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भारत में लेबर कोड्स (New Labour Code) का लागू होना कामकाजी दुनिया के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है. अब तक कंपनियां अपनी मर्जी से सैलरी स्ट्रक्चर तय करती थीं, जिसमें अक्सर बेसिक सैलरी को बहुत कम रखा जाता था, ताकि कंपनी को पीएफ और ग्रेच्युटी के रूप में कम पैसे देने पड़ें. लेकिन नए लेबर कोड ने इस खेल को पूरी तरह से बदल दिया है.
सरकार का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा (Social Security) को मजबूत करना है. नए नियमों के अनुसार, किसी भी कर्मचारी की बेसिक सैलरी (Basic Pay) उसके कुल वेतन (CTC) का कम से कम 50% होनी चाहिए. इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा, जिनकी सैलरी में भत्तों (Allowances) का हिस्सा बहुत ज्यादा था. आइए, ₹60,000 की सीटीसी के उदाहरण से समझते हैं कि आपकी जिंदगी में क्या बदलने वाला है.
नए लेबर कोड से पहले, कंपनियां 'स्मार्ट' तरीके से सैलरी ब्रेकअप तैयार करती थीं. यदि आपकी कुल सैलरी ₹60,000 थी, तो अक्सर बेसिक सैलरी को ₹20,000 के आसपास रखा जाता था. इसका फायदा यह था कि पीएफ की कटौती कम होती थी और कर्मचारी को महीने के अंत में हाथ में ज्यादा पैसे (Take-home Pay) मिलते थे.
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| कंपोनेंट (Component) | राशि (₹) |
| कुल सैलरी (CTC) | 60,000 |
| बेसिक सैलरी (Basic Pay) | 20,000 |
| पीएफ- कर्मचारी योगदान (12% of Basic) | 2,400 |
| पीएफ- नियोक्ता योगदान (12% of Basic) | 2,400 |
| ग्रेच्युटी (अनुमानित मंथली डिडक्शन) | 962 |
| स्पेशल अलाउंस (भत्ते) | 34,238 |
| इन-हैंड सैलरी (Basic + Special Allowance) | 54,238 |
नए लेबर कोड के तहत, अगर आपकी सीटीसी ₹60,000 है, तो कंपनी को आपकी बेसिक सैलरी कम से कम ₹30,000 (50%) रखनी ही होगी. जैसे ही आपकी बेसिक सैलरी ₹20,000 से बढ़कर ₹30,000 होगी, आपके पीएफ और ग्रेच्युटी का कैलकुलेशन भी इसी बढ़ी हुई राशि पर होगा.
| कंपोनेंट (Component) | राशि (₹) |
| कुल सैलरी (CTC) | 60,000 |
| बेसिक सैलरी (50% of CTC) | 30,000 |
| पीएफ- कर्मचारी योगदान (12% of Basic) | 3,600 |
| पीएफ- नियोक्ता योगदान (12% of Basic) | 3,600 |
| ग्रेच्युटी (नया अनुमानित मंथली डिडक्शन) | 1,443 |
| स्पेशल अलाउंस (बाकी बची राशि) | 21,357 |
| इन-हैंड सैलरी (Basic + Special Allowance) | 51,357 |
अगर हम दोनों परिस्थितियों की तुलना करें, तो साफ है कि ₹60,000 की सीटीसी पर कर्मचारी की इन-हैंड सैलरी में लगभग ₹2,881 की कमी आएगी. लेकिन यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है. यह पैसा कहीं खो नहीं रहा है. यह पैसा आपके पीएफ खाते में जमा हो रहा है और आपकी ग्रेच्युटी के लिए जा रहा है.
पीएफ में फायदा: पहले कर्मचारी और नियोक्ता का कुल पीएफ ₹4,800 जमा होता था, जो अब बढ़कर ₹7,200 हो जाएगा. यानी हर महीने ₹2,400 की अतिरिक्त बचत.
