कहानी उस साल की जब भारत में पहली बार 'कागज' बना रुपया, इतिहास के पन्नों में दर्ज ये बातें आप भी नहीं जानते होंगे

भारत में कागजी नोटों की शुरुआत 18वीं सदी के अंत में हुई, जब मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ रहा था और ब्रिटिश शासन मजबूत हो रहा था. इसी दौर में एजेंसी हाउस बने, जिन्होंने आगे चलकर बैंक स्थापित किए.
कहानी उस साल की जब भारत में पहली बार 'कागज' बना रुपया, इतिहास के पन्नों में दर्ज ये बातें आप भी नहीं जानते होंगे

भारत में कागज की मुद्रा (Paper Money) की शुरुआत कब हुई ये सवाल अक्सर लोगों के मन में होता है,तो आपको बता दें कि असल में 18वीं सदी के अंत में कागज की मुद्रा यानी कि नोट की शुरुआत हुई थी. जी हां यह वह समय था जब मुगल साम्राज्य का पतन हो चुका था और देश में बड़े रूप में राजनीतिक उथल-पुथल का माहौल शुरू हो गया था. इसी समय औपनिवेशिक ताकतें भी भारत में अपने पांव पसार रही थीं.

असल में ये वो दौर था जब सत्ता के इस बदलाव और लगातार हो रहे युद्धों के कारण देश के पारंपरिक साहूकारों की भूमिका कमजोर हो गई और वित्तीय ताकत ‘एजेंसी हाउस’ नामक संस्थाओं के पास चली गई जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन प्राप्त था. इन एजेंसी हाउसों ने आगे चलकर कई बैंकों की नींव भी रखी थी.

बंगाल और बिहार में पहला नोट जारी करने वाला बैंक

आपको बता दें कि भारत में कागजी मुद्रा जारी करने वाली शुरुआती संस्थाओं में जनरल बैंक ऑफ बंगाल एंड बिहार (1773-75) शामिल था. यह एक सरकारी सहायता प्राप्त बैंक था जिसको तब स्थानीय बिजनेस नॉलेज के साथ मिलकर स्थापित किया गया था.जी हां इस बैंक के नोटों को सरकार का समर्थन प्राप्त था.माना जाता है कि ये है कि ये बैंक मुनाफे में था, फिर भी इसे कुछ ही सालोंमें बंद कर दिया गया।

बैंक ऑफ हिन्दोस्तान की कहानी

बैंक ऑफ हिन्दोस्तान (1770-1832) को एलेक्जेंडर एंड कंपनी ने शुरू किया था. यह बैंक बेहद सफल रहा और तीन बार 'बैंक रन' (लोगों का बैंक से एकसाथ पैसा निकालना) जैसी स्थिति से भी बचा रहा था, लेकिन 1832 की व्यापारिक मंदी में इसकी मूल कंपनी एलेक्जेंडर एंड कंपनी डूब गई, जिससे बैंक को भी बंद करना पड़ा था.

ब्रिटिश सरकार की मदद से बढ़ा नोटों का चलन

फिर एक ऐसा समय आया जब सरकार का समर्थन मिलने और इन नोटों को टैक्स के भुगतान में स्वीकार किए जाने से कागजी नोट काफी लोकप्रिय हो गए. प्रेसीडेंसी बैंक, खासकर बैंक ऑफ बंगाल (जो पहले बैंक ऑफ कलकत्ता था, स्थापना: 1806) ने कागजी नोटों के चलन को तेजी से बढ़ाया.असल में ये बैंक सरकार की मंजूरी (चार्टर) से बने थे और इनका उस समय की ब्रिटिश सरकार से सीधा जुड़ाव था. इन्हें अपने इलाके में नोट जारी करने का खास अधिकार भी मिला हुआ था.

बैंक ऑफ बंगाल द्वारा जारी की गई नोटों की तीन श्रेणियां

1. यूनिफेस्ड सीरीज: यूनिफेस्ड नोट्स बैंक ऑफ बंगाल द्वारा जारी किए गए शुरुआती नोट थे, जो केवल एक ही तरफ छपे होते थे.मानते हैं कि ये नोट आमतौर पर उस समय की प्रमुख मुद्रा गोल्ड मोहर (सोने की मुद्रा) और ₹100, ₹250, ₹500 जैसी राशि में जारी किए जाते थे.

