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घर या प्रॉपर्टी को घाटे में बेचने पर होने वाले नुकसान को इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) में 'कैपिटल लॉस' के रूप में दर्ज किया जा सकता है. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
अक्सर माना जाता है कि प्रॉपर्टी या घर बेचने पर हमेशा मुनाफा ही होता है, लेकिन बाजार के उतार-चढ़ाव, मंदी या किसी मजबूरी में किए गए सौदे (Distress Sale) के कारण कई बार लोगों को अपना घर या प्लॉट नुकसान (Loss) में भी बेचना पड़ता है. अगर आपने भी अपना घर उसकी खरीद कीमत से कम दाम में बेचा है, तो निराश होने की जरूरत नहीं है. ITR Filing 2026 के नियमों के तहत आप इस नुकसान पर भी इनकम टैक्स में बड़ा फायदा (Tax Relief) पा सकते हैं.
आयकर (Income Tax) नियमों के तहत, इस नुकसान को 'कैपिटल लॉस' (Capital Loss) कहा जाता है. इससे जुड़े तमाम पहलुओं पर जी बिजनेस ने बात की टैक्स एंड इन्वेस्टमेंट एक्सपर्ट बलवंत जैन से. आइए डीटेल में समझते हैं कि प्रॉपर्टी के इस घाटे को आप टैक्स बचाने के लिए कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं.
आमतौर पर लोग सोचते हैं कि अगर प्रॉपर्टी बेचने में फायदा नहीं हुआ, तो टैक्स का कोई मतलब नहीं बचता. लेकिन Income Tax Act में ऐसे मामलों के लिए भी नियम बने हुए हैं. अगर आपने कोई घर, प्लॉट या कमर्शियल प्रॉपर्टी उसकी Indexed Purchase Cost और खर्चों से कम कीमत पर बेची है, तो इसे Capital Loss माना जाएगा. यही नुकसान बाद में टैक्स बचाने में मदद कर सकता है. यानी अभी नुकसान हुआ है, लेकिन भविष्य में होने वाले Capital Gains पर टैक्स कम किया जा सकता है.
प्रॉपर्टी बेचने पर हुए नुकसान को उसकी होल्डिंग अवधि (रखने के समय) के आधार पर शॉर्ट-टर्म या लॉन्ग-टर्म कैपिटल लॉस में बांटा जाता है. आप इस नुकसान का फायदा दो तरीकों से उठा सकते हैं:
आप प्रॉपर्टी के घाटे को अन्य संपत्तियों से हुए मुनाफे (Capital Gains) के सामने एडजस्ट कर अपना टैक्स कम कर सकते हैं:
शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस (STCL): अगर प्रॉपर्टी कम समय रखकर बेची गई है, तो इस घाटे को आप किसी भी शॉर्ट-टर्म या लॉन्ग-टर्म मुनाफे (जैसे शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, सोना या दूसरी प्रॉपर्टी) के सामने एडजस्ट कर सकते हैं.
लॉन्ग-टर्म कैपिटल लॉस (LTCL): अगर प्रॉपर्टी लंबे समय बाद घाटे में बिकी है, तो यह नुकसान केवल लॉन्ग-टर्म मुनाफे के सामने ही एडजस्ट होगा (जैसे सोने की बिक्री पर हुआ लॉन्ग-टर्म मुनाफा या धारा 112A के तहत आने वाले इक्विटी म्यूचुअल फंड का फायदा).
नहीं. यही सबसे बड़ी limitation है. Capital Loss को इनकम के इन स्रोतों से adjust नहीं किया जा सकता:
यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने प्रॉपर्टी कितने समय तक अपने पास रखी थी.
| Holding Period | Loss Type |
| 24 महीने से कम | Short-Term Capital Loss |
| 24 महीने से ज्यादा | Long-Term Capital Loss |
अगर चालू वित्तीय वर्ष में आपको इस घाटे को एडजस्ट करने के लिए कहीं से कोई कैपिटल गेन (मुनाफा) नहीं हुआ है, तो चिंता की बात नहीं है. आप इस नुकसान को अगले 8 असेसमेंट इयर्स (Assessment Years) के लिए कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं. भविष्य में जब भी आपको शेयर, सोने या प्रॉपर्टी से मुनाफा होगा, आप इस पुराने घाटे को वहां घटाकर टैक्स बचा सकते हैं.
