फरवरी में 28 दिन काम करने पर ही मिल जाती है पूरी सैलरी, तो क्या मार्च में भी 28 दिन काम करेंगे तो बराबर मिलेगी पगार?

कभी आपने ये सोचा है कि 28 दिन काम करें या 31, सैलरी उतनी ही क्यों हमेशा मिलती है? तो इसलिए आप जानिए HR का एक छुपा हुआ फॉर्मूला और समझिए CTC का असली खेल क्या होता है?
फरवरी में 28 दिन काम करने पर ही मिल जाती है पूरी सैलरी, तो क्या मार्च में भी 28 दिन काम करेंगे तो बराबर मिलेगी पगार?

हर महीने की पहली तारीख को मैसेज टोन बजती है और चेहरे पर मुस्कान आ जाती है - "Salary has been credited". लेकिन क्या आपने कभी अपनी सैलरी स्लिप को ध्यान से देखकर ये सोचा है कि फरवरी में 28 या 29 दिन काम करने पर भी उतनी ही सैलरी क्यों ही आती है, जितनी महीने में 31 दिन काम करने पर आती है?

आपके मन में ये सवाल होना चाहिए कि आखिर ये कैसा गणित है? या क्या कंपनी आपको 2-3 दिन की सैलरी मुफ्त में दे रही है या कहीं आपके साथ कोई खेल हो रहा है? तो फिर चलिए, आज सैलरी कैलकुलेशन के इस सबसे बड़े कंफ्यूजन को समझते हैं कि हमारी मेहनत की कमाई का हिसाब-किताब कैसे होता है.

क्यों बराबर रहती है हर महीने की सैलरी?

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सबसे पहले इस गलतफहमी को दूर कर दीजिए कि आपको हर दिन के हिसाब से सैलरी मिलती है. अगर आप एक salaried employee हैं, तो कंपनी आपको दिहाड़ी पर नहीं रखती है.

इसके लिए ये है असली फॉर्मूला:

असल में जब आप कोई कंपनी ज्वाइन करते हैं, तो आपकी एक सालाना सैलरी तय होती है, जिसे CTC (Cost To Company) कहा जाता है.हर एक कंपनी बस इसी सालाना पैकेज को 12 बराबर महीनों में बांट देती है. यानी सालाना CTC ÷ 12 = आपकी मासिक ग्रॉस सैलरी.इस फॉर्मूले में महीना 28 दिन का है या 31 का, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है.असल में कंपनी आपको साल भर के लिए नौकरी पर रखती है और वह उसी हिसाब से आपको 12 किस्तों में पेमेंट किया जाता है, तो इसलिए आपकी महीने की सैलरी हमेशा एक जैसी ही रहती है.

असली खेल तो अब शुरू होता है

अब आप सोच रहे होंगे कि अगर दिनों से फर्क नहीं पड़ता, तो फिर 'गोलमाल' असल में होता कहां है? असल में असली खेल तब शुरू होता है जब आप महीने के बीच में छुट्टी लेते हैं (Loss of Pay) या कंपनी ज्वाइन करते/छोड़ते हैं. यहीं पर दिनों का गणित आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है.

वैसे एक दिन की सैलरी काटने के लिए कंपनियां अक्सर दो तरीके अपनाती हैं-

1. कैलेंडर डेज मेथड

इस तरीके में, आपकी एक दिन की सैलरी निकालने के लिए मंथ की सैलरी को उस महीने के कुल दिनों से भाग दिया जाता है.
उदाहरण: अगर आपकी सैलरी ₹31,000 है
मार्च (31 दिन): एक दिन की सैलरी होगी ₹31,000 ÷ 31 = ₹1000
फरवरी (28 दिन): एक दिन की सैलरी होगी ₹31,000 ÷ 28 = ₹1107 (करीब)
यह तरीका कर्मचारी के लिए फायदेमंद साथ ही कानूनन सही माना जाता है.

2. फिक्स्ड डेज मेथड

कुछ कंपनियां चालाकी से हर महीने के लिए 26 या 30 दिन का एक फिक्स्ड नंबर मानकर चलती हैं, चाहे उस महीने में कितने भी दिन क्यों ना हों.
उदाहरण: अगर कंपनी 30 दिन का फिक्स्ड हिसाब रखती है और आपकी सैलरी ₹31,000 है.
मार्च (31 दिन): आपकी एक दिन की सैलरी ₹31,000 ÷ 30 = ₹1033 मानी जाएगी. तो अगर आप एक दिन की छुट्टी लेते हैं, तो आपके ₹1033 कटेंगे, जबकि कटने सिर्फ ₹1000 चाहिए थे. यानी कि आपको ₹33 का नुकसान हो सकता है.लेकिन फरवरी (28 दिन) में यहां आपकी एक दिन की सैलरी ₹1033 मानी जाएगी तो अगर आप छुट्टी लेंगे तो आपको फायदा हो सकता है.

आपको क्या करना चाहिए?

ज्वाइनिंग से पहले अपनी कंपनी के HR से पूछें कि वो 'Loss of Pay' के लिए कौन सा मेथड इस्तेमाल करते हैं, कैलेंडर डेज या फिक्स्ड डेज. इसके अलावा जब भी आपकी सैलरी कटे, तो अपनी सैलरी स्लिप में कैलकुलेशन को ध्यान से देखना चाहिए.वैसे 'पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट' भी कैलेंडर डेज मेथड को ही सही मानते हैं.तो अगली बार जब सैलरी स्लिप हाथ में आए, तो सिर्फ क्रेडिट हुआ अमाउंट देखकर खुश न हों, उसके पीछे का गणित भी समझें.(नोट: खबर सामान्य जानकारी पर आधारित है)

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