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अक्सर लोग इंश्योरेंस पॉलिसी भविष्य की सुरक्षा के लिए लेते हैं, लेकिन कई बार पैसों की जरूरत, गलत प्लानिंग या बदलती प्राथमिकताओं के कारण बीच में ही पॉलिसी बंद करने का मन बन जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर आपने बीमा पॉलिसी बीच में छोड़ दी, तो आपके पैसे और सुरक्षा का क्या होगा? जवाब इतना सीधा नहीं है, क्योंकि यह आपकी पॉलिसी के प्रकार और अवधि पर निर्भर करता है.
जब आप बीमा पॉलिसी को उसकी पूरी अवधि से पहले बंद कर देते हैं और कंपनी से पैसा निकाल लेते हैं, तो इसे पॉलिसी सरेंडर करना कहा जाता है. इस स्थिति में आपको पूरी जमा रकम नहीं मिलती, बल्कि कंपनी कुछ कटौतियां करके जो रकम देती है, उसे सरेंडर वैल्यू कहा जाता है. यह वैल्यू अक्सर आपके दिए गए कुल प्रीमियम से कम होती है.
पॉलिसी छोड़ते ही सबसे पहला और बड़ा नुकसान यह होता है कि आपका जीवन बीमा कवरेज तुरंत खत्म हो जाता है. इसका मतलब यह है कि अगर भविष्य में कुछ अनहोनी होती है, तो आपके नॉमिनी को कोई डेथ बेनिफिट नहीं मिलेगा. यानी जिस सुरक्षा के लिए आपने पॉलिसी ली थी, वही पूरी तरह खत्म हो जाती है.
बीमा पॉलिसी के शुरुआती सालों में जो प्रीमियम आप भरते हैं, उसका बड़ा हिस्सा एजेंट कमीशन, प्रशासनिक खर्च और अन्य चार्जेज में चला जाता है. इसलिए अगर आप पहले 2–4 सालों में पॉलिसी छोड़ते हैं, तो आपको बहुत कम रकम वापस मिलती है. कई बार सरेंडर चार्ज भी काटे जाते हैं, जिससे नुकसान और बढ़ जाता है.
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अगर आपकी पॉलिसी एंडोमेंट, मनी-बैक या ULIP जैसी है, तो उसमें भविष्य में मिलने वाले बोनस या गारंटीड रिटर्न होते हैं. पॉलिसी बीच में छोड़ने पर ये सभी फायदे खत्म हो जाते हैं. यानी लंबे समय तक इंतजार करने का जो लाभ मिल सकता था, वह हाथ से निकल जाता है.
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कुछ मामलों में पॉलिसी को पूरी तरह बंद करने की बजाय ‘पेड-अप’ करना बेहतर विकल्प हो सकता है. इसमें आप आगे प्रीमियम देना बंद कर देते हैं, लेकिन पॉलिसी चलती रहती है. हां, इसमें बीमा राशि और फायदे कम हो जाते हैं, लेकिन कवरेज पूरी तरह खत्म नहीं होता. जिन लोगों पर तुरंत पैसों का दबाव नहीं होता, उनके लिए यह नुकसान कम करने का तरीका हो सकता है.
बीमा नियामक IRDAI ने हाल के वर्षों में नियमों में बदलाव किए हैं. अब कुछ एंडोमेंट पॉलिसियों में पहले के मुकाबले ज्यादा सरेंडर वैल्यू मिल सकती है, खासकर अगर आपने कम से कम एक साल का प्रीमियम भर दिया हो तो. इससे नुकसान थोड़ा कम होता है.
टर्म इंश्योरेंस पूरी तरह सुरक्षा पर आधारित होता है. इसमें कोई सेविंग या कैश वैल्यू नहीं होती. इसलिए इसे छोड़ने पर आपको कोई पैसा वापस नहीं मिलता, सिर्फ कवरेज खत्म हो जाता है. वहीं एंडोमेंट, मनी-बैक और ULIP जैसी पॉलिसियों में सेविंग का हिस्सा होता है, इसलिए सरेंडर पर कुछ रकम मिल सकती है.
अगर आप किसी महीने प्रीमियम नहीं भर पाए हैं, तो तुरंत पॉलिसी बंद नहीं होती. कंपनियां 15 से 30 दिन का ग्रेस पीरियड देती हैं. इसके अलावा, लैप्स हो चुकी पॉलिसी को कुछ शर्तों के साथ दोबारा चालू भी किया जा सकता है.
क्योंकि शुरुआती सालों में प्रीमियम का बड़ा हिस्सा चार्ज और खर्चों में चला जाता है. इसलिए कंपनी केवल सरेंडर वैल्यू देती है.
हां, जैसे ही पॉलिसी सरेंडर होती है जीवन बीमा कवरेज खत्म हो जाता है और नॉमिनी को कोई डेथ बेनिफिट नहीं मिलता.
सरेंडर में पॉलिसी पूरी तरह बंद हो जाती है, जबकि पेड-अप में आप प्रीमियम देना बंद करते हैं लेकिन कम कवरेज के साथ पॉलिसी जारी रहती है.
नहीं, टर्म इंश्योरेंस में कोई सेविंग नहीं होती, इसलिए पॉलिसी छोड़ने पर सिर्फ कवरेज खत्म होता है, पैसा वापस नहीं मिलता.
कुछ एंडोमेंट पॉलिसियों में फायदा हुआ है, अब पहले के मुकाबले थोड़ी बेहतर सरेंडर वैल्यू मिल सकती है.