EMI, किराये की दोहरी मार, नोएडा-फरीदाबाद में घर बुक करके फंसे? रिपोर्ट ने बताया क्यों वक्त पर नहीं मिलता पजेशन

सरकारी मंजूरियों में देरी पजेशन का इंतजार कर रहे घर खरीदारों के लिए मुश्किल खड़ी कर रहे हैं. नाइट फ्रैंक औ NAREDCO ने अफोर्डेबल हाउसिंग 2025 की रिपोर्ट में इसका खुलासा किया है.
EMI, किराये की दोहरी मार, नोएडा-फरीदाबाद में घर बुक करके फंसे? रिपोर्ट ने बताया क्यों वक्त पर नहीं मिलता पजेशन

यदि आपने नोएडा, ग्रेटर नोएडा या फरीदाबाद में घर बुक कराया है और पजेशन के लिए लंबा इंतजार कर रहे हैं तो उसका एक बड़ा कारण इससे मिलने वाली सरकारी मंजूरियों में होने वाले देरी है. नाइट फ्रैंक और NAREDCO की अफोर्डेबल हाउसिंग 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, इन इलाकों में डेवलपर्स को प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले जरूरी मंजूरी लेने में लगभग सालभर या उससे भी ज्यादा वक्त लग जाता है, इसका सीधा असर प्रोजेक्ट की लागत और डिलीवरी की टाइमलाइन पर पड़ता है.

प्रोजेक्ट शुरू करना ही जटिल

रिपोर्ट के मुताबिक रियल एस्टेट डेवलपर्स के लिए प्रोजेक्ट शुरू करना एक जटिल प्रक्रिया बना हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक यह प्रक्रिया धीमी, अपारदर्शी और असंगत है.

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लेनी होती है ये मंजूरियां

  • रिपोर्ट के मुताबिक डेवलपर्स को कई डिपार्टमेंट से तरह-तरह की इजाजत लेनी पड़ती है, जिनमें जमीन के इस्तेमाल में बदलाव से लेकर पर्यावरण क्लीयरेंस और जोनिंग परमिशन भी शामिल हैं.
  • कई राज्यो में सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम को लागू तो कर दिया है, लेकिन वह अभी पूरी तरह से डिजिटल और प्रभावी नहीं है, जिससे काम में तेजी नहीं आ पाती है.

सालभर से लंबा इंतजार

नाइट फ्रैंक और नारेडको की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि ग्रेटर नोएडा और फरीदाबाद जैसी तेजी से विकसित हो रहे अर्बन सेंटर में डेवलपर्स को सभी दस्तावेज जमा करने के बावजूद बेसिक लेआउट और पर पर्यावरण से संबंधित मंजूरी के लिए सालभर से ज्यादा इंतजार करना पड़ता है. इस देरी का सबसे खराब असर किफायती आवास परियोजनाओं पर पड़ता है, क्योकि ये प्रोजेक्ट कम मुनाफे पर काम करते हैं. साथ ही समय पर पूरा होने पर भी सरकारी सब्सिडी और प्रोत्साहन के योग्य होते हैं.

जरूरी सरकारी मंजूरियां

मंजूरी का प्रकारसंबंधित विभाग/क्षेत्र
भूमि उपयोग रूपांतरण

स्थानीय विकास प्राधिकरण

पर्यावरण क्लीयरेंसपर्यावरण मंत्रालय
जोनिंग अनुमति

नगर नियोजन विभाग

स्ट्रक्चरल सर्टिफिकेशनबिल्डिंग अथॉरिटी
यूटिलिटी कनेक्शन

बिजली, पानी, सीवेज बोर्ड

घर खरीदारों पर कैसे पड़ता है असर

प्रोजेक्ट में जब भी देरी होती तो इसका खामियाजा घर खरीदारों को भुगतना पड़ता है. एक तरफ बैंक की EMI चुकनी पड़ती है तो दूसरी तरफ वह किराये के मकान में रहने को मजबूत होता है. रिपोर्ट में ये भी बताया कि इन देरी और बढ़ती लागत के कारण किफायती घरों की सप्लाई में भी गिरावट आई है. रिपोर्ट में इस दिक्कत से छुटकारा देने के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं.

सिंगल विंडो सिस्टम को प्रभावी बनाना: सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम को इंटीग्रेट किया जाए, जो पूरी तरह से डिजिटल, ट्रांसपेरेंट और समयबद्ध हो.

अफोर्डेबल हाउसिंग फंड (AHF): इसके तहत एक अलग विंडो की सिफारिश, जहां पर से डेवलपर्स कम ब्याज दरों पर निर्माण के लिए कर्ज ले सकें.

टैक्स छूट में प्रोत्साहन: रिपोर्ट के मुताबिक डेवलपर्स के लिए मौजूदा टैक्स छूट काफी नहीं है, क्योंकि इन प्रोजेक्ट्स में मुनाफा पहले ही काफी कम होता है. रिपोर्ट में टैक्स क्रेडिट और GST में छूट जैसे प्रोत्साहन देने का सुझाव दिया गया है.

खबर से जुड़े FAQs

सवाल: नोएडा और फरीदाबाद में प्रोजेक्ट में देरी का मुख्य कारण क्या है?

जवाब: रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य कारण डेवलपर्स को सरकारी विभागों से विभिन्न प्रकार की मंजूरी लेने में लगने वाला एक साल से अधिक का समय है.

सवाल: डेवलपर्स को कौन-कौन सी मुख्य मंजूरियां लेनी पड़ती हैं?

जवाब: उन्हें भूमि उपयोग, पर्यावरण क्लीयरेंस, ज़ोनिंग, स्ट्रक्चरल सर्टिफिकेशन और बिजली-पानी जैसी यूटिलिटी कनेक्शन की मंजूरी लेनी पड़ती है.

सवाल: इस देरी का सबसे ज्यादा असर किन प्रोजेक्ट्स पर पड़ता है?

जवाब: इसका सबसे बुरा असर किफायती आवास (Affordable Housing) प्रोजेक्ट्स पर होता है, क्योंकि वे कम मुनाफे वाले और समय पर सब्सिडी पर निर्भर होते हैं.

सवाल: क्या सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम से मदद नहीं मिल रही है?

जवाब: रिपोर्ट के अनुसार, ये सिस्टम अक्सर ठीक से एकीकृत नहीं होते और आंशिक रूप से ही डिजिटल हैं, जिससे प्रक्रिया अभी भी धीमी है.

सवाल: क्या इस देरी से घरों की सप्लाई पर असर पड़ा है?

जवाब: हां, 50 लाख रुपये से कम कीमत वाले किफायती घरों की सप्लाई 2018 में 52.4% से घटकर 2025 में सिर्फ 17% रह गई है.

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