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जानें 60,000 रुपये सैलरी पर 1 घंटा ओवरटाइम करने पर कितने एक्स्ट्रा पैसे मिलेंगे.
Overtime Calculation: नौकरीपेशा लोगों के लिए अक्सर काम के घंटे तय होते हैं, लेकिन कभी-कभी काम के बोझ की वजह से ऑफिस में ज्यादा रुकना पड़ जाता है. भारत में लागू हो रहे नए लेबर कोड (New Labour Code) ने ओवरटाइम के नियमों को बहुत साफ कर दिया है. अगर आप अपनी तय शिफ्ट के बाद एक्स्ट्रा काम करते हैं, तो कंपनी आपको उस अतिरिक्त समय के लिए दोगुना पैसा देगी.
नियमों के मुताबिक, अगर कोई कर्मचारी अपने सामान्य काम के घंटों से ज्यादा काम करता है, तो नियोक्ता को उसे हर एक्स्ट्रा घंटे के लिए सामान्य मजदूरी की दर से कम से कम दोगुनी दर पर ओवरटाइम का भुगतान करना होगा. आइए समझते हैं कि 60,000 रुपये की सैलरी वालों के लिए यह गणित कैसे काम करेगा.
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ओवरटाइम निकालने के लिए सबसे पहले हमें आपकी एक घंटे की 'नॉर्मल वेज' (Normal Wage) निकालनी होगी. ध्यान रहे, ओवरटाइम का कैलकुलेशन बेसिक सैलरी पर होता है, ना कि सीटीसी पर. यानी यहां ओवरटाइम का कैलकुलेशन 30 हजार रुपये पर होगा, ना कि 60 हजार रुपये पर. मान लीजिए कि महीने में 26 वर्किंग डे हैं और आप हर दिन 8 घंटे काम करते हैं.
30,000/26 दिन = करीब 1,153 रुपये
1,153/8 घंटे = करीब 144 रुपये
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नियम के अनुसार, यह दर दोगुनी होगी:
144 रुपये x 2 = 288 रुपये
यानी अगर आपकी सैलरी 60,000 रुपये है, तो 1 घंटे के ओवरटाइम के बदले आपको लगभग 288 रुपये एक्स्ट्रा मिलने चाहिए.
महीने में यहां 26 दिन के हिसाब से कैलकुलेशन की जा रही है, तो महीने में आपको करीब 7488 रुपये अतिरिक्त मिलेंगे.
288 x 26 दिन= 7488 रुपये
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नए लेबर कोड के तहत, अगर आपकी सीटीसी 60,000 रुपये है, तो कंपनी को आपकी बेसिक सैलरी कम से कम 30,000 रुपये (50%) रखनी ही होगी. जैसे ही आपकी बेसिक सैलरी बढ़ेगी, आपके पीएफ और ग्रेच्युटी का कैलकुलेशन भी इसी बढ़ी हुई राशि पर होगा. नए लेबर कोड के बाद का स्ट्रक्चर ये होगा.
| कंपोनेंट (Component) | राशि (₹) |
| कुल सैलरी (CTC) | 60,000 |
| बेसिक सैलरी (50% of CTC) | 30,000 |
| पीएफ - कर्मचारी योगदान (12% of Basic) | 3,600 |
| पीएफ - नियोक्ता योगदान (12% of Basic) | 3,600 |
| ग्रेच्युटी (नया मासिक प्रावधान) | 1,443 |
| स्पेशल अलाउंस (बाकी बची राशि) | 21,357 |
| इन-हैंड सैलरी (Basic + Special Allowance) | 51,357 |
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जब 30 हजार रुपये की बेसिक सैलरी पर पीएफ कैलकुलेट हो रहा है, तो वह 7200 रुपये बन रहा है. हालांकि, अगर आप इस न्यूनतम अनिवार्य सीमा (15 हजार रुपये) तक ही कटवाएं, तो इस पर आपका पीएफ डिडक्शन 3600 रुपये (1800+1800) ही बनेगा. इससे आपका पीएफ में योगदान घट जाएगा और आपकी इन-हैंड सैलरी बढ़ जाएगी. ऐसे में सैलरी का ब्रेकअप कुछ इस तरह होगा.
| कंपोनेंट (Component) | राशि (₹) |
| कुल सैलरी (CTC) | 60,000 |
| बेसिक सैलरी (50% of CTC) | 30,000 |
| पीएफ - कर्मचारी योगदान (12% of Basic) | 1,800 |
| पीएफ - नियोक्ता योगदान (12% of Basic) | 1,800 |
| ग्रेच्युटी (नया मासिक प्रावधान) | 1,443 |
| स्पेशल अलाउंस (बाकी बची राशि) | 24,957 |
| इन-हैंड सैलरी (Basic + Special Allowance) | 54,957 |
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नए लेबर कोड और ओवरटाइम के नियमों ने कर्मचारियों के हितों को केंद्र में रखा है. ओवरटाइम के लिए दोगुना पैसा मिलने से आपकी अतिरिक्त मेहनत का सही मोल मिलेगा. 60,000 रुपये कमाने वाले व्यक्ति के लिए इन-हैंड सैलरी का कम-ज्यादा होना इस बात पर निर्भर करेगा कि वह न्यूनतम पीएफ योगदान को चुनता है या अधिकतम.
सवाल 1: ओवरटाइम की दर क्या होनी चाहिए?
जवाब: नए नियमों के अनुसार ओवरटाइम की दर सामान्य वेतन से कम से कम दोगुनी होनी चाहिए.
सवाल 2: क्या बेसिक सैलरी 50% रखना अनिवार्य है?
जवाब: हां, नए लेबर कोड के तहत बेसिक सैलरी कुल सीटीसी का कम से कम 50% होनी चाहिए.
सवाल 3: इन-हैंड सैलरी कम होने का मुख्य कारण क्या है?
जवाब: बेसिक सैलरी बढ़ने से पीएफ और ग्रेच्युटी में कटौती बढ़ जाती है, जिससे हाथ में आने वाला पैसा कम हो जाता है.
सवाल 4: पीएफ में कितना योगदान दिया जाता है?
जवाब: पीएफ में बेसिक सैलरी का 12 फीसदी कर्मचारी डालता है और 12 फीसदी ही नियोक्ता डालता है.
सवाल 5: क्या ये नियम सभी कंपनियों पर लागू होंगे?
जवाब: हां, नया लेबर कोड लागू होने के बाद यह सभी संगठित क्षेत्रों की कंपनियों पर लागू होगा.
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