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रेलवे का टिकट, लंबी यात्रा और बढ़ती उम्र- सीनियर सिटीजन के लिए यह सिर्फ सफर नहीं, बल्कि एक जरूरत होती है. कोई इलाज के लिए सफर करता है, कोई बच्चों से मिलने, तो कोई तीर्थ यात्रा पर निकलता है. लेकिन पिछले लगभग पांच सालों से बुजुर्ग यात्रियों के मन में एक ही सवाल है- रेलवे की वो पुरानी टिकट छूट आखिर गई कहां?
अब Budget 2026 से पहले इस मुद्दे पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है. रेलवे और वित्त मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, सीनियर सिटीजन को मिलने वाली पुरानी कंसेशन स्कीम को लेकर विकल्पों पर विचार किया जा रहा है. हालांकि, अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन बजट से पहले इस तरह की चर्चाएं अपने आप में एक अहम संकेत मानी जा रही हैं.
भारतीय रेलवे दशकों तक सीनियर सिटीजन को टिकट किराए में सीधी छूट देता रहा है. यह स्कीम देश की सबसे पुरानी सामाजिक सुविधाओं में से एक मानी जाती थी.
यह छूट स्लीपर, थर्ड AC, सेकेंड AC और फर्स्ट AC जैसी लगभग सभी क्लासों में लागू होती थी. टिकट बुक करते समय सिर्फ उम्र दर्ज करना होता था- कोई अलग कार्ड, सर्टिफिकेट या अतिरिक्त प्रक्रिया नहीं. IRCTC ऑनलाइन टिकट हो या रेलवे काउंटर- दोनों जगह यह सुविधा लागू थी.
मार्च 2020 में कोरोना महामारी के साथ रेलवे व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई.
इसी दौरान रेलवे ने सीनियर सिटीजन कंसेशन को “अस्थायी रूप से” सस्पेंड कर दिया.
उस समय तर्क दिया गया कि रेलवे पहले से ही सब्सिडी में चल रही है. सीनियर सिटीजन छूट पर हर साल ₹1,600-₹2,000 करोड़ का खर्च आता है. महामारी के बाद वित्तीय संतुलन प्राथमिकता है. हालांकि, समस्या यह रही कि कोरोना खत्म होने, ट्रेनें पूरी क्षमता से चलने और किराए बढ़ने के बावजूद यह छूट वापस नहीं आई.
पिछले दो सालों में यह मुद्दा फिर से ज़मीन पर लौट आया है. वजहें साफ हैं महंगाई तेज़ी से बढ़ी है, लेकिन बुजुर्गों की पेंशन सीमित है. मेडिकल खर्च कई गुना बढ़ गया है. रेलवे किराया भले सीधे न बढ़ा हो, लेकिन डायनेमिक फेयर, कैटरिंग चार्ज, रिजर्वेशन फीस, सुपरफास्ट चार्ज ने यात्रा को महंगा बना दिया है.
यही कारण है कि अब सीनियर सिटीजन संगठन, सामाजिक संस्थाएं, सांसद और जनप्रतिनिधि लगातार सरकार से मांग कर रहे हैं कि कम से कम बुजुर्ग यात्रियों को फिर से राहत दी जाए.
सूत्रों के मुताबिक, सरकार के सामने फिलहाल कई विकल्प खुले हैं, जिन पर विचार किया जा सकता है- पूरी पुरानी कंसेशन स्कीम की बहाली या फिर आंशिक छूट (जैसे 30-40%). सिर्फ स्लीपर और जनरल क्लास में राहत या फिर साल में सीमित यात्राओं तक छूट. यह फैसला रेलवे के लिए सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है, क्योंकि देश में सीनियर सिटीजन की संख्या तेजी से बढ़ रही है.
रेलवे का तर्क अब भी यही है कि टिकट छूट से सीधा राजस्व घाटा होता है. रेलवे पहले से ही कई सेवाओं पर सब्सिडी देता है. इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा पर खर्च बढ़ाना जरूरी है. लेकिन, दूसरी ओर, यह भी सच है कि सीनियर सिटीजन छूट को रेलवे की सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा माना जाता रहा है.
सीनियर सिटीजन की टिकट छूट सिर्फ एक स्कीम नहीं, बल्कि सम्मान और सहारे का प्रतीक रही है. अगर Budget 2026 में सरकार इस दिशा में कोई कदम उठाती है, चाहे वह पूरी बहाली हो या सीमित राहत तो यह लाखों बुजुर्ग यात्रियों के लिए बड़ी राहत होगी.
अब सबकी नजरें 1 फरवरी 2026 पर टिकी हैं. सवाल बस इतना है- क्या इस बार बजट में बुजुर्ग यात्रियों को वो पुरानी राहत लौटेगी, जिसकी वे सालों से इंतज़ार कर रहे हैं?
Q1. सीनियर सिटीजन किस उम्र से माने जाते हैं?
पुरुषों के लिए 60 साल और महिलाओं के लिए 58 साल.
Q2. क्या रेलवे टिकट पिछले सालों में महंगे हुए हैं?
डायनेमिक फेयर और अतिरिक्त चार्ज के कारण कुल यात्रा खर्च बढ़ा है.
Q3. क्या बजट में हर साल रेलवे से जुड़े फैसले होते हैं?
नहीं, लेकिन बजट नीतिगत संकेत जरूर देता है.
Q4. IRCTC से टिकट बुक करना सुरक्षित है?
हां, यह भारतीय रेलवे की आधिकारिक डिजिटल सेवा है.
Q5. क्या भविष्य में सीनियर सिटीजन के लिए अलग सुविधाएं आ सकती हैं?
रेलवे समय-समय पर नई सुविधाओं पर विचार करता रहा है.