PVR के महंगे पानी-पॉपकार्न से आता है गुस्सा? तो जानें इसके पीछे का कारण

मूवी टिकट ₹350 और पॉपकॉर्न ₹500 क्यों? असल में मल्टीप्लेक्स में खाने-पीने की ऊंची कीमतों के पीछे पूरा बिजनेस मॉडल छिपा है.जी हां टिकट रेवेन्यू शेयरिंग, मॉल किराया और ऑपरेशनल खर्च इसकी बड़ी वजह हैं.तो जानिए थिएटर में फूड इतना महंगा क्यों बिकता है?
PVR के महंगे पानी-पॉपकार्न से आता है गुस्सा? तो जानें इसके पीछे का कारण

why popcorn is expensive in theatres

अगर आप हाल ही में किसी मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने गए हैं, तो एक बात जरूर नोटिस की होगी कि टिकट की कीमत चाहे ₹300-₹400 ही हो, लेकिन पॉपकॉर्न और कोल्ड ड्रिंक जैसी खाने-पीने की चीजों का बिल अक्सर उससे भी ज्यादा मतलब 400-500 रुपए तक बन जाता है.वैसे तो कई लोग मजाक में कहते हैं कि “फिल्म सस्ती है, पॉपकॉर्न महंगा है. लेकिन यह सिर्फ मजाक नहीं, इसके पीछे पूरा बिजनेस मॉडल छिपा है.तो आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर थिएटर में खाना-पीना इतना महंगा क्यों होता है.

सवाल: क्यों थिएटर में टिकट से महंगा होता है खाने-पीने का सामान?

जवाव: इसके पीछे ,रेवेन्यू शेयरिंग, हाई ऑपरेशनल कॉस्ट, मॉल किराया और फूड पर ज्यादा मार्जिन हैं.

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टिकट से थिएटर को पूरा पैसा नहीं मिलता

  • ज्यादातर लोग मानते हैं कि टिकट की पूरी रकम थिएटर की कमाई होती है, लेकिन ऐसा नहीं है.
  • टिकट से मिलने वाली आय का बड़ा हिस्सा फिल्म निर्माता और डिस्ट्रीब्यूटर को चला जाता है.
  • खासकर रिलीज के शुरुआती हफ्तों में थिएटर का पार्ट कम रहता है.
  • कई बार पहले हफ्ते में करीब 50% से ज्यादा रेवेन्यू प्रोड्यूसर को मिल जाता है.
  • ऐसे में थिएटर के पास सीमित कमाई ही बच पाती है.
  • इसी कारण से वे फूड और बेवरेज बिक्री पर ज्यादा निर्भर रहते हैं.theater

पॉपकॉर्न पर सबसे ज्यादा मार्जिन

  • सच यह है कि पॉपकॉर्न, नाचोज या कोल्ड ड्रिंक बनाने की लागत बहुत कम होती है.
  • लेकिन इन्हें थिएटर में “प्रीमियम अनुभव” के नाम पर ऊंचे दाम पर बेचा जाता है.
  • यही वह सेक्शन है जहां थिएटर को सबसे ज्यादा मुनाफा मिलता है.
  • लोगों को लगता है कि कई मल्टीप्लेक्स की असली कमाई टिकट से ज्यादा फूड काउंटर से होती है.
  • तो इसलिए पॉपकॉर्न की कीमतें अक्सर बाजार से कई गुना ज्यादा दिखती हैं.

थिएटर चलाना सस्ता नहीं है

  • मल्टीप्लेक्स चलाना कोई आसान या सस्ता काम नहीं है.
  • हर दिन भारी बिजली खर्च, एयर कंडीशनिंग, हाई-टेक प्रोजेक्टर, डॉल्बी साउंड सिस्टम, डिजिटल स्क्रीन, सफाई, सेफ्टी, स्टाफ सैलरी जैसी कई लागतें जुड़ती हैं.
  • शो कम होने या फिल्म फ्लॉप होने की स्थिति में भी ये फिक्स खर्च जारी रहते हैं.
  • थिएटर केवल टिकट पर डिपेंट रहकर इन खर्चों को संभाल नहीं सकता.
  • फूड आइटम्स के हाई प्राइस इन ऑपरेशनल खर्चों को बैलेंस करने में हेल्प करती हैं.

बाहर का खाना लाना क्यों मना है?

