बिल्डर्स की मनमानी रोकने, घर खरीदारों की शिकायतों का निपटारा करने के मकसद से 1 मई 2016 को रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट यानी RERA की स्थापना हुई थी. इस संस्थान का काम रियल एस्टेट को सुव्यवस्थित और पारर्दशी बनाना था लेकिन, लगभग 10 साल बाद RERA अपने मकसद से भटक गया है. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बाग्ची की बेंच ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि, "डिफॉल्टर बिल्डर्स को सुविधा देने के अलावा इस संस्था ने कोई काम नहीं किया है. इससे बेहतर है कि RERA को खत्म कर देना चाहिए." सुप्रीम कोर्ट ने यह तक कहा है कि रेरा रिटायर्ड नौकरशाह के लिए पुनर्विकास केंद्र बन गया है.
शिकायतों का पुलिंदा लेकिन, कोई हल नहीं
RERA पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी हिमाचल प्रदेश सरकार की याचिका की सुनवाई के दौरान आई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रेरा के पास शिकायतों का पुलिंदा लगा है लेकिन,कोई हल नहीं है.
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घर खरीदारों से ज्यादा डिफॉल्टर बिल्डर्स के लिए काम
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रेरा के आदेशों की बिल्डर्स धज्जियां उड़ा रहे हैं. रेरा घर खरीदारों से ज्यादा डिफॉल्टर बिल्डर्स के लिए काम कर रहा है.
- कोर्ट के मुताबिक रेरा का ढांचा ही ऐसा है जो बिल्डर्स को डिफॉल्ट होने के बावजूद कानूनी दांव-पेंचों का फायदा उठाने में मदद करता है. दूसरी तरफ आम आदमी केवल कोर्ट के चक्कर काटता रहता है.
- चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने रिटायर्ड नौकराशहों की रेरा में नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इसमें विशेषज्ञों के बजाय रिटायर्ड नौकरशाहों को भर दिया गया है.
- कोर्ट ने कहा है कि रेरा में ऐसे लोगों को जगह देनी चाहिए जो पर्यावरण, आर्किटेक्चर और स्थानीय विकास की समझ रखते हैं.
- कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि रेरा घर खरीदारों के हितों की रक्षा नहीं करती तो इसे बंद कर दिया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से कहा है कि वह रेरा के गठन, कामकाज पर दोबारा सोचे.
FPCE ने किया सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का स्वागत
सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी कड़वी जमीनी हकीकत को भी बयान करती है. होम बायर्स की संस्था फोरम फॉर पीपुल कलेक्टिव एफर्ट्स (FPCE) ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का स्वागत किया है.
प्रोजेक्ट पूरा होने की गारंटी नहीं
- FPCE का कहना है कि कानून को 9 साल पूरा होने के बाद भी समय पर प्रोजेक्ट पूरा होने की कोई गारंटी नहीं है.
- FPCE के मुताबिक 75% से ज्यादा RERA प्राधिकरण धारा 78 का पालन नहीं कर रहे हैं. ज्यादातर राज्यों की वार्षिक रिपोर्ट या तो जारी नहीं होती या बीच में बंद हो गई या अपडेट नहीं हो पाती.
- केवल गुजरात, ओडिशा, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड 2023-24 तक अपडेट हैं, लेकिन इनकी रिपोर्ट भी आवास मंत्रालय द्वारा तय किए गए फॉर्मेट के मुताबिक नहीं है.
- FPCE के मुताबिक केवल यह बता देना कि कितने प्रोजेक्ट रजिस्टर हैं, कितनी शिकायतें निपटी है इससे असली तस्वीर साफ नहीं होती है.
- जब तक यह न पता चले कि कितने आदेश वाकई लागू हुए, कितनी रिकवरी पूरी हुई तब तक ये डेटा 'बिना संदर्भ का आंकड़ा है', जो केवल भ्रम पैदा करता है.
जमीनी हकीकत बेहद उलट
FPCE के मुताबिक 'रेरा है तो भरोसा है' के उलट जमीनी हालत अलग है. रेरा से ऑर्डर पास होते हैं पर वह लागू नहीं होते हैं. रिकवरी वारंट निकलते हैं पर वसूली नहीं होती है.
रजिस्ट्रेशन से पहले ही बिक्री शुरू
- FPCE के मुताबिक क्वाटर्ली अपडेट गायब रहते हैं, वन साइडेड एग्रीमेंट क्लॉज जारी है और कई जगह रजिस्ट्रेशन से पहले ही बिल्डर्स द्वारा बिक्री शुरू कर दी जाती है, जो खरीदारों के लिए बड़ा खतरा है.
- RERA का मूल मंत्र था 'रजिस्ट्रेशन से भरोसा और नियम से डिलीवरी' लेकिन जब रिपोर्टिंग ही गायब हो न भरोसा बनता है, न डिलीवरी सुनिश्चित होती है.
- सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और FPCE के सवाल ये साफ करते हैं केवल वादों से काम नहीं चलेगा. डेटा चाहिए, अब दावों से फर्क नहीं पड़ेगा.
- कानूनों पर अमल होना चाहिए वरना रेरा रजिस्ट्रेशन केवल कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएगा और घर खरीदार का भरोसा कभी नहीं लौटेगा.
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