2. कॉमर्स सीरीज: आपको बता दें कि बाद में इन नोटों पर एक महिला की छवि जोड़ी गई, जो 'कॉमर्स' (व्यापार) का प्रतीक थी और बंदरगाह के पास बैठी दिखाई देती थी. ये नोट तीन भाषाओं – उर्दू, बांग्ला और नागरी में छापे जाते थे, ताकि देश के ज्यादा लोगों को समझ आ सके.

3. ब्रिटानिया सीरीज: फिर 19वीं सदी के बीच में ‘कॉमर्स’ की जगह पर अब 'ब्रिटानिया' की छवि नोट परक दिखाई देने लगी थी. नकली नोटों से बचाव के लिए इन नोटों में कई रंगों का यूज किया गया और कठिन डिजाइन बनाए गए ताकि इन्हें आसानी से कॉपी न किया जा सके.

अन्य प्रेसीडेंसी बैंकों की भूमिका

आपको बता दें कि बैंक ऑफ बॉम्बे की शुरुआत 1840 में हुई थी. हालांकि 1868 में कपास की अटकलबाजी से पैदा हुए आर्थिक संकट के कारण यह बंद हो गया, लेकिन उसी साल इसको फिर से भी शुरू किया गया.ये बैंक नोटों पर बॉम्बे टाउन हॉल और माउंटस्टुअर्ट एल्फिंस्टन, जॉन मैलकम जैसे फेमस लोगों की मूर्तियों की छवियां छपी होती थीं.

वहीं, बैंक ऑफ मद्रास की स्थापना 1843 में हुई थी हालांकि उस समय इस बैंक ने इसने सबसे कम नोट जारी किए थे.जी हां इसके नोटों पर मद्रास के गवर्नर सर थॉमस मुनरो की फोटो को छापा गया था.

कुछ निजी बैंकों द्वारा जारी नोट

ओरिएंट बैंक कॉर्पोरेशन, जिसको पहले बैंक ऑफ वेस्टर्न इंडिया कहते थे, इसकी 1842 में बॉम्बे में शुरुआत हुई थी. इसके नोटों पर बॉम्बे टाउन हॉल की फोटो छपी होती थी.

कमर्शियल बैंक ऑफ इंडिया की बात करें तो इसकी स्थापना 1845 में की गई थी. इस बैंक ने ऐसे नोट जारी किए जिनमें पूर्वी और पश्चिमी डिजाइन का अनोखा मेल दिखाई देता था, हालांकि 1866 की आर्थिक मंदी के दौरान यह बैंक बंद हो गया था.

पेपर करेंसी एक्ट, 1861 और बदलाव

फिर पेपर करेंसी एक्ट 1861 के बाद सभी निजी बैंकों से नोट छापने का अधिकार उस समय छीन लिया गया था.हालांकि, प्रेसीडेंसी बैंकों को सरकार की तरफ से खातों का संचालन करने और सीमित क्षेत्र में नोटों का प्रबंधन करने की जिम्मेदारी दी गई थी. (Input:rbi.org.in)

FAQs: भारत में कागज की मुद्रा की शुरुआत पर

1. भारत में कागज की मुद्रा (Paper Money) की शुरुआत कब हुई थी?
भारत में कागज की मुद्रा की शुरुआत 18वीं सदी के अंत में हुई, जब मुगल साम्राज्य का पतन हो चुका था और देश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही थीय

2. भारत में सबसे पहले नोट किसने जारी किए थे?
सबसे पहले कागज के नोट 'एजेंसी हाउस' नामक संस्थाओं द्वारा जारी किए गए थे, जिन्हें ब्रिटिश शासन का समर्थन प्राप्त था.

3. कागज की मुद्रा के चलन में आने की वजह क्या थी?
सत्ता परिवर्तन, लगातार युद्ध और पारंपरिक साहूकारों की घटती भूमिका के कारण मुद्रा का नया स्वरूप जरूरी हो गया, जिससे कागज की मुद्रा का चलन शुरू हुआ.

4. 'एजेंसी हाउस' क्या थे और इनका क्या योगदान था?
एजेंसी हाउस ब्रिटिश समर्थित वित्तीय संस्थाएं थीं, जिन्होंने आगे चलकर कई बैंकों की स्थापना की और भारत में कागजी मुद्रा की नींव रखी.

5. भारत में कागजी नोटों का शुरुआती प्रभाव क्या था?
कागजी मुद्रा ने आर्थिक लेन-देन को सुविधाजनक बनाया और ब्रिटिश हुकूमत को वित्तीय नियंत्रण मजबूत करने का अवसर दिया.

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