लंबे समय तक कंपनी में सेवाएं देने वाले कर्मचारी को रिटायरमेंट या नौकरी छोड़ने पर ग्रेच्युटी मिलती है. ये रकम एक तरह से कंपनी की ओर से रिवार्ड होती है. लेकिन इसके नियमों को समझना ज़रूरी है ताकि आपका हक ना छूटे.
1/7ग्रेच्युटी की रकम निकालने का फॉर्मूला है – (अंतिम सैलरी) × (कुल काम के साल) × (15/26). अंतिम सैलरी का मतलब है पिछले 10 महीनों की औसत बेसिक सैलरी + डीए + कमीशन. महीने में 4 रविवार वीक ऑफ माने जाते हैं, इसलिए 26 दिन गिने जाते हैं.
2/7अगर किसी प्राइवेट या सरकारी कंपनी में 10 या उससे ज्यादा कर्मचारी हैं, तो उन्हें ग्रेच्युटी देना अनिवार्य है. फैक्ट्री, खान, दुकान जैसी जगहें भी इस दायरे में आती हैं.
3/7अगर आपने 4 साल 8 महीने तक लगातार काम किया है तो ये अवधि 5 साल मानी जाएगी. यानी 4 साल 8 महीने के बाद भी आप ग्रेच्युटी के हकदार बन जाते हैं. अगर सर्विस 4 साल 8 महीने से कम है तो उसे 4 साल ही गिना जाएगा.
4/7नोटिस पीरियड भी सर्विस पीरियड में गिना जाता है. जैसे आपने 4.6 साल नौकरी की और फिर 2 महीने का नोटिस दिया, तो कुल सर्विस 4 साल 8 महीने मानी जाएगी और आपको 5 साल के हिसाब से ग्रेच्युटी मिलेगी.
5/7अगर कंपनी ग्रेच्युटी एक्ट में रजिस्टर्ड नहीं है तो ग्रेच्युटी देना उसकी मर्ज़ी है. ऐसी स्थिति में फॉर्मूला अलग होगा हर साल की आधी महीने की सैलरी × कुल साल, और महीने के 30 दिन गिने जाएंगे, 26 नहीं.
6/7कंपनी अधिकतम 20 लाख रुपए तक ग्रेच्युटी दे सकती है. ये रकम टैक्स फ्री होती है. सरकारी और प्राइवेट दोनों नौकरियों पर ये नियम लागू है.
7/7अगर कर्मचारी की नौकरी के दौरान मौत हो जाती है, तो ग्रेच्युटी का पूरा पैसा उसके नॉमिनी को मिलेगा. इस केस में 5 साल की सर्विस की शर्त लागू नहीं होती.