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Equity Mutual Funds पर Short-Term और Long-Term Capital Gains के अलग टैक्स नियम लागू होते हैं. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
अगर आपने Mutual Funds में निवेश किया है या SIP शुरू करने की सोच रहे हैं, तो सिर्फ रिटर्न जानना काफी नहीं है. असली फर्क इस बात से पड़ता है कि Income Tax कटने के बाद आपके हाथ में कितना पैसा बचता है.
कई निवेशक Equity और Debt Mutual Funds के टैक्स नियमों को लेकर कन्फ्यूज रहते हैं. खासकर अप्रैल 2023 के बाद Debt Funds के टैक्स नियम बदलने के बाद यह सवाल और बड़ा हो गया है कि आखिर किस फंड में टैक्स का बोझ ज्यादा है और किसमें फायदा.
SEBI के नियमों के अनुसार, अगर कोई Mutual Fund अपनी कुल असेट का कम से कम 65% हिस्सा भारतीय कंपनियों के इक्विटी शेयरों में निवेश करता है, तो उसे Equity-Oriented Mutual Fund माना जाता है. इसमें शामिल हैं:
अगर किसी फंड में Domestic Equity Exposure 35% या उससे कम है, तो उसे Non-Equity Fund माना जाता है. इसमें शामिल हैं:
Finance Act 2023 में “Specified Mutual Fund” के लिए खास तौर पर 35% या उससे कम domestic equity exposure वाली शर्त लाई गई थी. ऐसे में कुछ मामलों में ऐसे फंड Specified Mutual Fund भी हो सकते हैं.
Debt Mutual Funds मुख्य रूप से Fixed Income Instruments में निवेश करते हैं, जैसे:

Equity Funds में टैक्स पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने निवेश कितने समय तक होल्ड किया. अगर 12 महीने के अंदर बेच दिया तो यह Short-Term Capital Gain (STCG) माना जाएगा.
STCG टैक्स कितना लगेगा?
STCG Tax = 20%
अगर 12 महीने से ज्यादा होल्ड किया, तो यह Long-Term Capital Gain (LTCG) कहलाएगा.
LTCG पर टैक्स नियम
Equity Fund Tax का आसान उदाहरण
| निवेश | मुनाफा | होल्डिंग पीरियड | टैक्स |
| ₹5 लाख | ₹80,000 | 8 महीने | 20% STCG |
| ₹5 लाख | ₹2 लाख | 2 साल | ₹1.25 लाख तक टैक्स फ्री, बाकी पर 12.5% |
सरकार ने अप्रैल 2023 से Debt Mutual Funds के टैक्सेशन नियमों में बड़ा बदलाव किया. पहले Debt Funds में Indexation Benefit मिलता था, जिससे टैक्स कम हो जाता था. लेकिन अब नए निवेशों पर यह फायदा खत्म कर दिया गया है.
अगर आपने Debt Mutual Fund में निवेश 1 अप्रैल 2023 या उसके बाद किया है, तो आपका Holding Period कोई मायने नहीं रखेगा. पूरे मुनाफे पर आपके Income Tax Slab के हिसाब से टैक्स होगा. यानी अगर आप 5 फीसदी स्लैब में आते हैं तो 5 फीसदी टैक्स चुकाएंगे और अगर 30 फीसदी स्लैब में आते हैं तो 30 फीसदी स्लैब चुकाएंगे.
पुराने निवेशों के लिए पुराने नियम लागू रहेंगे.
| Holding Period | Tax Treatment |
| 2 साल या कम | Income Tax Slab Rate |
| 2 साल से ज्यादा | 12.5% LTCG Tax |

पहले Mutual Fund कंपनियां Dividend Distribution Tax (DDT) काटती थीं. लेकिन अब यह नियम खत्म हो चुका है. अब:
Income Tax Act के Section 194 के तहत अगर Financial Year में Dividend ₹10,000 से ज्यादा है तो AMC 10% TDS काट सकती है.
अगर सिर्फ Mutual Fund Capital Gain है तो आमतौर पर:
ITR-2 भरना होता है
अगर Business या Freelancing Income भी है तो:
ITR-3 भरना पड़ेगा
हां, कुछ मामलों में. अगर आपका LTCG केवल Listed Equity Shares या Equity Mutual Funds से है और कुल LTCG ₹1.25 लाख तक है तो आप ITR-1 (Sahaj) भी फाइल कर सकते हैं. इस साल से आईटीआर-1 में ही कुछ इसे भरने की सुविधा दी गई है.
कई निवेशक सिर्फ Return देखकर Fund चुनते हैं, लेकिन टैक्स के बाद वास्तविक कमाई काफी बदल सकती है. उदाहरण के लिए 12% Return वाला Debt Fund टैक्स के बाद कम फायदा दे सकता है, जबकि Equity Fund लंबी अवधि में ज्यादा Tax Efficient साबित हो सकता है. यानी सही टैक्स समझना उतना ही जरूरी है जितना सही फंड चुनना.
अगर आप Mutual Funds में निवेश कर रहे हैं, तो ये 5 बातें जरूर समझें:
Step 1: Fund Type पहचानें
Equity है या Debt?
Step 2: Holding Period देखें
कितने समय तक निवेश रखा?
Step 3: Gain Calculate करें
Selling Value- Purchase Value
Step 4: Applicable Tax चुनें
STCG, LTCG या Slab Rate
Step 5: ITR में सही रिपोर्ट करें
रिपोर्टिंग गलत, मतलब दिक्कतें होना तय
Mutual Fund में निवेश करते समय सिर्फ Return देखना काफी नहीं है. टैक्स नियम समझना भी उतना ही जरूरी है. Equity Funds लंबे समय में Tax Efficient माने जाते हैं, जबकि Debt Funds पर अप्रैल 2023 के बाद टैक्स का बोझ बढ़ गया है. अगर आप अपने Financial Goals, Risk और Tax Slab के हिसाब से सही प्लानिंग करेंगे, तो टैक्स बचाने के साथ बेहतर Wealth Creation भी कर पाएंगे.
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