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म्यूचुअल फंड में निवेश करना जितना आसान लगता है, उतना ही जरूरी है उसके टैक्स नियमों को समझना. खासकर तब, जब आप अपने निवेश से पैसे निकालने यानी रिडीम करने की योजना बना रहे हों. कई निवेशक यह मान लेते हैं कि टैक्स सिर्फ मुनाफे पर लगता है, लेकिन असल में टैक्स की रकम इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप कौन-सी यूनिट्स बेच रहे माने जा रहे हैं और यहीं पर FIFO मेथड की एंट्री होती है.
FIFO का मतलब होता है 'First In First Out'. इसका मतलब है कि जो म्यूचुअल फंड यूनिट्स आपने सबसे पहले खरीदी थीं, सिस्टम मान लेता है कि वही यूनिट्स सबसे पहले बेची गई हैं. निवेशक खुद यह तय नहीं कर सकता कि वह हाल में खरीदी गई यूनिट्स बेच रहा है या पुरानी. टैक्स की गणना हमेशा FIFO नियम के अनुसार ही होती है.
म्यूचुअल फंड में अगर यूनिट्स को 12 महीने से ज्यादा समय तक रखने के बाद बेचा जाता है, तो उस पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स लगता है. वहीं, 12 महीने से कम समय में बेचने पर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन (STCG) टैक्स देना होता है. FIFO मेथड यह तय करता है कि बेची गई यूनिट्स कितनी पुरानी मानी जाएंगी, और उसी आधार पर टैक्स लगेगा.
कई निवेशक SIP के जरिए हर महीने अलग-अलग कीमतों पर यूनिट्स खरीदते रहते हैं. ऐसे में अगर आंशिक रिडेम्पशन किया जाए, तो यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि कौन-सी यूनिट्स बेची गईं FIFO इस उलझन को खत्म करता है और टैक्स कैलकुलेशन को एक तय नियम में बांध देता है. इससे न सिर्फ सिस्टम में पारदर्शिता आती है, बल्कि टैक्स में हेरफेर की संभावना भी खत्म होती है.
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मान लीजिए आपने पहले महीने ₹10,000 में 100 यूनिट्स खरीदीं. अगले महीने वही ₹10,000 लगाने पर आपको 90 यूनिट्स मिलीं. दो साल बाद आपने कुल 180 यूनिट्स बेच दीं. FIFO के अनुसार माना जाएगा कि पहले महीने की सभी 100 यूनिट्स और दूसरे महीने की 80 यूनिट्स बेची गई हैं. यानी टैक्स की गणना इन्हीं यूनिट्स की खरीद कीमत और होल्डिंग पीरियड के आधार पर होगी.
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यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है कि यूनिट्स की संख्या और उनकी कीमत अलग-अलग होती है. बाजार ऊपर-नीचे होता रहता है, इसलिए हर SIP में मिलने वाली यूनिट्स बदलती रहती हैं. FIFO सिर्फ यूनिट्स की खरीद तारीख को देखता है, न कि यह कि आपने कितने पैसे लगाए थे.
FIFO के कारण कई बार पुराने, कम कीमत पर खरीदे गए यूनिट्स पहले बिके माने जाते हैं, जिससे कैपिटल गेन ज्यादा दिख सकता है और टैक्स भी बढ़ सकता है. हालांकि, इसका फायदा यह है कि निवेशक को खुद से टैक्स प्लानिंग के लिए यूनिट्स चुनने की झंझट नहीं रहती और पूरी प्रक्रिया सरल व एकसमान रहती है. कुल मिलाकर अगर आप म्यूचुअल फंड से पैसे निकालने की सोच रहे हैं, तो FIFO मेथड की समझ आपके लिए टैक्स से जुड़े कंफ्यूजन को कम करता है.
FIFO यानी First In First Out, यानी पहले खरीदी गई यूनिट्स पहले बेची जाती हैं. यह टैक्स गणना और होल्डिंग अवधि तय करने के लिए जरूरी है.
हां, पुराने यूनिट्स सबसे पहले रीडिम होते हैं, और इसी अनुसार टैक्स का कैलकुलेशन होता है.
सिस्टम मानता है कि जो यूनिट्स सबसे पहले खरीदी गईं, उन्हें पहले बेचा गया माना जाएगा.
नहीं, FIFO नियम के तहत टैक्स और गणना ऑटोमैटिक होती है, निवेशक चयन नहीं कर सकता.
FIFO लागू होने से टैक्स रिपोर्टिंग आसान और सिस्टमेटिक होती है, बिना इसके हर रिडेम्पशन के लिए मैन्युअल हिसाब रखना पड़ता.