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टैक्स बचाना हर किसी का सपना होता है और जब बात प्रॉपर्टी से आने वाले किराए (Rent) की हो, तो यह और भी जरूरी हो जाता है. अगर आपसे कहा जाए कि आप अपने किराए के पूरे पैसे पर इनकम टैक्स (Income Tax) बचा सकते हैं तो यह सुनकर शायद आपको लगे कि कोई गड़बड़ है. हालांकि, अगर सही कानूनी तरीके और Income Tax Act के नियमों का पालन किया जाए, तो यह पूरी तरह मुमकिन है. आइए आप समझते हैं कि कैसे अपनी प्रॉपर्टी को अपनी पत्नी, माता-पिता या बच्चों के साथ जॉइंट ओनरशिप में रखकर टैक्स के बोझ को कम कर सकते हैं.
अगर आप किसी प्रॉपर्टी के अकेले मालिक हैं, तो सारा किराया आपकी इनकम में जुड़ेगा. अगर आपकी दूसरी कमाई (जैसे सैलरी) पहले से ही ₹15-20 लाख है, तो यह किराया भी ऊंचे टैक्स स्लैब में चला जाएगा.
स्प्लिटिंग का जादू: मान लीजिए एक प्रॉपर्टी के तीन बराबर हिस्सेदार (Co-owners) हैं.
कुल किराया: ₹15 लाख सालाना.
एक ओनर का हिस्सा: ₹5 लाख.
टैक्स का गणित: अगर तीनों को-ओनर्स की अन्य आय कम है, तो ₹5 लाख तक की आय पर टैक्स लायबिलिटी बहुत कम या जीरो हो सकती है (पुरानी या नई टैक्स व्यवस्था के अनुसार).
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इनकम टैक्स विभाग सिर्फ कागज पर नाम जोड़ने को स्वीकार नहीं करता. इसे कानूनी रूप से सही साबित करने के लिए कुछ शर्तें हैं:
कानूनी पंजीकरण: प्रॉपर्टी के सेल डीड (Sale Deed) या गिफ्ट डीड (Gift Deed) में सभी को-ओनर्स का नाम और उनका हिस्सा (जैसे 50:50 या 30:70) स्पष्ट होना चाहिए.
आर्थिक भागीदारी: सबसे खास बात यह है कि को-ओनर्स ने प्रॉपर्टी खरीदने में पैसा लगाया हो. यह पैसा उनकी अपनी कमाई से हो सकता है या जॉइंट होम लोन के जरिए.
गिफ्ट डीड: अगर आपने अपने परिवार के किसी सदस्य को हिस्सा गिफ्ट किया है, तो वह विधिवत रजिस्टर्ड होना चाहिए.
यहां एक बड़ा पेंच है, जिसे Section 64 कहते हैं. कई लोग अपनी पत्नी या बच्चों के नाम पर प्रॉपर्टी दिखा देते हैं, ताकि टैक्स बच सके, लेकिन आयकर विभाग इसे 'टैक्स चोरी' मान सकता है.
बिना प्रतिफल के ट्रांसफर: अगर आपने अपनी पत्नी को प्रॉपर्टी का हिस्सा 'गिफ्ट' किया है और उसके बदले उन्होंने आपको कोई पैसा नहीं दिया, तो उस हिस्से से होने वाली कमाई (किराया) वापस आपकी ही इनकम में जोड़ दी जाएगी. इसे 'क्लबिंग' कहते हैं.
बचने का तरीका: अगर को-ओनर ने खुद पैसा लगाया है या उसे विरासत (Inheritance) में हिस्सा मिला है, तो क्लबिंग लागू नहीं होगी.
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अगर टैक्स विभाग आपसे पूछताछ करता है, तो आपके पास ये दस्तावेज तैयार होने चाहिए:
रजिस्टर्ड सेल डीड (Registered Sale Deed): जिसमें मालिकाना हक स्पष्ट हो.
रेंटल एग्रीमेंट (Rental Agreement): किराए के समझौते में सभी को-ओनर्स के नाम होने चाहिए.
बैंक स्टेटमेंट: किराया सीधे को-ओनर्स के अलग-अलग बैंक खातों में जाना चाहिए.
होम लोन सर्टिफिकेट: अगर लोन लिया है, तो उसमें सभी का नाम और ईएमआई (EMI) चुकाने का प्रमाण.
गिफ्ट डीड (अगर लागू हो): रजिस्टर्ड और स्टैम्प ड्यूटी पेड.
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आयकर विभाग के पास अब बहुत एडवांस डेटा मैचिंग सिस्टम है. वह इन चीजों पर तुरंत नोटिस भेज सकता है:
अचानक ओनरशिप: प्रॉपर्टी रेंट पर चढ़ाने से ठीक कुछ दिन पहले किसी परिवार वाले का नाम जोड़ना.
सिर्फ लो-टैक्स स्लैब वालों को जोड़ना: मालिकाना हक बिना किसी ठोस कारण के सिर्फ उन लोगों को देना, जिनकी कोई कमाई नहीं है.
HRA और रेंट में अंतर: अगर कोई किरायेदार HRA क्लेम कर रहा है, लेकिन आप अपनी रिटर्न में वह किराया नहीं दिखा रहे या गलत दिखा रहे हैं.
रेंटल इनकम को स्प्लिट करना एक बेहतरीन Tax Planning टूल है, बशर्ते आप नियमों के दायरे में रहें. अगर आप भी अपनी रेंटल इनकम पर टैक्स बचाना चाहते हैं, तो आज ही अपनी ओनरशिप स्ट्रक्चर की समीक्षा करें और सुनिश्चित करें कि सारा लेन-देन बैंक के जरिए और पारदर्शी हो.
1- क्या मैं अपनी हाउसवाइफ पत्नी के साथ रेंट स्प्लिट कर सकता हूं?
हां, लेकिन अगर आपने उन्हें हिस्सा गिफ्ट किया है, तो क्लबिंग प्रोविजन (Section 64) के तहत किराया आपकी ही आय माना जा सकता है. अगर उन्होंने अपनी बचत या स्त्रीधन से निवेश किया है, तो यह मान्य होगा.
2- क्या रेंटल इनकम पर 30% की छूट सबको मिलती है?
हां, इनकम टैक्स के सेक्शन 24 के तहत सभी को-ओनर्स को रेंटल इनकम पर 30% की 'मानक कटौती' (Standard Deduction) मिलती है, चाहे उनका वास्तविक खर्चा कुछ भी हो.
3- क्या रेंट एग्रीमेंट में सिर्फ मेरा नाम होना काफी है?
नहीं, अगर आप इनकम स्प्लिट कर रहे हैं, तो रेंट एग्रीमेंट में सभी को-ओनर्स के नाम और उनके हिस्से का जिक्र होना जरूरी है.
4- क्या बच्चों के नाम पर रेंट स्प्लिट किया जा सकता है?
यदि बच्चा नाबालिग (Minor) है, तो उसकी आय माता या पिता (जिसकी आय ज्यादा है) के साथ ही क्लब की जाएगी. बालिग (Major) बच्चों के मामले में अलग टैक्स फाइल किया जा सकता है.
5- क्या जॉइंट होम लोन पर भी अलग-अलग छूट मिलती है?
हां, दोनों को-ओनर्स अपने-अपने हिस्से के ब्याज (Interest) और मूलधन (Principal) पर टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं, जिससे बचत दोगुनी हो जाती है.
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