Renting Vs Buying: घर खरीदें या फिर किराये में रहें. ये सवाल अक्सर परेशान करता है. जानिए 5 फीसदी का रूल जो आपकी समस्या को कर देगा दूर.
1/6घर खरीदें या फिर किराये में रहें. ये उलझन मिडिल क्लास को अक्सर सताती है. लेकिन इस उलझन को फाइनेंस का 5 फीसदी का नियम सुलझा सकता है. इस नियम के जरिए घर खरीदने या किराये में रहने के बीच तुलना कर सकते हैं.
2/65 फीसदी नियम बताता है कि 1 साल में आप अपनी प्रॉपर्टी कितनी नॉन रिकवरेबल यानी वापस न मिलने वाला पैसा खर्च कर रहे हैं. इस खर्च में होम लोन का ब्याज, प्रॉपर्ट टैक्स और सालाना मेंटनेंस शामिल होता है.
3/65% यानी प्रॉपर्टी की कुल कीमत का 5%= घर खरदीने का सालाना खर्च. इसे इस उदाहरण से समझें. मान लें प्रॉपर्टी की कीमत 1.5 करोड़ रुपए है. 5 फीसदी नियम के अनुसार घर खरीदने का सालाना खर्च 7.50 लाख रुपए.
4/67.50 लाख को यदि मासिक खर्च में तोड़ दें यह 62,500 रुपए प्रति माह हुआ. मान लें आप उसी प्रॉपर्टी का किराया मेंटेनेंस समेत 42000 रुपए दे रहे हैं तो घर खरीदने का खर्च किराये में रहने से काफी अधिक है.
5/65 फीसदी का नियम के मुताबिक यदि आपका किराया 5% के आंकड़े से काफी कम है तो आप किराये में रहकर पैसा बचा सकते हैं. हालांकि, किराये का आंकड़ा 5 फीसदी से ज्यादा है तो घर खरीदने का वक्त आ गया है.
6/6घर खरीदने का फैसला भावनात्मक और जरूरत पर भी निर्भर करता है. ऐसे में आप घर खरीदने या किराये में रहने का फैसला अपनी जरूरत को देखते हुए लें.