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कई बार आपने सुना होगा कि दुनिया के सबसे अमीर लोग बेहद कम या जीरो टैक्स देते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं, ये लोग बिना टैक्स दिए भी करोड़ों रुपये कैसे खर्च करते हैं? असल में, अमीर लोग पैसा “कमाने” से ज्यादा उसे “बनाए रखने” में समझदारी दिखाते हैं. कई अमीर लोग तो सैलरी भी नहीं लेते या फिर मामूली सैलरी लेते हैं.
अमीर लोगों के पास करोड़ों की सैलरी नहीं होती, बल्कि उनकी दौलत उनके बिजनेस (Business) और शेयर (Stock Market Investment) में लगी होती है. इस वैल्यू पर टैक्स तभी लगता है जब वो अपनी हिस्सेदारी बेचते हैं. वो शेयर नहीं बेचते हैं, इसलिए टैक्स देने की जरूरत ही नहीं पड़ती.
अब सवाल उठता है कि जब ये अपने शेयर बेचते नहीं, तो खर्चे कैसे चलते हैं? इसका जवाब है- “Borrow Against Shares” यानी शेयर के बदले लोन लेना. अमीर लोग अपने शेयरों को बैंक में कोलेट्रल (Collateral) रखकर भारी रकम का लोन लेते हैं. फिर उस लोन से अपनी जरूरतें पूरी करते हैं. इन पैसों से वह प्राइवेट जेट खरीदते सकते हैं, विला या यॉट ले सकते हैं या फिर अपना निवेश (Investment) बढ़ा सकते हैं.
इस लोन पर ब्याज (Interest Rate) बहुत कम होता है, क्योंकि बैंक के पास शेयर सिक्योरिटी में होते हैं. और जब तक शेयर नहीं बेचे जाते, तब तक कोई टैक्स नहीं लगता. ऐसे में अमीर लोगों के लिए लोन लेकर उससे अपने काम करना फायदे का सौदा होता है.
उदाहरण के तौर पर मान लीजिए किसी अमीर व्यक्ति के पास ₹500 करोड़ के शेयर हैं. वो बैंक से 10% ब्याज दर पर ₹50 करोड़ का लोन लेता है. वो इस ₹50 करोड़ से आलीशान जिंदगी जीता है. इस पर वह टैक्स नहीं देता, क्योंकि ये उसकी इनकम नहीं है, बल्कि लोन है.
अमेरिका के करोड़पतियों में ये फॉर्मूला बहुत लोकप्रिय है- Buy, Borrow, Die. आइए इसे डीटेल में समझते हैं.
इस तरह टैक्स सिस्टम के लूपहोल का फायदा लेकर कई अमीर लोग दशकों तक “टैक्स-फ्री रिचनेस” जीते हैं.
अमीर लोग कई पर्सनल खर्चों को “बिजनेस एक्सपेंस” दिखाकर टैक्स से बचते हैं. जैसे:
इससे उनकी इनकम टैक्स के दायरे में कम आती है और नेट सेविंग ज्यादा होती है.
शेयर-आधारित लोन (Loan Against Shares) को टैक्स-फ्री और लो-कॉस्ट माना जाता है. इसमें 3 बड़े फायदे हैं:
यह लोन केवल बिजनेस या खर्चों के लिए नहीं, बल्कि निवेश और एक्सपेंशन के लिए भी यूज किया जाता है.
दरअसल, ये सब कानूनी (Legal) तरीके हैं. सरकार इनकम पर टैक्स लगाती है, लेकिन “अनरियलाइज्ड गेन” यानी जो प्रॉफिट कागजों पर है, उस पर टैक्स नहीं लगाती. यानी जब तक शेयर नहीं बेचते, तब तक वो प्रॉफिट नहीं माना जाता. यही नियम अमीरों के लिए सबसे बड़ा हथियार बन जाता है.
सैलरी क्लास को हर महीने टीडीएस कटता है. लेकिन अमीरों की “पेपर इनकम” पर कोई टैक्स नहीं लगता. इससे इनकम इनइक्वलिटी (Income Inequality) और बढ़ जाती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के टॉप 25 बिलियनेयर्स ने अपनी असल कमाई पर सिर्फ 3.4% टैक्स दिया है. जबकि आम लोगों की टैक्स दर 25–30% के बीच होती है.
टैक्स बचाना गलत नहीं, लेकिन स्मार्ट तरीके से करना चाहिए. सैलरी के साथ साइड इनकम और इन्वेस्टमेंट स्ट्रक्चर बढ़ाएं. लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन और ELSS जैसे टैक्स-सेविंग टूल्स अपनाएं. बिजनेस माइंडसेट अपनाएं, सिर्फ एम्प्लॉयी नहीं बनें.
अमीर लोग टैक्स चोरी नहीं करते, बल्कि सिस्टम को अच्छी तरह समझते हैं. वे जानते हैं कि पैसा कैसे काम कर सकता है, बिना टैक्स दिए भी रिटर्न कैसे बढ़ सकता है. इसलिए अगर आप भी फाइनेंशियल फ्रीडम चाहते हैं, तो टैक्स सिस्टम को समझिए और अपने पैसे को आपके लिए काम करना सिखाइए.
कई देते हैं, लेकिन कम क्योंकि उनकी इनकम सैलरी नहीं होती.
हां, शॉर्ट या लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है.
नहीं, लोन टैक्स के दायरे में नहीं आता.
हां, लेकिन शेयर वैल्यू गिरने पर रिस्क रहता है.
हां, अगर वो खर्च असल में बिजनेस से जुड़ा है.
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