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RBI जल्द बदल सकता है लिक्विडिटी मैनेजमेंट का तरीका
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अपने लिक्विडिटी मैनेजमेंट फ्रेमवर्क में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है. ज़ी बिज़नेस को सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, RBI अगले कुछ दिनों में इस सिस्टम की समीक्षा कर सकता है. बैंक चाहता है कि लिक्विडिटी यानी बाजार में नकदी की सप्लाई को ज्यादा लचीला और बाज़ार के अनुकूल बनाया जाए.
इसका सीधा असर बैंकों की कर्ज देने की क्षमता, लोन की दरों और आपकी EMI पर भी पड़ सकता है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि क्या हैं वो अहम बदलाव जो RBI लागू कर सकता है.
14 की बजाय 7 दिन की हो सकती है ऑपरेशन अवधि
अभी तक RBI 14 दिन की अवधि वाले वेरिएबल रेट रेपो (VRR) और रिवर्स रेपो (VRRR) ऑपरेशन करता है. लेकिन नए प्रस्ताव के मुताबिक, इसे 7 दिन का किया जा सकता है. इससे लिक्विडिटी ऑपरेशन ज्यादा तेज हो जाएंगे. बाजार में अचानक नकदी की कमी या ज्यादा सप्लाई के हालात में RBI तुरंत प्रतिक्रिया दे सकेगा. हालांकि, इसका असर उन लोगों पर पड़ सकता है जिनका होम लोन या कार लोन फ्लोटिंग रेट पर आधारित है. ऐसी स्थिति में EMI में उतार-चढ़ाव तेज हो सकता है.
NDTL को बनाया जा सकता है लिक्विडिटी का नया पैमाना
RBI इस बात पर विचार कर रहा है कि बैंकों की लिक्विडिटी ज़रूरतों को उनके कुल डिपॉजिट यानी नेट डिमांड एंड टाइम लाइबिलिटीज़ (NDTL) के अनुपात में तय किया जाए. इससे लिक्विडिटी का बंटवारा ज़्यादा सटीक और संतुलित तरीके से हो पाएगा. बड़े बैंकों में कर्ज देने का कंपटीशन बढ़ सकता है और छोटे बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट और लोन दरों में कुछ इज़ाफा हो सकता है.
ज़रूरत पड़ने पर फिर आ सकते हैं फिक्स्ड रेट ऑपरेशन
सूत्रों का कहना है कि अगर बाजार में अचानक नकदी संकट या अस्थिरता जैसी स्थिति बनती है, तो RBI दोबारा फिक्स्ड रेट ऑपरेशन शुरू कर सकता है. यानी बैंकों को तय दर पर लिक्विडिटी दी जाएगी. इससे बाजार में स्थिरता बनी रह सकती है.
'कॉल मनी रेट' बना रह सकता है मुख्य संकेतक
RBI की मौजूदा नीति के अनुसार, इंटरबैंक लोन यानी कॉल मनी रेट को प्रमुख संकेतक माना जाता है. भविष्य में भी इसे ही मुख्य ऑपरेटिंग टारगेट बनाए रखने की संभावना है. इससे पॉलिसी दरों को समझना आसान होता है और ब्याज दरों में स्थिरता बनी रहती है.
को-ऑपरेटिव बैंकों के लिए भी आई नई व्यवस्था
इसके साथ ही RBI ने को-ऑपरेटिव बैंकों के लिए भी एक नया सर्कुलर जारी किया है. पुराने 'फाइनेंशियली साउंड एंड वेल मैनेज्ड' (FSWM) फ्रेमवर्क को अब हटाकर एक नया सिस्टम लागू किया गया है, जिसे 'एलीजिबिलिटी क्राइटेरिया फॉर बिज़नेस ऑथराइज़ेशन' (ECBA) नाम दिया गया है.
इस नए सिस्टम में को-ऑपरेटिव बैंकों को ज़्यादा स्वायत्तता मिलेगी, बशर्ते वे तय वित्तीय और गवर्नेंस मानकों को पूरा करते हों. इससे इन बैंकों को व्यापार विस्तार में आसानी होगी और वे ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे.