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शेयर बाजार में होने वाली कमाई और लेनदेन पर सरकार कई तरह के टैक्स वसूलती है. फोटो- एआई जनरेटेड
शेयर बाजार में निवेश करना केवल सही स्टॉक चुनने के बारे में नहीं है, बल्कि यह अपने मुनाफे को टैक्स की मार से बचाने के बारे में भी है. जब आप एक शेयर खरीदते या बेचते हैं, तो उस प्रक्रिया में कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स शामिल होते हैं. अधिकांश निवेशक केवल तभी टैक्स के बारे में सोचते हैं जब वह अपना रिटर्न फाइल करते हैं, लेकिन कुछ टैक्स ऐसे होते हैं जो हर एक सौदे (Transaction) के साथ ही कट जाते हैं.
चाहे आप एक 'इन्वेस्टर' हों जो सालों तक शेयर होल्ड करता है, या एक 'ट्रेडर' हों, जो रोज सौदे करता है- सरकार की नजर आपके हर कदम पर है. आपके हर मुनाफे और हर ट्रांजैक्शन में अपना हिस्सा बखूबी वसूलती है. आइए जानते हैं शेयर बाजार की कमाई पर लगते हैं कौन-कौन से 5 टैक्स-
यह वह टैक्स है जिसके कारण सरकार को कभी नुकसान नहीं होता.
कब लगता है: जैसे ही आप शेयर खरीदते या बेचते हैं, यह टैक्स कट जाता है. यानी हर ट्रांजेक्शन पर.
खासियत: इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपको सौदे में मुनाफा हुआ या घाटा, STT हर हाल में देना होता है. यही कारण है कि भारी बिकवाली के समय भी सरकार का राजस्व बढ़ता रहता है.
कितना लगता है STT?
फ्यूचर्स (Futures): पहले इस पर 0.02% टैक्स लगता था, जिसे बजट में बढ़ाकर 0.05% कर दिया गया.
ऑप्शंस (Options): ऑप्शन प्रीमियम की बिक्री पर टैक्स पहले ही बढ़कर 0.1% हो चुका था, जिसे बजट में बरकरार रखा गया.
इक्विटी (Equity): अगर आप कैश मार्केट में शेयर खरीदते या बेचते हैं, तो वहां 0.1% की दर लागू है.
अगर आप शेयर खरीदकर 1 साल के भीतर बेच देते हैं, तो इसे शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन कहा जाएगा. शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन पर सरकार की तरफ से 20% टैक्स लगता है.
1 साल से ज्यादा समय तक शेयर रखने पर होने वाले मुनाफे को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन कहा जाता है. इस पर 12.5% टैक्स लगता है. (नोट: ₹1.25 लाख तक का लॉन्ग टर्म मुनाफा टैक्स-फ्री होता है).
जब कंपनियां अपने मुनाफे का हिस्सा 'डिविडेंड' के रूप में आपको देती हैं, तो वह आपकी कमाई में जुड़ जाता है. अब यह आपकी इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स योग्य होता है. अगर साल भर में डिविडेंड ₹10,000 से अधिक है, तो कंपनी 10% TDS भी काटती है.
अगर आप इंट्राडे ट्रेडिंग करते हैं तो उस पर आपको अपनी इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स देना होता है. बता दें कि इसे स्पेक्युलेटिव इनकम कहा जाता है.
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आपके द्वारा ब्रोकर को दी जाने वाली 'ब्रोकरेज' पर 18% GST लगता है. भले ही यह शेयर बाजार से होने वाली आपकी कमाई पर ना लग रहा हो, लेकिन वह कमाई करने के लिए आपको ब्रोकर की जरूरत तो होगी ही, जिस पर ये टैक्स लगता है.

शेयर बाजार में निवेश करते समय इन टैक्सों को ध्यान में रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि ये आपके 'नेट रिटर्न' (Net Return) को कम कर देते हैं. एक समझदार निवेशक वही है जो अपनी होल्डिंग अवधि और टैक्स लायबिलिटी को समझकर निवेश करे. सरकार का हिस्सा तो तय है, लेकिन आप सही प्लानिंग (जैसे ₹1.25 लाख की LTCG छूट का लाभ लेना) के जरिए अपनी टैक्स देनदारी को कम जरूर कर सकते हैं.
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आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 क्या घाटा होने पर भी टैक्स देना पड़ता है?
कैपिटल गेन्स टैक्स केवल मुनाफे पर लगता है, लेकिन STT और GST जैसे ट्रांजैक्शन टैक्स आपको घाटा होने पर भी देने पड़ते हैं.
Q2 क्या शेयर बाजार के घाटे को मुनाफे से एडजस्ट किया जा सकता है?
हां, आप शॉर्ट टर्म घाटे को शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म मुनाफे से 'सेट-ऑफ' कर सकते हैं, जिससे आपकी कुल टैक्स देनदारी कम हो जाती है.
Q3 इंट्राडे ट्रेडिंग (Intraday) पर कितना टैक्स लगता है?
इंट्राडे ट्रेडिंग से होने वाली कमाई को 'स्पेक्युलेटिव बिजनेस इनकम' माना जाता है और यह आपकी सामान्य टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स योग्य होती है.
Q4 टीडीएस (TDS) क्या है?
टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (TDS) वह टैक्स है जो आय का भुगतान करते समय (जैसे डिविडेंड) भुगतानकर्ता द्वारा ही काट लिया जाता है.
Q5 क्या ₹1.25 लाख का LTCG हर साल माफ है?
हां, एक वित्त वर्ष में कुल ₹1.25 लाख तक का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स-फ्री होता है, उससे ऊपर के मुनाफे पर 12.5% टैक्स लगता है.