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नया आदेश आरक्षण नीति को बदलने के लिए नहीं है. (प्रतीकात्मक फोटो)
केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने आरक्षित रिक्तियों (Reserved Vacancies) के De-reservation यानी आरक्षण हटाने से जुड़े मामलों के निपटारे की समयसीमा में बदलाव किया है. नया आदेश मुख्य रूप से उन प्रस्तावों के लिए है जो मंत्रालय और विभाग आरक्षित पदों को सामान्य श्रेणी में बदलने के लिए भेजते हैं. सरकार का कहना है कि इससे ऐसे मामलों का तेजी से निपटारा होगा और लंबे समय तक फाइलें लंबित रहने की समस्या कम होगी.
सरकारी नौकरियों में कुछ पद अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षित होते हैं.
लेकिन कुछ परिस्थितियों में ऐसा होता है कि आरक्षित श्रेणी का उपयुक्त उम्मीदवार उपलब्ध नहीं हो पाता. ऐसे मामलों में संबंधित मंत्रालय या विभाग उस पद को सामान्य श्रेणी में बदलने यानी "De-reserve" करने का प्रस्ताव भेज सकता है.
हालांकि यह प्रक्रिया पूरी तरह नियंत्रित और नियमबद्ध होती है. केंद्र सरकार ने वर्षों पहले स्पष्ट कर दिया था कि सीधे भर्ती (Direct Recruitment) वाले पदों के De-reservation पर सामान्य प्रतिबंध है.
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DoPT के अनुसार, कई मामलों में De-reservation से जुड़े प्रस्ताव अलग-अलग स्तरों पर लंबे समय तक लंबित रहते थे. इससे भर्ती प्रक्रिया प्रभावित होती थी और पद खाली पड़े रहते थे.
इसी समस्या को देखते हुए विभाग ने प्रस्तावों की जांच और मंजूरी के लिए नई समयसीमा तय की है, ताकि संबंधित मंत्रालय और विभाग निर्धारित अवधि के भीतर कार्रवाई कर सकें.
आरक्षित पदों के मामले में नियम काफी सख्त हैं.
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अगर किसी मंत्रालय को लगता है कि सार्वजनिक हित में पद खाली नहीं छोड़ा जा सकता, तो उसे कई स्तरों से मंजूरी लेनी होती है.
SC पद के लिए
ST पद के लिए
OBC पद के लिए
इसके बाद मामला एक उच्चस्तरीय समिति के पास जाता है. इस समिति में संबंधित मंत्रालय, सामाजिक न्याय मंत्रालय और DoPT के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होते हैं. अंत में DoPT के प्रभारी मंत्री की मंजूरी के बाद ही De-reservation की अनुमति दी जा सकती है.
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प्रत्यक्ष भर्ती के मुकाबले पदोन्नति (Promotion) वाले मामलों में नियम अपेक्षाकृत अलग हैं.
कुछ परिस्थितियों में मंत्रालयों और विभागों को स्वयं De-reservation की शक्तियां दी गई हैं. हालांकि इसके लिए भी निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है.
नया आदेश आरक्षण नीति को बदलने के लिए नहीं है.
यह आदेश मुख्य रूप से "प्रस्तावों पर विचार करने की समयसीमा" से जुड़ा है.
यानी:
इन सभी चरणों को समयबद्ध बनाने की कोशिश की गई है.
इस आदेश का सीधा असर भर्ती प्रक्रिया पर पड़ सकता है.
संभावित फायदे
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नहीं.
यह आदेश आरक्षण नीति में कोई बदलाव नहीं करता.
आरक्षित पदों के De-reservation पर पहले की तरह कड़े नियम लागू रहेंगे. नया बदलाव केवल प्रशासनिक प्रक्रिया को तेज करने के लिए किया गया है.
एक नजर में नया और पुराना सिस्टम
| विषय | पहले | अब |
| De-reservation प्रस्ताव | कई मामलों में लंबित | तय समयसीमा में निपटाने पर जोर |
| मंत्रालयों की कार्रवाई | अलग-अलग गति | समयबद्ध प्रक्रिया |
| भर्ती पर असर | देरी की संभावना | तेजी आने की उम्मीद |
| आरक्षण नीति | यथावत | कोई बदलाव नहीं |
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DoPT का नया आदेश आरक्षण व्यवस्था में बदलाव नहीं करता, बल्कि De-reservation से जुड़े प्रस्तावों को समयबद्ध तरीके से निपटाने की दिशा में एक प्रशासनिक सुधार है. सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षित पदों से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने में अनावश्यक देरी न हो और भर्ती प्रक्रिया प्रभावित न हो. हालांकि आरक्षित पदों को सामान्य श्रेणी में बदलने के नियम पहले की तरह सख्त बने रहेंगे और केवल विशेष परिस्थितियों में ही इसकी अनुमति दी जाएगी.
आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 De-reservation का मतलब क्या होता है?
आरक्षित पद को विशेष परिस्थितियों में सामान्य श्रेणी के पद में बदलना.
Q2 क्या नए आदेश से आरक्षण खत्म हो जाएगा?
नहीं, यह आदेश सिर्फ प्रक्रिया और समयसीमा से जुड़ा है.
Q3 Direct Recruitment में De-reservation की अनुमति है?
सामान्य तौर पर नहीं. केवल दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में अनुमति दी जा सकती है.
Q4 SC, ST और OBC पदों के De-reservation के लिए किसकी राय जरूरी होती है?
क्रमशः NCSC, NCST और NCBC की.
Q5 नया आदेश किस मंत्रालय ने जारी किया है?
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने 26 मई 2026 के कार्यालय ज्ञापन के जरिए यह संशोधन जारी किया है.