात्मक पक्ष (श्रम का गलत इस्तेमाल): दूसरी तरफ, कुछ टेक और सोशल एक्सपर्ट्स इस आइडिया से काफी नाराज दिखे. एक यूजर ने लिखा, "मुझे नहीं पता कि यह मिलियन-डॉलर आइडिया है या नहीं, लेकिन यह देश के मानव संसाधनों (Manpower) को गलत दिशा में धकेल रहा है." लोगों को चिंता है कि ₹149 में से कंपनी का कमीशन कटने के बाद उस गरीब असिस्टेंट के हाथ में क्या बचेगा? क्या यह प्लेटफॉर्म वर्कर का आर्थिक शोषण नहीं है?

मजेदार और पारिवारिक मीम्स: इस बहस के बीच कुछ लोगों ने मजेदार चुटकी भी ली. एक यूजर ने लिखा, "मैंने इस ऐप के बारे में अपने पापा को बताया, तो उन्होंने कहा- क्या कैरीमैन? शादी के बाद इसी सर्विस को 'पति' कहा जाता है, जो मुफ्त में मिलती है." वहीं जब एक यूजर ने पूछा कि क्या यह असिस्टेंट मेरे साथ फिल्म देखने या डेट पर चल सकता है? तो जवाब मिला, "यह केवल एक हेल्पर है, बॉयफ्रेंड बनकर मूवी डेट पर जाने की सर्विस नहीं है."

Conclusion

'कैरीमैन' स्टार्टअप का यह आइडिया दिखाता है कि भारतीय बाजारों की जमीनी समस्याओं को देखकर नए-नए कूटनीतिक कंजयूमर बिजनेस तैयार किए जा रहे हैं. सामान ढोने वाले 'कुली' की व्यवस्था रेलवे स्टेशनों पर सदियों से है, लेकिन उसे आधुनिक मोबाइल ऐप के जरिए बाजारों तक लाना एक बिल्कुल नया प्रयोग है. यह स्टार्टअप सफल होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कंपनी अपने वर्कर्स को कितनी सम्मानजनक सैलरी देती है और ग्राहकों की सुरक्षा व प्राइवेसी का कितना ध्यान रखती है.

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