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नौकरीपेशा लोगों के लिए सबसे बड़ा सहारा उनकी सैलरी होती है. हर महीने फिक्स रकम अकाउंट में आने से खर्चे और बचत दोनों की प्लानिंग आसान हो जाती है. लेकिन अक्सर दिमाग में एक सवाल आता है कि जब हर महीने में दिनों की संख्या अलग होती है तो सैलरी हर महीने एक जैसी क्यों आती है? फरवरी 28 दिन की होती है, अप्रैल, जून, सितंबर और नवंबर 30 दिन के और जनवरी, मार्च, मई, जुलाई, अगस्त, अक्टूबर और दिसंबर 31 दिन के, लेकिन फिर भी सैलरी हमेशा 30 दिन की ही कैलकुलेट की जाती है. आखिर क्या है 30-Days Salary Formula. यहां जानिए.
कंपनियों को हर महीने सैलरी बनाना होती है. अगर वो हर महीने दिनों के हिसाब से सैलरी बदलें तो पूरा प्रोसेस मुश्किल हो जाएगा. इसलिए ज्यादातर कंपनियां एक स्टैंडर्ड 30-Day Month Rule अपनाती हैं. ऐसे में फॉर्मूला होता है-
इससे हिसाब आसान हो जाता है और कोई कंफ्यूजन नहीं होता.
जब भी नौकरी ज्वाइन होती है, कर्मचारी की CTC सालाना आधार पर तय होती है. कंपनियां यही सालाना वेतन 12 हिस्सों में बांटकर हर महीने की फिक्स सैलरी बनाती हैं. यही कारण है कि फरवरी छोटे महीने में भी उतनी ही सैलरी मिलती है जितनी 31 दिन वाले महीने में मिलती है.
सैलरी का ये फॉर्मूला कर्मचारियों के लिए भी फायदेमंद होता है. अगर हर महीने सैलरी बढ़े घटे तो बजट बनाना मुश्किल हो जाएगा. फिक्स सैलरी से फायदा ये होता है कि हर महीने तय रकम आती है. इससे EMI और बिल मैनेज करना आसान हो जाता है. सेविंग और निवेश की प्लानिंग करना आसान होता है. फाइनेंशियल स्ट्रेस भी कम रहता है.
नहीं. ये 30 दिन वाला नियम खासतौर पर सैलरीड कर्मचारियों पर लागू होता है, जहां मासिक सैलरी तय होती है. लेकिन जिन सेक्टरों में डे-वेजेज (Daily Wages), घंटे के हिसाब से पेमेंट (Hourly Pay), ओवरटाइम बेस्ड इनकम होती है, वहां भुगतान दिन या घंटे के अनुसार ही किया जाता है.
कुल मिलाकर महीने में दिन कितने भी हों, सैलरी इसलिए फिक्स रहती है क्योंकि कंपनियां सालाना CTC को 12 हिस्सों में बांटकर एक स्टैंडर्ड 30-Day Formula का इस्तेमाल करती हैं. इससे कंपनी और कर्मचारी, दोनों का काम आसान हो जाता है.