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क्या आपने कभी सोचा है कि महीना खत्म होते-होते आपकी जेब खाली क्यों हो जाती है, जबकि आपने कोई बड़ी खरीदारी भी नहीं की? इसका जवाब उन 'साइलेंट ईएमआई' (Silent EMIs) में छिपा हो सकता है, जिन्हें आप कर्ज ही नहीं मानते. ₹99 का म्यूजिक ऐप, ₹199 का ओटीटी या ₹499 की जिम मेंबरशिप- अकेले ये बहुत छोटे लगते हैं, लेकिन साथ मिलकर ये आपकी आर्थिक सेहत बिगाड़ रहे हैं. आइए, समझते हैं कि ये 'साइलेंट ईएमआई' क्या हैं और आप इनसे कैसे बच सकते हैं.
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ये वह मासिक भुगतान हैं जिनके बारे में हम ज्यादा नहीं सोचते. पिछले एक दशक में इनका दायरा बढ़ गया है:
मनोरंजन: नेटफ्लिक्स, प्राइम या अन्य स्ट्रीमिंग ऐप.
तकनीक: क्लाउड स्टोरेज (Google One, iCloud) और प्रीमियम ऐप सब्सक्रिप्शन.
लाइफस्टाइल: जिम, क्लब मेंबरशिप और मोबाइल बिल.
स्मार्टफोन ईएमआई: ₹80,000 का फोन जब ₹2,000 की मंथली किस्त पर मिलता है, तो वह सस्ता लगने लगता है, जिसे 'Affordability का भ्रम' कहा जाता है.
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कर्ज जैसा व्यवहार: ये किसी लोन की तरह ही हर महीने आपके खाते से पैसे काटते हैं, लेकिन हम इन्हें 'उधार' नहीं मानते.
ऑटोमैटिक रिन्यूअल: आज के डिजिटल युग में ये भुगतान मशीन-मैनेज्ड हैं. बैंक नियमों के कारण छोटे पेमेंट के लिए हर बार आपकी अनुमति नहीं चाहिए होती, जिससे आपका ध्यान इन पर नहीं जाता.
दिमाग का भ्रम: हमारा दिमाग ₹5,000 को बड़ा खर्च मानता है, लेकिन ₹499 के 10 अलग-अलग खर्चों को 'हल्का' समझता है. हालांकि, अंत में दोनों की ही वैल्यु एक बराबर आती है.
एक मेट्रो सिटी में रहने वाले परिवार के 'साइलेंट' खर्च कुछ इस तरह दिख सकते हैं:
| खर्च का प्रकार | मासिक खर्च (₹) |
|---|---|
| स्ट्रीमिंग सब्सक्रिप्शन (OTT) | ₹1,200 |
| मोबाइल और इंटरनेट | ₹2,000 |
| क्लाउड स्टोरेज और ऐप्स | ₹300 |
| जिम और ट्रेनर फीस | ₹2,000 |
| स्मार्टफोन ईएमआई | ₹2,000 |
| कुल मासिक खर्च | ₹7,500 |
| कुल वार्षिक खर्च | ₹90,000 |
सोचिए, ₹90,000 वह बड़ी रकम है, जिसका उपयोग आप बेहतर निवेश या भविष्य के लक्ष्यों के लिए कर सकते थे. खैर, यहां तो लिस्ट बस कुछ चीजों की है, जबकि लोग इससे भी ज्यादा खर्चे करते हैं.
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आरबीआई के अनुसार, भारत में क्रेडिट कार्ड का बकाया ₹2.8 ट्रिलियन के पार पहुंच गया है. इसका बड़ा कारण छोटी टिकट वाली खरीदारी (जैसे फूड ऑर्डर, ऑनलाइन शॉपिंग) है. भारतीय परिवार अपनी कमाई का महज 5-6% ही बचा पा रहे हैं और साइलेंट ईएमआई इस बचत को और कम कर रही हैं.
फाइनेंशियल फ्रीडम का रास्ता कमाई बढ़ाने से ज्यादा खर्चों को समझने से शुरू होता है. यहां 4 आसान तरीके दिए गए हैं:
सब्सक्रिप्शन ऑडिट: अपने बैंक स्टेटमेंट और यूपीआई ट्रांजेक्शन चेक करें. जो ऐप पिछले दो महीनों से इस्तेमाल नहीं किया, उसे तुरंत कैंसिल करें.
एक लें, एक छोड़ें (Buy One, Leave One): अगर आप नया सब्सक्रिप्शन ले रहे हैं, तो पुराने वाले को बंद करें.
10% की सीमा तय करें: अपनी कुल आय का अधिकतम 10% ही ईएमआई (साइलेंट ईएमआई सहित) के लिए रखें.
नजरिया बदलें: इसे 'त्याग' न समझें, बल्कि इसे अपनी 'वित्तीय आजादी' और 'आत्मविश्वास' बढ़ाने का तरीका मानें.
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फाइनेंशियल फ्रीडम बड़े फैसलों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सुधारों से आती है. जब आप ₹199 या ₹499 के खर्च पर नियंत्रण पाते हैं, तब आपका पैसा आपके लिए काम करना शुरू करता है. जागरूक बनें और अपनी मेहनत की कमाई को 'साइलेंट' तरीके से खत्म होने से बचाएं.
1- साइलेंट ईएमआई और सामान्य ईएमआई में क्या अंतर है?
सामान्य ईएमआई लोन के लिए होती है, जबकि साइलेंट ईएमआई छोटे सब्सक्रिप्शन और सेवाओं के लिए होती है जिन्हें हम अक्सर भूल जाते हैं.
2- क्या क्रेडिट कार्ड का बढ़ता बकाया इसी का परिणाम है?
हां, छोटे-छोटे खर्चों को 'छोटा' मानकर नजरअंदाज करना ही क्रेडिट कार्ड बिल को बढ़ाता है.
3- ऑटोमैटिक पेमेंट को कैसे रोकें?
आप अपने बैंक के मोबाइल ऐप या नेट बैंकिंग के जरिए 'Mandates' सेक्शन में जाकर अनचाहे भुगतान को बंद कर सकते हैं.
4- स्मार्टफोन ईएमआई को साइलेंट ईएमआई क्यों कहा गया है?
क्योंकि किस्त के कारण फोन की वास्तविक कीमत (जैसे ₹80,000) हमारे दिमाग में छिप जाती है और हमें केवल ₹2,000 का खर्च ही दिखता है.
5- क्या सभी सब्सक्रिप्शन बंद कर देने चाहिए?
नहीं, केवल उन्हीं को बंद करें जिनका आप उपयोग नहीं कर रहे हैं या जो आपकी आय के अनुपात में बहुत ज्यादा हैं.
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