KPMG और FICCI की रिपोर्ट के मुताबिक टेक्नोलॉजी ने जमीन के फर्जीवाड़े के डर को काफी कम कर दिया है. जानिए क्या कहती है रिपोर्ट.
1/6दिल्ली एनसीआर में जहां रियल एस्टेट बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. वहीं, जमीन खरीदते वक्त फर्जीवाड़े और विवाद का डर भी बना रहता है. हालांकि, टेक्नोलॉजी इस डर को तेजी से खत्म कर रही है.
2/6KPMG और FICCI की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार के डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम के तहत अब जमीनों की भी इंसानों की तरफ एक यूनिक डिजिटल पहचान दी जा रही है.
3/6रिपोर्ट के मुताबिक भारत भर में करोड़ों जमीन के प्लॉट को जियो रेफरेंस्ड यूनिक नंबर दिया जा चुका है. इस व्यवस्था से न केवल एक ही जमीन को कई बार बेचने जैसे फर्जीवाड़ों में लगाम लगेगी. साथ ही खरीदार पूरी पारदर्शिता के साथ घर बैठे संपत्ति का सत्यापन कर सकेंगे.
4/6जमीन के हर टुकड़े के लिए एक यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN) दिया गया है. यह डिजिटल पहचान स्थापित करता है.इसके अलावा जियो रेफरेंसिंग और हवाई चित्र और GPS सक्षम तकनीक का इस्तेमाल करके जियो रेफरेंस्ड पार्सल मैपिंग पर आधारित है.
5/6रिकॉर्ड जो डिजिटल तौर से डाउनलोड किए जाते हैं, उनमें सत्यापन के लिए यूनिक वेरिफिकेशन आईडेंटिफायर्स और QR कोड एम्बेडेड होते हैं. यह सभी रिकॉर्ड एक आधिकारिक डिजिटल पोर्टल और नामित सिटी सर्वे सिस्टम के जरिए प्रकाशित होता है.
6/6KPMG और FICCI की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 36 करोड़ से ज्यादा लैंड पार्सल को जियो रेफरेंस्ड ULPIN सौंपा जा चुका है. इस प्रणाली से संपत्ति के फर्जी या डुप्लीकेट लेनदेन की गुंजाइश कम होती है.