कैपिटल लॉस को कैरी फॉरवर्ड करने का फायदा केवल तभी मिलता है जब आप अपना इनकम टैक्स रिटर्न धारा 139(1) के तहत निर्धारित तय समय सीमा (Due Date) के भीतर दाखिल करते हैं. लेट रिटर्न (Belated Return) दाखिल करने पर यह लाभ पूरी तरह खत्म हो जाता है.
बहुत से taxpayers:
इससे carry forward का पूरा फायदा खत्म हो सकता है.
ITR फॉर्म: नौकरीपेशा लोग और पेंशनभोगी, जिन्हें बिजनेस से कोई आय नहीं है, वह प्रॉपर्टी लॉस दिखाने के लिए ITR-2 भरेंगे. वहीं, बिजनेस करने वाले या प्रोफेशनल्स ITR-3 का उपयोग करेंगे. घाटे की यह जानकारी 'Schedule CG' (Capital Gains) में भरनी होती है.
दस्तावेज: भविष्य में स्क्रूटनी या टैक्स नोटिस से बचने के लिए अपने पास सेल डीड (Sale Deed), परचेज एग्रीमेंट, कैपिटल गेन्स कैलकुलेशन शीट और प्रॉपर्टी में सुधार (Improvement) के सभी बिल सुरक्षित रखें. साथ ही, बड़े सौदों में खरीदार का पैन (PAN) नंबर देना भी अनिवार्य है.
अगर आपने property loss claim किया है, तो ये documents सुरक्षित रखें:
Step 1: Purchase और Sale Value निकालें
Indexed Cost calculate करें.
Step 2: सभी खर्च जोड़ें
Brokerage, Stamp Duty, Improvement Cost आदि शामिल करें.
Step 3: Capital Loss calculate करें
Sale Value- Indexed Cost
Step 4: सही ITR चुनें
ITR-2 या ITR-3
Step 5: Schedule CG भरें
पूरी ट्रांजेक्शन डीटेल डालें.
Step 6: समय पर ITR फाइल करें
Carry Forward बेनेफिट के लिए यह सबसे जरूरी है.
| नियम | क्या कहता है? |
| STCL | सभी Capital Gains से एडजस्ट |
| LTCL | सिर्फ Long-Term Gains से एडजस्ट |
| Carry Forward | 8 साल तक |
| जरूरी शर्त | समय पर ITR filing |
| Salary से एडजस्ट | इजाजत नहीं |

प्रॉपर्टी को नुकसान में बेचना निश्चित रूप से एक आर्थिक झटका है, लेकिन आयकर कानून के भीतर छिपे इन नियमों की सही समझ आपको टैक्स के मोर्चे पर बड़ी राहत दे सकती है. अपने AIS (Annual Information Statement) और TIS के आंकड़ों से मिलान करके ही सटीक जानकारी ITR में भरें. यदि प्रक्रिया जटिल लगे, तो किसी प्रमाणित टैक्स सलाहकार की मदद जरूर लें, ताकि आप समय सीमा से चूके बिना अपने पूरे नुकसान को वैध रूप से क्लेम कर सकें.
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आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 Capital Gain क्या होता है?
जब कोई व्यक्ति अपनी प्रॉपर्टी, शेयर, गोल्ड या कोई दूसरी एसेट बेचकर खरीद कीमत से ज्यादा पैसा कमाता है, तो उस मुनाफे को Capital Gain कहा जाता है.
Q2 Capital Loss क्या होता है?
अगर किसी एसेट को बेचने पर खरीद कीमत और खर्चों की तुलना में नुकसान होता है, तो उसे Capital Loss कहा जाता है.
Q3 Short-Term Capital Gain (STCG) क्या होता है?
जब कोई एसेट कम समय तक रखने के बाद बेचकर मुनाफा कमाया जाता है, तो उसे Short-Term Capital Gain कहा जाता है. प्रॉपर्टी के मामले में 24 महीने से कम होल्डिंग पर यह लागू होता है.
Q4 Long-Term Capital Gain (LTCG) क्या होता है?
अगर कोई प्रॉपर्टी 24 महीने से ज्यादा समय तक रखने के बाद बेची जाती है और उस पर फायदा होता है, तो उसे Long-Term Capital Gain कहा जाता है.
Q5 Short-Term और Long-Term Capital Loss में क्या फर्क होता है?
Short-Term Capital Loss को Short-Term और Long-Term दोनों तरह के gains से adjust किया जा सकता है, जबकि Long-Term Capital Loss केवल Long-Term Capital Gains से ही set-off होता है.