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घर खरीदना हर किसी के लिए एक सपना होता है.मिडिल क्लास अपनी लाइफ की पूरी जमापूंजी को घर खरीदने में लगा देते हैं, लेकिन अब पिछले कुछ समय से घर खरीदना और महंगा होता जा रहा है. जिस तरह से रिएल एस्टेट के दाम बढ़ रहे हैं अब मिडिल क्लास के लिए घर खरीदना काफी मुश्किल हो रहा है.लेकिन सवाल है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो सपना हमारे माता-पिता ने पूरा कर लिया, वो हमारी पीढ़ी के लिए एक 'लग्जरी' बन गया है? तो जानेंगे वो 5 कारण जिनके चलते मिडिल क्लास के लिए अब घर खरीदना काफी मुश्किल हो गया है.
क्यों पहुंच से बाहर हुआ अपना घर? ये हैं 5 असली कारण
यह सबसे बड़ा और पहला कारण प्रॉपर्टी के दाम है. छोटे शहरों से लेकर मेट्रो सिटी तक, प्रॉपर्टी के दाम रॉकेट की रफ्तार से भाग रहे हैं. जितनी तेजी से जमीन और फ्लैट के रेट बढ़े हैं, उतनी तेजी से आम आदमी की सैलरी असल में नहीं बढ़ी है.
अगर किसी तरह हिम्मत करके कोई डाउन पेमेंट का जुगाड़ कोई कर भी ले, तो होम लोन की महंगी ब्याज दरें उसकी कमर तोड़कर रख देती हैं.जी हां होम लोन की ब्याज दरों ने EMI को इतना बढ़ा दिया है कि आधी से ज्यादा सैलरी सिर्फ किस्त चुकाने में ही चली जाती है.जिस कारण से खुद का घर खरीदने वाला इंसान 20-25 साल के लिए एक ऐसे वित्तीय जाल में फंस जाता है, जिससे निकलना मुश्किल सा हो जाता है.
यह एक ऐसी सच्चाई है जिससे हर एक नौकरीपेशा वाला इंसान जूझ रहा है. एक तरफ जहां घर की कीमतें खरगोश की तरह भाग रही हैं, तो दूसरी तरफ हमार सब की सैलरी कछुए की चाल से बढ़ रही है.ऐसे में इस रेस में सैलरी हमेशा पीछे रह जाने से घर खरीदना बेहद मुश्किल हो जाता है.
पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, राशन, बच्चों की फीस आदि, इन सबकी महंगाई ने आम आदमी के बजट का पूरा गणित बिगाड़कर रख दिया है.पूरे महीने के जरूरी खर्चे इतने बढ़ गए हैं कि अब घर खरीदने के लिए बड़ी बचत कर पाना लगभग मुश्किल हो गया है. जो पैसा पहले बच सकता था, अब वो रोजमर्रा की जरूरतों में ही खत्म हो जाता है.
बैंक आपको 100% लोन नहीं देता है, क्योंकि घर की कुल कीमत का करीब 15-20% पैसा आपको अपनी जेब से ही लगाना पड़ता है, जिसको डाउन पेमेंट कहा जाता है.तो अगर 50 लाख के घर के लिए भी 10 लाख रुपए का डाउन पेमेंट इकट्ठा करना किसी पहाड़ चढ़ने जैसा है, जिसमें मिडिल क्लास के कई साल निकल जाते हैं.
यानी कि साफ है आज के समय में मिडिल क्लास के लिए किराए के घर में रहना मजबूरी और अपना घर खरीदना एक दूर का ख्वाब बन गया है.असल में वैसे यह केवल एक आर्थिक संकट नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सामाजिक और भावनात्मक उम्मीदों पर एक बड़ा सवालिया निशान भी कहा जा सकता है.(नोट-खबर सामान्य जानकारी पर आधारित है)