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आज के टाइम में ज्यादातर लोग इन्वेस्टमेंट तो भर-भर के करते हैं, लेकिन सही प्लानिंग से अक्सर चूक जाते हैं. असल में कई बार इन्वेस्टक एक ही शेयर, म्यूचुअल फंड या किसी एक ही एसेट पर जरूरत से ज्यादा भरोसा कर बैठते हैं. लेकिन किसी एक इन्वेस्टमेंट से लगातार अच्छा रिटर्न मिलने लगता है, तो लोग सोचते हैं कि यही सही रास्ता है और अपना ज्यादातर पैसा उसी में लगा देते हैं. बस यहीं लोग गलत कर रहे हैं, असल में यही स्थिति आगे चलकर “कंसंट्रेटेड पोर्टफोलियो”(Concentrated Portfolio) बन जाती है, जो दिखने में फायदे का सौदा लगता है, लेकिन असल में बहुत रिस्क से भरा होता है.
यानी कि सिंपल शब्दों में कहें तो जब आपके पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा केवल एक या दो इन्वेस्टमेंट ऑप्शन में फंसा हो, तो उसे केंद्रित या कंसंट्रेटेड पोर्टफोलियो कहा जाता है. ऐसी में अगर उस शेयर, सेक्टर या एसेट में गिरावट आती है, तो आपके पूरे इन्वेस्टमेंट पर सीधा असर पड़ता है.जिसका नतीजा ये होता है कि कई बार सालों की मेहनत की कमाई कुछ ही महीनों में भारी नुकसान में बदल जाती है.
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खबर से जुड़े 5 अहम FAQs
Q1. केंद्रित पोर्टफोलियो क्या होता है?
जब किसी निवेशक का ज्यादा पैसा सिर्फ एक या दो जगह लगा हो, तो उसे केंद्रित पोर्टफोलियो कहा जाता है.
Q2. केंद्रित पोर्टफोलियो जोखिम भरा क्यों है?
क्योंकि एक ही सेक्टर या शेयर में गिरावट आने पर पूरे निवेश पर बड़ा असर पड़ता है.
Q3. डायवर्सिफिकेशन क्या होता है?
अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश को डायवर्सिफिकेशन कहते हैं, जिससे जोखिम कम होता है.
Q4. पोर्टफोलियो को कितनी बार रीव्यू करना चाहिए?
कम से कम साल में एक बार पोर्टफोलियो की समीक्षा जरूर करनी चाहिए.
Q5. क्या छोटे निवेशक भी डायवर्सिफिकेशन कर सकते हैं?
हां, म्यूचुअल फंड और SIP के जरिए छोटे निवेशक भी आसानी से डायवर्सिफिकेशन कर सकते हैं.
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