ग्रेच्युटी में फायदा: ग्रेच्युटी का मंथली डिडक्शन ₹962 से बढ़कर ₹1,443 हो गया, जो बाद में आपके ही काम आएगा.
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ग्रेच्युटी वह राशि है जो एक कंपनी अपने कर्मचारी को लंबे समय तक दी गई सेवाओं के बदले इनाम के रूप में देती है. नए लेबर कोड के तहत, अब एक साल की नौकरी के बाद भी ग्रेच्युटी का फायदा मिलेगा, जो पहले 5 साल बाद मिलता था.
ग्रेच्युटी कैलकुलेशन:
ग्रेच्युटी के कैलकुलेशन के लिए इस फॉर्मूले का इस्तेमाल किया जाता है:
ग्रेच्युटी = आखिरी महीने की बेसिक सैलरीx15/26xनौकरी के साल
ध्यान रखें:
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एक उदाहरण से समझते हैं
अगर आपकी बेसिक सैलरी ₹30,000 है और आपने एक ही कंपनी में 1 साल काम किया है, तो:
30,000*15/26*1 = ₹17,307
पुराने स्ट्रक्चर (₹20,000 बेसिक) में यही राशि केवल ₹11,538 होती. यानी सीधे तौर पर आपको ₹5,769 का फायदा हो रहा है.
नए लेबर कोड को लेकर दो तरह की बातें हो रही हैं. एक वर्ग का कहना है कि महंगाई के समय में इन-हैंड सैलरी कम होना मुश्किल पैदा करेगा. वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय निजी क्षेत्र में काम करने वालों के पास अक्सर रिटायरमेंट के लिए पर्याप्त फंड नहीं होता. यह नया कानून जबरन बचत (Forced Saving) की तरह काम करेगा. जब आप 10 या 20 साल बाद नौकरी छोड़ेंगे या रिटायर होंगे, तो आपके पास पीएफ और ग्रेच्युटी के रूप में एक बहुत बड़ा फंड होगा.
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नए लेबर कोड का असर आपकी लाइफस्टाइल पर थोड़ा पड़ सकता है, क्योंकि हाथ में आने वाला पैसा कम होगा. लेकिन लंबी अवधि में यह आपके लिए फायदे का सौदा है. ₹60,000 की सीटीसी वाले व्यक्ति के लिए ₹4,000 की इन-हैंड कटौती भले ही अभी अखरे, लेकिन भविष्य में मिलने वाला ब्याज और टैक्स-फ्री ग्रेच्युटी इस कमी की भरपाई कर देगी. हालांकि, अगर आप चाहे तो कंपनी के एचआर से बोलकर न्यूनतम डिडक्शन ले सकते हैं, जिससे आपका इनहैंड थोड़ा बढ़ जाएगा, लेकिन पीएफ कम हो जाएगा.
1. क्या नया लेबर कोड अनिवार्य है?
हां, एक बार लागू होने के बाद यह सभी निजी और सरकारी संस्थानों के लिए अनिवार्य होगा.
2. बेसिक सैलरी को 50% करना क्यों जरूरी है?
ताकि कर्मचारियों को मिलने वाले अन्य लाभ जैसे पीएफ और ग्रेच्युटी की गणना एक सम्मानजनक राशि पर हो सके.
3. क्या ग्रेच्युटी के लिए 5 साल की शर्त अभी भी है?
नए लेबर कोड में कुछ श्रेणियों के लिए इसे घटाकर 1 साल करने का प्रस्ताव है, हालांकि अंतिम नियमों का इंतजार है.
4. क्या इन-हैंड सैलरी घटने से टैक्स कम देना होगा?
हां, क्योंकि आपका पीएफ योगदान बढ़ जाएगा, इसलिए आप टैक्स कटौती का लाभ ले पाएंगे.
5. क्या कंपनियां सीटीसी बढ़ाएंगी?
यह पूरी तरह कंपनी की पॉलिसी पर निर्भर करता है, लेकिन नियमों के पालन के लिए उन्हें सैलरी स्ट्रक्चर बदलना ही होगा.
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