पैसेंजर्स की सुरक्षा के साथ रेलवे का समझौता? CAG की रिपोर्ट में खुलासा- बिना मंजूरी या सेफ्टी ट्रायल के चला दी ट्रेन!

कैग रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2023 में दक्षिण रेलवे ने नीलगिरि माउंटेन रेल (NMR) के लिए कुछ नए कोचों को सेवा में उतारा. लेकिन हैरानी की बात ये है कि इन कोचों का न तो पूरी तरह परीक्षण किया गया था और न ही रेलवे बोर्ड से कोई आधिकारिक मंजूरी ली गई थी.
पैसेंजर्स की सुरक्षा के साथ रेलवे का समझौता? CAG की रिपोर्ट में खुलासा- बिना मंजूरी या सेफ्टी ट्रायल के चला दी ट्रेन!

संसद में पेश की गई कैग (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट ने दक्षिण रेलवे (Southern Railways) की एक बड़ी चूक को उजागर किया है, जिसमें पैसेंजर्स की सुरक्षा को ताक पर रखकर नीलगिरि माउंटेन रेल सेक्शन में बिना मंजूरी और अपूर्ण तकनीकी परीक्षण के नए कोच सेवा में लगा दिए गए. PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, ये मामला न केवल 27.91 करोड़ रुपये के वित्तीय नुकसान से जुड़ा है, बल्कि इसमें रेलवे प्रशासन द्वारा रेल मंत्रालय के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी और सुरक्षा मानकों की अनदेखी भी सामने आई है.

बिना मंजूरी चले नए कोच, यात्रियों की सुरक्षा से समझौता

कैग रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2023 में दक्षिण रेलवे ने मेट्टूपालयम से उदगमंडलम (ऊटी) के बीच चलने वाली नीलगिरि माउंटेन रेल (NMR) के लिए कुछ नए कोचों को सेवा में उतारा. ये कोच खास तौर पर NMR रूट के लिए डिजाइन किए गए थे, लेकिन हैरानी की बात ये है कि इन कोचों का न तो पूरी तरह परीक्षण किया गया था और न ही रेलवे बोर्ड से कोई आधिकारिक मंजूरी ली गई थी.

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तकनीकी खामियां और ट्रायल में आई दिक्कतें

दक्षिण रेलवे ने मई 2015 में 100 साल पुराने 28 कोचों को बदलने के लिए रेलवे मंत्रालय से अनुरोध किया था. मंत्रालय ने जुलाई 2015 में इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) को RDSO (Research Design and Standards Organisation) के परामर्श से एक प्रोटोटाइप कोच बनाने की सलाह दी थी. ICF ने पहले 15 कोच बनाए और अप्रैल 2019 में उनमें से चार का ट्रायल मेट्टूपालयम से उदगमंडलम तक कराया गया. लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, यह ट्रायल ढलान वाले खंड पर नहीं हुआ, जबकि नीलगिरि माउंटेन रेल का सबसे अहम हिस्सा ही इसकी तीव्र ढलानें हैं.

मार्च 2020 में दक्षिण रेलवे को पता चला कि नए कोच का वजन हर कोच में लगभग 5 टन ज्यादा है, जिसके कारण ढलानों पर इंजन की व्हील स्लिप जैसी समस्या सामने आई. इसके बावजूद ICF ने बाक़ी के 13 कोच पुराने ही डिज़ाइन और वजन के साथ बना दिए.

सुरक्षा से हुआ समझौता, मंत्रालय से नहीं ली मंजूरी

कैग की रिपोर्ट में सख्त शब्दों में कहा गया है, “बिना RDSO की सलाह लिए और प्रोटोटाइप के सफल परीक्षण के बिना 28 कोच बनाना और सेवा में लगाना रेलवे की गंभीर चूक है. यह यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है.”

इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मई 2024 तक इन 28 में से 15 कोचों को सप्ताहांत की विशेष ट्रेनों में उपयोग किया जा रहा है, जबकि अभी तक रेलवे बोर्ड की मंजूरी नहीं ली गई है.

27.91 करोड़ खर्च, फिर भी पूरी तरह उपयोग नहीं हो पाए कोच

कैग ने यह भी बताया कि कुल 27.91 करोड़ रुपये खर्च कर बनाए गए ये कोच आज भी पूरी क्षमता से उपयोग में नहीं लाए जा सके हैं. ढलान वाले ट्रैक पर ट्रायल में आई समस्याओं को अभी तक सुलझाया नहीं गया है.

दक्षिण रेलवे ने दी सफाई

दक्षिण रेलवे ने अपनी सफाई में कहा कि ट्रायल में जो कमियां पाई गई थीं, उन्हें ICF को बताया गया था और 18 कोच वीकेंड व जॉय राइड ट्रेनों में चलाए जा रहे हैं. बाकी सेवा तब शुरू की जाएगी जब रेलवे बोर्ड से मंजूरी मिल जाएगी.

लेकिन कैग ने इस जवाब को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कहा, “दक्षिण रेलवे का जवाब संतोषजनक नहीं है. उन्होंने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया कि बिना RDSO की सलाह के और बिना ट्रायल के 28 कोच कैसे बनाए और सेवा में लगाए गए.”