  • अक्सर मल्टीप्लेक्स में बाहर का खाना ले जाना मना होता है.
  • इसका कारण सीधा है अगर लोग सस्ता खाना बाहर से लाएं, तो थिएटर की बिक्री घट जाएगी.
  • थिएटर की बड़ी कमाई फूड काउंटर से ही होती है.
  • पॉपकॉर्न और ड्रिंक्स पर उन्हें ज्यादा मार्जिन मिलता है.
  • तो वे अपने फूड बिजनेस को सेफ रखना चाहते हैं.
  • ये एक तरह का कंट्रोल्ड सिस्टम है, जहां प्राइस तय करने का अधिकार थिएटर के पास रहता है.


मॉल का किराया और लोकेशन का खर्च

  • आजकल ज्यादातर मल्टीप्लेक्स बड़े मॉल या प्राइम लोकेशन पर बनाए जाते हैं
  • इन जगहों का किराया काफी ऊंचा होता है
  • बड़े शहरों में मॉल स्पेस लेना सस्ता सौदा नहीं है
  • इसके साथ मेंटेनेंस और बाकी खर्च भी जुड़ते हैं
  • इन भारी लागतों को कवर करने के लिए थिएटर फूड आइटम्स के दाम बढ़ाते हैं
  • तो ₹500 का पॉपकॉर्न सिर्फ मक्का की प्राइस नहीं पेश करता है.
  • उसमें किराया, बिजली, एसी और स्टाफ सैलरी जैसी लागतें भी शामिल होती हैं

क्या यह सही है या मजबूरी?

  • अक्सर इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर बहस भी हो रहती है.
  • कुछ लोग इसे “ओवरप्राइसिंग” कहते हैं, तो कुछ इसे थिएटर की मजबूरी मानते हैं.
  • सच ये है कि थिएटर इंडस्ट्री का बिजनेस मॉडल ही ऐसा बन चुका है, जहां फूड और बेवरेज से कमाई बहुत जरूरी है.

अगर थिएटर सिर्फ टिकट पर डिपेंट रहें, तो लंबे टाइम तक टिके रहना मुश्किल हो सकता है, स्पेशली OTT प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती लोकप्रियता के दौर में.

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आखिरकार दर्शक क्या करें?

  • अगर आप खर्च बचाना चाहते हैं, तो शो से पहले या बाद में बाहर खाना खा सकते हैं.
  • कई थिएटर छोटे साइज के कॉम्बो भी देते हैं, जिन्हें चुनकर आप बजट कंट्रोल कर सकते हैं.

तो अब से अगली बार जब ₹350-450 का पॉपकॉर्न देखें, तो फिर आप समझिए कि यह सिर्फ एक स्नैक नहीं, बल्कि पूरे सिनेमा बिजनेस मॉडल का हिस्सा है.

मूवी टिकट से इसलिए महंगा होता है थिएटर में खाने का सामान

मूवी टिकट भले ₹350 का हो, लेकिन पॉपकॉर्न की कीमत के पीछे कई परतें हैं,रेवेन्यू शेयरिंग, हाई ऑपरेशनल कॉस्ट, मॉल किराया और फूड पर ज्यादा मार्जिन.तो साफ है कि इसलिए थिएटर में खाना-पीना महंगा दिखता जरूर है, लेकिन यह उनकी कमाई का अहम जरिया है.(नोट: खबर केवल सामान्य जानकारी पर आधारित ही है)

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आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)

Q1 थिएटर में पॉपकॉर्न इतना महंगा क्यों होता है?

क्योंकि टिकट की कमाई का बड़ा हिस्सा प्रोड्यूसर को जाता है, इसलिए थिएटर फूड से ज्यादा मुनाफा कमाते हैं

Q2 क्या पॉपकॉर्न की लागत सच में कम होती है?

हाँ, लागत कम होती है, लेकिन प्रीमियम मार्जिन जोड़कर ऊंची कीमत ली जाती है

Q3 बाहर का खाना लाना क्यों मना है?

ताकि थिएटर का फूड बिजनेस सुरक्षित रहे और रेवेन्यू बना रहे

Q4 क्या टिकट से थिएटर को पूरा पैसा मिलता है?

नहीं, शुरुआती हफ्तों में बड़ा हिस्सा फिल्म निर्माता और डिस्ट्रीब्यूटर को जाता है

Q5 क्या फूड की कमाई थिएटर के लिए जरूरी है?

हाँ, बिजली, किराया, स्टाफ सैलरी और टेक्नोलॉजी खर्च कवर करने में यही मुख्य सहारा है

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