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निवेश की दुनिया में सबसे बड़ा सवाल जो हर किसी को परेशान करता है, वो ये है कि "कितना पैसा, कहां लगाएं?". कितना पैसा इक्विटी (Stock Market) जैसे जोखिम भरे लेकिन हाई-रिटर्न वाले रास्ते पर लगाएं और कितना पैसा डेट (FD, सरकारी बॉन्ड) जैसे सुरक्षित लेकिन कम-रिटर्न वाले रास्ते पर रखें? इसी एक सवाल का जवाब आपके पूरे फाइनेंशियल फ्यूचर की तस्वीर तय करता है.
अगर आप भी इस उलझन में हैं, तो फिक्र न करें. फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स ने इसका एक बहुत ही सरल और असरदार समाधान निकाला है, जिसे कहते हैं '100- (100 माइनस)' का नियम. इसे The 100 - Age Rule भी कहा जाता है. ये कोई किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि एक प्रैक्टिकल फॉर्मूला है, जिसे दुनिया भर के निवेशक अपनाकर अपने पोर्टफोलियो को संतुलित रखते हैं. जानिए इस 'गोल्डन रूल' के बारे में और समझिए कि ये आखिर कैसे काम कर सकता है.
ये नियम एसेट एलोकेशन यानी आपके निवेश को इक्विटी और डेट में बांटने का एक सीधा-साधा फॉर्मूला है. नियम कहता है:
इस फॉर्मूले से जो आंकड़ा निकलता है, आपको अपने कुल निवेश का उतना प्रतिशत हिस्सा इक्विटी यानी शेयर बाजार से जुड़े साधनों (जैसे डायरेक्ट स्टॉक्स, इक्विटी म्यूचुअल फंड) में लगाना चाहिए. और बाकी बचा हुआ हिस्सा आपको डेट यानी फिक्स्ड-इनकम वाले सुरक्षित साधनों (जैसे पब्लिक प्रोविडेंट फंड-PPF, फिक्स्ड डिपॉजिट-FD, डेट म्यूचुअल फंड) में लगाना चाहिए.
इस नियम की खूबसूरती इसकी सादगी में है. चलिए तीन अलग-अलग उम्र के निवेशकों के उदाहरण से इसे समझते हैं.
क्योंकि रिया युवा है. उसकी जोखिम लेने की क्षमता ज्यादा है और उसके पास करियर के कई साल बाकी हैं. अगर बाजार में कोई गिरावट आती भी है, तो उसके पास रिकवर करने के लिए बहुत समय है. ज्यादा इक्विटी एक्सपोजर उसे लंबी अवधि में अच्छी संपत्ति बनाने में मदद करेगा.
अमित अपने करियर के मध्य में है. उस पर परिवार की जिम्मेदारियां भी हैं. इसलिए, वो रिया जितना जोखिम नहीं ले सकता. उसका पोर्टफोलियो ग्रोथ और सुरक्षा के बीच एक अच्छा संतुलन बनाएगा.
वो रिटायरमेंट के करीब हैं. इस पड़ाव पर उनकी प्राथमिकता अपनी जमा-पूंजी को सुरक्षित रखना है, न कि उस पर बड़ा जोखिम लेना. डेट में ज्यादा निवेश उन्हें एक स्थिर आय देगा और बाजार के बड़े उतार-चढ़ाव से बचाएगा.
तीनों उदाहरण के जरिए आपको ये समझ में आ गया होगा कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, ये नियम अपने आप आपके पोर्टफोलियो से जोखिम को कम करता जाता है. ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे हाईवे पर तेज चलाने के बाद शहर की भीड़ में आप गाड़ी का गियर बदलकर उसे धीमा कर लेते हैं.
नहीं. ये याद रखना बहुत जरूरी है कि '100 - उम्र' का नियम एक शुरुआती बिंदु है, कोई पत्थर की लकीर नहीं. इसे 'रूल ऑफ थंब' यानी एक मोटा-मोटा अंदाजा लगाने वाला नियम कहा जाता है. एक्सपर्ट्स अब इसमें कुछ और चीजें भी जोड़ने की सलाह देते हैं.
हो सकता है कि आप 40 की उम्र में भी 70% का जोखिम लेने में सहज हों, या 25 की उम्र में भी सिर्फ 50% का जोखिम लेना चाहते हों. आपको इस नियम को अपनी जोखिम लेने की क्षमता के अनुसार थोड़ा-बहुत बदलना चाहिए.
आजकल लोगों की जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) बढ़ गई है और महंगाई भी ज्यादा है. इसलिए, कुछ एक्सपर्ट्स अब '110 - उम्र' या '120 - उम्र' के नियम को अपनाने की सलाह देते हैं, ताकि लंबी अवधि के लिए आपके पोर्टफोलियो में ग्रोथ की गुंजाइश बनी रहे.
इक्विटी: डायरेक्ट शेयर, इक्विटी म्यूचुअल फंड (लार्ज-कैप, मिड-कैप, फ्लेक्सी-कैप), ELSS.
डेट: पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF), फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), सरकारी बॉन्ड, डेट म्यूचुअल फंड.
हां, साल में कम से कम एक बार अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करना और उसे अपनी मौजूदा उम्र के अनुसार रीबैलेंस करना एक अच्छी आदत है.
बिल्कुल. अगर आप ज्यादा जोखिम लेने में सहज हैं, तो आप '110 - उम्र' या '120 - उम्र' का नियम अपना सकते हैं. इससे आपके पोर्टफोलियो में इक्विटी का हिस्सा बढ़ जाएगा.
ये नियम उन लोगों पर कम लागू होता है जिनके पास बहुत विशिष्ट लक्ष्य या बहुत ज्यादा संपत्ति है. ऐसे लोगों को अक्सर एक पेशेवर वित्तीय सलाहकार की जरूरत होती है जो उनके लिए एक बेहतर योजना बना सके.