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समझें क्यों पुराने पेट्रोल पंप की जमीन पर सालों तक घर या स्कूल नहीं बनाए जाते (प्रतीकात्मक फोटो/AI-ChatGpt)
क्या आपने कभी सोचा है कि आपके शहर के किसी प्राइम लोकेशन पर सालों साल तक एक जमीन खाली पड़ी है,लेकिन वहां पर अब कुछ भी बिल्डिंग नहीं बन रही है, क्योंकि वहां पहले कभी पेट्रोल पंप हुआ करता था?
जी हां शहर के बीचों-बीच करोड़ों की वो जमीन बेकार पड़ी रहती है, लेकिन वहां न तो कोई बड़ा अस्पताल बनता है, न स्कूल और न ही कोई रिहायशी बिल्डिंग. आपके मन में भी सवाल आता होगा कि आखिर इतनी कीमती जमीन का कोई इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहा?
दरअसल, यह कोई चांस नहीं बल्कि एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक और कानूनी कारण है. जी हां पेट्रोल पंप बंद होने के बाद उस जमीन को फिर से यूज करने के लायक बनाना आसान नहीं होता है.तो आइए जानते हैं इसके पीछे की वो कहानी, जो सुरक्षा और सेहत से जुड़ी हर एक बात.
पेट्रोल और डीजल के टैंक लंबे समय तक जमीन के नीचे रहते हैं जिससे मिट्टी और भूजल (groundwater) को खराब कर देते हैं, जिसको 'Soil Contamination' कहते हैं.तो इसलिए यहां अस्पताल,स्कूल घर नहीं बनवाते हैं.
पेट्रोल पंप पर लंबे टाइम तक जमीन के नीचे बड़े-बड़े टैंकों में ईंधन जमा रखा जाता है.तो टाइम के साथ इन टैंकों या पाइपलाइनों से हल्का-हल्का रिसाव होना आम बात है. यह रिसाव मिट्टी की गहराई तक समा जाता है, जिससे पेट्रोल और डीजल में बेंजीन और टोल्यूनि जैसे खतरनाक रसायन होते हैं, जिन्हें 'कार्सिनोजेनिक' यानी कैंसर जैसी बीमारी को पैदा करने वाला माना जाता है.
तो इसलिए अगर ऐसी जमीन पर कोई घर या स्कूल बना दिया जाए, तो फिर वहां रहने वालों को सांस की बीमारियां या कैंसर जैसी घातक समस्याओं का खतरा रहता है.
खतरा केवल मिट्टी तक ही नहीं रहता है. असल में पेट्रोल पंप के नीचे का रिसाव धीरे-धीरे जमीन के काफी नीचे तक चला जाता है और भूजल में मिलता है. इसलिए अगर वहां बोरवेल खोदा जाए या उस जमीन के आसपास पानी का यूज हो, तो वह जहरीला हो सकता है. इसलिए बिल्डर ऐसे जोखिम वाले स्थान पर निर्माण करने से बचती है.
एक बार पेट्रोल पंप बंद होने के बाद उस जमीन को ब्राउनफील्ड साइट कहा जाता है. इसका मतलब है ऐसी जगह जो प्रदूषित हो चुकी है. इसे दोबारा साफ करने की प्रक्रिया को 'रेमेडिएशन' कहते हैं. इसमें जहरीली मिट्टी को निकालकर दूर करना होता है और जमीन के अंदर के पानी को फिल्टर करना होता है. ये काम इतना महंगा और टाइम लेने वाला होता है कि ऐसी जमीन को इसका मालिक अक्सर छोड़ देना ही पसंद करता है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस पर रूल बनाए हैं. अगर कोई पेट्रोल पंप बंद होता है, तो मालिक को साइट असेसमेंट कराना जरूरी है,जब तक सरकारी लैब यह प्रमाणित न कर दे कि मिट्टी और पानी पीने लायक है तब तक वहां कोई नक्शा पास नहीं हो सकता है.
चलिए मान लीजिए किसी ने पुराने पेट्रोल पंप की जमीन पर स्कूल या अस्पताल बना लिया और बाद में वहां रहने वालों को कोई गंभीर बीमारी हो गई, तो जमीन के मालिक पर जुर्माना और कानूनी केस हो सकता है. इस लीगल लायबिलिटी के डर से बड़े डेवलपर्स ऐसी जमीनों से दूरी बनाना ही पसंद करते हैं.
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मतलब ये है कि पेट्रोल पंप बंद होने के बाद वह जमीन केवल एक खाली प्लॉट नहीं, बल्कि एक पर्यावरणीय चुनौती बन जाती है. उसे सेफ बनाने में जितनी मेहनत और पैसा लगता है, उतनी देर में कहीं और नई इमारत खड़ी की जा सकती है.असल में यही कारण है कि शहर के बीचों-बीच होने के बाद भी ऐसी जमीनें खाली ही रहती हैं.
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आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 क्या ऐसी जमीन पर पार्क या बगीचा बना सकते हैं?
सिर्फ फूलों के लिए बना सकते हैं, लेकिन फल-सब्जी उगाना मना है.मिट्टी के जहरीले रसायन पौधों के जरिए थाली तक पहुंच सकते हैं
Q2 क्या पुराने पेट्रोल पंप की जगह EV चार्जिंग स्टेशन खोल सकते हैं?
यह सबसे बेस्ट विकल्प है, इसमें जमीन की गहरी खुदाई की जरूरत नहीं होती और कमर्शियल परमिशन भी आसानी से मिल जाती है
Q3 क्या ऐसी विवादित जमीन पर बैंक लोन मिल जाता है?
बैंक ऐसी जमीन को 'हाई रिस्क' मानते हैं, भविष्य में प्रदूषण या कानूनी पेच फंसने के डर से बैंक लोन देने से बचते हैं
Q4 क्या वक्त के साथ मिट्टी अपने आप साफ नहीं होती?
हां, लेकिन इसमें कई दशक लग जाते हैं,अगर जल्दी सफाई करनी है, तो करोड़ों रुपये खर्च करके 'सॉइल ट्रीटमेंट' करवाना पड़ता है
Q5 खरीदार को कैसे पता चलेगा कि वहां पहले पेट्रोल पंप था?
जमीन के 30 साल पुराने रिकॉर्ड्स चेक करें, अगर वहां की मिट्टी काली दिखे या तेल जैसी गंध आए, तो समझो वहां पहले पंप था