&format=webp&quality=medium)
क्या SIP बना रुपये की कमजोरी की वजह? प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
भारतीय रुपये में लगातार कमजोरी को लेकर अब एक नई वजह सामने आई है. अब तक माना जा रहा था कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और चालू खाता घाटा रुपये पर दबाव बना रहे हैं, लेकिन ग्लोबल ब्रोकरेज Jefferies की नई रिपोर्ट ने अलग तस्वीर पेश की है. रिपोर्ट के मुताबिक SIP और घरेलू निवेश के जरिए शेयर बाजार में आ रहा लगातार पैसा भी रुपये की कमजोरी का बड़ा कारण बन सकता है.
Jefferies ने अपनी रिपोर्ट “INR Pressure - The Downside of SIPs” में कहा कि भारतीय शेयर बाजार में घरेलू निवेशकों की लगातार खरीदारी ने विदेशी निवेशकों को अपनी हिस्सेदारी बेचने का आसान मौका दिया.
रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दो वर्षों में इक्विटी बाजार से जुड़े आउटफ्लो करीब 78 अरब डॉलर तक पहुंच गए. इसमें विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी FPI, प्राइवेट इक्विटी फर्म और विदेशी प्रमोटर्स शामिल रहे, जिन्होंने भारतीय बाजार को महंगा मानते हुए अपनी हिस्सेदारी कम की.
ये भी पढ़ें: Mutual Fund में SIP का बदलने वाला है तरीका, SEBI ने बना लिया है प्लान, जल्दी ही इसमें आएगा PF-NPS वाला सिस्टम!
Jefferies के अनुसार FY26 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयरों में रिकॉर्ड 21 अरब डॉलर की बिकवाली की. वहीं FY27 में भी विदेशी निवेशक अब तक लगातार नेट सेलर बने हुए हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि अप्रैल 2024 के बाद से सिर्फ FPI ने ही भारतीय शेयर बाजार में 44 अरब डॉलर की बिकवाली की है.
इतनी बड़ी विदेशी बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट नहीं आई. इसकी सबसे बड़ी वजह घरेलू निवेशकों की लगातार खरीदारी रही.
SIP, म्यूचुअल फंड निवेश और EPFO व NPS जैसे रिटायरमेंट निवेश योजनाओं से आने वाले पैसों ने बाजार को मजबूत सहारा दिया. घरेलू संस्थागत निवेशकों और रिटेल निवेशकों ने विदेशी बिकवाली को काफी हद तक संभाल लिया.
Jefferies का कहना है कि विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और घरेलू निवेशकों की मजबूत खरीदारी ने भारत के कैपिटल अकाउंट पर असर डाला है.
रिपोर्ट के मुताबिक FY25 और FY26 के दौरान भारत का कैपिटल अकाउंट सरप्लस GDP के सिर्फ 0.5 फीसदी तक सिमट गया, जो रिकॉर्ड निचला स्तर बताया गया है. इससे पहले पिछले दशक में यह औसतन 2.6 फीसदी रहता था.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पिछले दो वर्षों में नेट विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी FDI भी कमजोर रहा. इस दौरान यह आंकड़ा करीब 5 अरब डॉलर के आसपास ही रहा. Jefferies के मुताबिक प्रमोटर्स और प्राइवेट इक्विटी निवेशकों की हिस्सेदारी बिक्री भी इसकी बड़ी वजह रही.
ये भी पढ़ें: मार्केट में गिरावट आई, फिर भी नहीं टूटा दम! ये 3 PSU म्यूचुअल फंड्स लगातार दे रहे 34% तक CAGR रिटर्न
रिपोर्ट में कहा गया कि विदेशी निवेश कमजोर रहने और बाजार से लगातार पैसे निकलने के कारण पिछले दो वर्षों से भारत का Balance of Payments भी नेगेटिव बना हुआ है. ब्रोकरेज का अनुमान है कि आने वाला साल भी इस मामले में कमजोर रह सकता है.
हालांकि Jefferies ने यह भी कहा कि अगर विदेशी निवेशकों का भरोसा दोबारा मजबूत होता है तो स्थिति बदल सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक पिछले चार बड़े मौकों में से तीन बार ऐसा देखा गया जब रुपये में 12 महीनों के दौरान 10 फीसदी से ज्यादा गिरावट आई, उसके बाद अगले साल विदेशी निवेश में मजबूत वापसी हुई.