बड़ी राहत! इंट्रा डे या शॉर्ट टर्म शेयरों की खरीद-फरोख्त का ब्यौरा देने की जरूरत नहीं

बाजार में एक ही ट्रेडिंग दिन में शेयर खरीदने और बेचने को इंट्रा डे ट्रेडिंग कहते हैं.
बड़ी राहत! इंट्रा डे या शॉर्ट टर्म शेयरों की खरीद-फरोख्त का ब्यौरा देने की जरूरत नहीं

वित्त मंत्रालय (finance ministry) ने कहा कि इंट्रा डे ट्रेडिंग (Intra day stock trading) या लिस्टिड शेयरों की कम समय की खरीद या बिक्री के लिए आयकर रिटर्न फार्म में हर शेयर का अलग-अलग ब्यौरा देना जरूरी नहीं है. (Image-Pixabay)

वित्त मंत्रालय (finance ministry) ने कहा कि इंट्रा डे ट्रेडिंग (Intra day stock trading) या लिस्टिड शेयरों की कम समय की खरीद या बिक्री के लिए आयकर रिटर्न फार्म में हर शेयर का अलग-अलग ब्यौरा देना जरूरी नहीं है.

शेयर ट्रेडर्स या दैनिक ट्रेडर्स के मामले में शेयरों की खरीद-बिक्री से होने वाले फायदे को आमतौर पर शॉर्टटर्म पूंजीगत लाभ या व्यावसायिक आय के रूप में बांटा जाता है, क्योंकि ज्यादातर ममलों में शेयरों की होल्डिंग अवधि एक साल से कम होती है, जो लॉन्गटर्म पूंजीगत लाभ (long term capital gain) के रूप में वर्गीकृत की एक शर्त है.

वित्त मंत्रालय ने कहा कि शेयर लेनदेन से होने वाली शॉर्टटर्म या व्यावसायिक आय (business income) के मामले में आयकर रिटर्न में हर शेयर का ब्यौरा देना जरूरी नहीं है.

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वित्त मंत्रालय की यह सफाई उन रिपोर्टों के बीच आई है कि शेयर ट्रेडर्स या दैनिक ट्रेडर्स को वित्त वर्ष 2020-21 के अपने आयकर रिटर्न में शेयरों का ब्यौरा देना होगा.

इंट्रा डे ट्रेडिंग
बाजार में एक ही ट्रेडिंग दिन में शेयर खरीदने और बेचने को इंट्रा डे ट्रेडिंग कहते हैं. यहां शेयर खरीदने का मकसद निवेश करना नहीं, बल्कि एक दिन में उसमें होने वाली बढ़त से मुनाफा कमाना होता है. इसमें सुबह पैसा लगाकर दोपहर तक कमाई की जा सकती है. इसमें जरूरी नहीं है कि आपको फायदा ही हो.

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डे-ट्रेडिंग करने के लिए आपके पास डीमैट अकाउंट और एक ट्रेडिंग अकाउंट होना चाहिए. इस अकाउंट में आप या तो ब्रोकर को ऑर्डर देकर शेयर का कारोबार कर सकते हैं या खुद ऑनलाइन ट्रेडिंग कर सकते हैं.

कैपिटल गेन
जो लोग ज्यादा पैसा कमाते हैं, सरकार उनसे टैक्स भी ज्यादा लेती है. इक्विटी, इक्विटी म्युचुअल फंड में वे ही लोग पैसा लगाते हैं जिनकी कमाई बहुत है और तमाम खर्चे करने के बाद अच्छी बचत हो जाती है. ऐसे में सरकार इस तरह के निवेश से होने वाली कमाई पर भी टैक्स लेती है. इस टैक्स को कैपिटल गेन टैक्स कहते हैं.

कैपिटल गेन टैक्स दो तरह का होता है, शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म. इन पर टैक्स की दर भी अलग-अलग होती है.

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