म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय यह जानना जरूरी है कि कौन-सी स्कीम जारी रखनी चाहिए और किनसे बाहर निकलना बेहतर है.असल में फंड की परफॉर्मेंस, बेंचमार्क तुलना, निवेश लक्ष्य और फंड मैनेजर में बदलाव जैसे संकेत बताते हैं कि कब निवेश जारी रखें और कब स्कीम बदलना समझदारी होगी.
1/9आज के टाइम में लाखों लोग अपनी सेविंग्स को बढ़ाने के लिए म्यूचुअल फंड में इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं.असल में SIP के जरिए हर महीने निवेश करना आसान भी है और लंबे समय में अच्छा रिटर्न भी मिल सकता है. लेकिन टाइम के साथ अक्सर एक सवाल लगभग हर निवेशक के मन में आता है कि कौन-सी स्कीम में पैसा जारी रखें और किनसे बाहर निकलना सही रहेगा.
2/9जी हां कई लोग सालों तक एक ही फंड में पैसा डालते रहते हैं लेकिन यह नहीं देखते कि वह स्कीम अब भी उतनी अच्छी है या नहीं.मार्केट बदलता है, फंड मैनेजर बदलते हैं और निवेश के टारगेट भी बदल जाते हैं.तो ऐसे में टाइम-टाइम पर अपने म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो का रिव्यू करना भी बहुत जरूरी हो जाता है.
3/9किसी भी म्यूचुअल फंड को जारी रखना है या नहीं, इसका पहला पैमाना उसकी परफॉर्मेंस होती है.असल में निवेशक देखें कि जिस स्कीम में पैसा लगाया है वह अपने बेंचमार्क इंडेक्स और उसी कैटेगरी के दूसरे फंड्स के मुकाबले कैसा रिटर्न दे रही है.लेकिन अगर कोई फंड लगातार कई सालों तक औसत से कम रिटर्न दे रहा है और बाकी फंड उससे बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, तो यह संकेत हो सकता है कि उस स्कीम पर दोबारा सोचने की जरूरत है.
4/9म्यूचुअल फंड में निवेश सिर्फ रिटर्न के लिए नहीं होता बल्कि एक खास फाइनेंशियल टारगेट के लिए होता है. जैसे बच्चों की पढ़ाई, घर खरीदना या रिटायरमेंट के लिए पैसा जुटाना.लेकिन अगर किसी समय आपको लगता है कि आपका लक्ष्य बदल गया है या स्कीम आपके टारगेच के हिसाब से सही नहीं बैठती, तो उस फंड में बने रहने का कोई खास मतलब नहीं रह जाता. तो ऐसे में निवेशक नई रणनीति के साथ बेहतर ऑप्शन तलाश सकते हैं.
5/9कई बार म्यूचुअल फंड का प्रदर्शन इसलिए भी बदल जाता है क्योंकि उसका फंड मैनेजर बदल जाता है.तो ऐसे में फंड मैनेजर ही तय करता है कि पैसा किन शेयरों या सेक्टर में लगाया जाएगा.जी हांअगर नया फंड मैनेजर अलग रणनीति अपनाता है तो फंड का रिस्क और रिटर्न दोनों बदल सकते हैं.तो इसलिए निवेशकों को यह जरूर देखना चाहिए कि फंड मैनेजर बदलने के बाद स्कीम का प्रदर्शन कैसा रहा है.
6/9अगर कोई म्यूचुअल फंड लंबे समय तक अपनी कैटेगरी के दूसरे फंड्स से पीछे चल रहा है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.जी हां निवेशक को इसे रेड फ्लैग मानना चाहिए. इसका मतलब यह नहीं कि तुरंत पूरा पैसा निकाल लिया जाए, लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि उस फंड की समीक्षा करनी चाहिए.असल में कई निवेशक धीरे-धीरे पैसा निकालकर उसे किसी बेहतर फंड में ट्रांसफर करने का फैसला लेते हैं.
7/9कई बार निवेशक पूरी स्कीम से बाहर निकलने की बजाय SIP रोकने का ऑप्शन चुनते हैं.तो बता दें कि इसका फायदा यह होता है कि पुराना निवेश बना रहता है और नई रकम किसी बेहतर फंड में लगाई जा सकती है.अगर बाद में उस फंड की परफॉर्मेंस सुधरती है तो निवेशक फिर से SIP शुरू भी कर सकते हैं.
8/9कुछ निवेशक बाजार की हलचल देखकर बार-बार फंड बदलते रहते हैं,असल में यह तरीका भी सही नहीं माना जाता है. म्यूचुअल फंड में निवेश लंबी अवधि के नजरिए से किया जाता है,तो इसलिए किसी भी स्कीम को कम से कम कुछ साल का समय देना चाहिए. जी हांछोटे समय की गिरावट या बाजार की अस्थिरता के आधार पर तुरंत फैसला लेना कई बार नुकसानदेह हो सकता है.
9/9म्यूचुअल फंड चुनते या बदलते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है.जैसे कि फंड का लंबी अवधि का प्रदर्शन देखें,कैटेगरी के दूसरे फंड्स से तुलना करें,अपने फाइनेंशियल टारगेट को ध्यान में रखें, रिस्क लेने की क्षमता को समझें,निवेश की नियमित समीक्षा करते रहें.जी हां म्यूचुअल फंड में निवेश करना आसान है लेकिन सही समय पर सही फैसला लेना उतना ही जरूरी है,असल में हर स्कीम को समय-समय पर परखना चाहिए ताकि पता चल सके कि वह अभी भी आपके लक्ष्य के हिसाब से सही है या नहीं.