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भारत में ज्यादातर सरकारी और प्राइवेट नौकरियों में रिटायरमेंट की उम्र आमतौर पर 60 साल की ही मानी जाती है. लेकिन पिछले कुछ साल में कई कर्मचारी 60 साल से पहले ही नौकरी छोड़ने का ऑप्शन चुन रहे हैं. इसको ही VRS यानी Voluntary Retirement Scheme कहा जाता है,यानी कि रिटायरमेंट के साल पूरे होने से पर ही रिटायरमेंट ले लेना.
वैसे कई लोगों के मन में यह सवाल होता है कि अगर कोई कर्मचारी 55 साल की उम्र में VRS ले लेता है, तो क्या उसे अगले 5 साल तक वही सैलरी मिलती रहती है जो नौकरी के दौरान मिलती थी? इस सवाल को लेकर काफी भ्रम है। असल में नियम इससे थोड़ा अलग है.
वीआरएस यानी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना ऐसी व्यवस्था है, जिसमें कर्मचारी तय रिटायरमेंट उम्र (आमतौर पर 58–60 साल) से पहले अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ सकते हैं. कई बार कंपनियां खर्च कम करने या संगठन में बदलाव करने के लिए यह योजना लाती हैं. इसमें कर्मचारी को नौकरी छोड़ने के बदले एकमुश्त मुआवजा दिया जाता है. इसके साथ ही पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य रिटायरमेंट लाभ भी मिल सकते हैं.कई लोग वीआरएस इसलिए चुनते हैं ताकि वे जल्दी रिटायर होकर कोई नया काम शुरू कर सकें या परिवार के साथ ज्यादा समय बिता सकें.
कई बार लोगों को लगता है कि उन्हें 5 साल की सैलरी मिल गई है, लेकिन वास्तव में यह केवल एक कैलकुलेशन का तरीका होता है.असल में इसमें बोनस, इंसेंटिव या अन्य भत्ते शामिल नहीं होते हैं.

VRS का मुआवजा तय करने के लिए आमतौर पर दो तरीके यूज किए जाते हैं.
1. सर्विस के सालों के आधार पर: हर पूरे साल की सेवा के बदले लगभग 3 महीने की सैलरी दी जाती है.
2. रिटायरमेंट तक बचे टाइम के आधार पर: कर्मचारी की रिटायरमेंट उम्र तक जितने महीने बाकी हैं, उतने महीनों की सैलरी का हिसाब लगाते हैं.
इन दोनों में से जो राशि कम होती है, वही कर्मचारी को दी जाती है.
उदाहरण के तौर पर अगर कोई कर्मचारी 55 साल में VRS लेता है और उसकी रिटायरमेंट उम्र 60 साल है, तो उसकी बची हुई सर्विस लगभग 5 साल यानी करीब 60 महीने मानी जाएगी. इसी आधार पर मुआवजे की गणना की जाती हैय
कई कर्मचारी VRS इसलिए लेते हैं क्योंकि वे नौकरी के तनाव से जल्दी छुटकारा चाहते हैं या कोई नया काम शुरू करना चाहते हैं.इसके अलावा कई बार कंपनी भी कर्मचारियों को यह ऑप्शन देती है ताकि खर्च कम किया जा सके.
हर कर्मचारी VRS के लिए पात्र नहीं होता.आमतौर पर कुछ शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं.
VRS लेने के लिए सामान्य शर्तें:
सरकारी बैंकों और पीएसयू में यह स्कीम अक्सर तब अप्लाई की जाती है जब स्टाफ जरूरत से ज्यादा हो जाता है.जबकि प्राइवेट कंपनियां अपनी फाइनेंशियल स्थिति के अनुसार यह स्कीम लाती हैं.

VRS लेने का फैसला काफी बड़ा होता है, इसलिए जल्दबाजी में डिसीजन नहीं लें.
ध्यान रखने वाली बातें:
अगर सही योजना बनाकर VRS लिया जाए तो यह फ्यूचर के लिए अच्छा फैसला साबित हो सकता है.
VRS कई कर्मचारियों के लिए नई शुरुआत का मौका बन सकता है, लेकिन इसके रूल और गणित समझना बेहद जरूरी है.जी हां सबसे अहम बात यह है कि 55 साल में VRS लेने पर अगले 5 साल की सैलरी हर महीने नहीं मिलती, बल्कि कंपनी एक तय फॉर्मूले के आधार पर एकमुश्त रकम देती है.तो इसलिए VRS लेने से पहले पूरे नियम और वित्तीय असर को अच्छी तरह समझ लेना ही समझदारी है.
FAQs
1. VRS क्या होता है?
VRS यानी Voluntary Retirement Scheme के तहत कर्मचारी तय रिटायरमेंट उम्र से पहले अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ सकते हैं और बदले में एकमुश्त मुआवजा मिलता है
2. क्या 55 साल में VRS लेने पर 5 साल की सैलरी मिलती है?
नहीं, हर महीने सैलरी नहीं मिलती। कंपनी एक तय फॉर्मूले के आधार पर एकमुश्त मुआवजा देती है
3. VRS का कैलकुलेशन कैसे होता है?
आमतौर पर दो फॉर्मूले लागू होते हैं-हर साल की सेवा के बदले 3 महीने की सैलरी या रिटायरमेंट तक बचे महीनों के आधार पर सैलरी
4. कौन कर्मचारी VRS ले सकता है?
आमतौर पर 40 साल से ज्यादा उम्र और 10 साल की सेवा पूरी करने वाले कर्मचारी VRS के लिए पात्र होते हैं
5. क्या VRS पर टैक्स देना पड़ता है?
आयकर नियमों के तहत VRS पर मिलने वाली राशि में ₹5 लाख तक टैक्स छूट मिल सकती है, बाकी रकम पर टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है
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