GST Reform: जेब में राहत, ख्वाहिशों पर टैक्स का बोझ- ये सोशल इंजीनियरिंग नहीं तो क्या है!

नवरात्र और दिवाली से पहले आम आदमी की जेब, जिंदगी और जरूरत से जुड़ी अनगिनत चीजों को सस्ता करके सरकार ने ना सिर्फ पब्लिक सेंटीमेंट को बेहतर करने में कामयाबी हासिल की है बल्कि इंडस्ट्रीज से लेकर शेयर बाजार तक में जोश भरने की कोशिश भी की है. लेकिन GST सुधारों की कहानी क्या इतनी सीधी है? या फिर सरकार ने एक तीर कई निशाने साधे हैं? ज़रा समझने की कोशिश करते हैं कि राहत की ये बरसात कहां-कहां कैसा-कैसा असर छोड़ने वाली है.
GST Reform: जेब में राहत, ख्वाहिशों पर टैक्स का बोझ- ये सोशल इंजीनियरिंग नहीं तो क्या है!

भारत एक मिडिल क्लास प्रधान देश है. भारत को खुश करना है तो मिडिल क्लास को खुश कर दीजिए. पिछले बजट में सालाना 12 लाख कमाने वालों को इनकम टैक्स से राहत देकर मोदी सरकार ने इस दिशा में पहला सिक्सर मारा था. GST 2.0 के एलानों को दूसरा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है. ये एक दुर्लभ संयोग है कि देश के बड़े अखबारों के पहले पन्ने पर आज GST सुधारों को लेकर फुल पेज सरकारी ऐड है और अंदर GST ही अखबार की टॉप स्टोरी भी है. नवरात्र और दिवाली से पहले आम आदमी की जेब, जिंदगी और जरूरत से जुड़ी अनगिनत चीजों को सस्ता करके सरकार ने ना सिर्फ पब्लिक सेंटीमेंट को बेहतर करने में कामयाबी हासिल की है बल्कि इंडस्ट्रीज से लेकर शेयर बाजार तक में जोश भरने की कोशिश भी की है. लेकिन GST सुधारों की कहानी क्या इतनी सीधी है? या फिर सरकार ने एक तीर कई निशाने साधे हैं? ज़रा समझने की कोशिश करते हैं कि राहत की ये बरसात कहां-कहां कैसा-कैसा असर छोड़ने वाली है.

VIDEO- सिगरेट-शराब क्यों लगी 40% GST? जानिए वजह

GST की बिसात पर सोशल इंजीनियरिंग की बाजी

वस्तु एवं सेवा कर परिषद यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स काउंसिल. इस काउंसिल की 56वीं बैठक के तमाम फैसले दरअसल भारत की कंजम्प्शन स्टोरी को बदलने वाले हैं. कैसे? जहां एक तरफ मिडिल क्लास के लिए जरूरी इंश्योरेंस, घरेलू ज़रूरत के सामान, खाने-पीने की चीज़ें सस्ती कर दी गई हैं वहीं दूसरी तरफ जिन्हें महंगी गाड़ियों, प्रीमियम बाइक, तंबाकू, ऐडेड शुगर और कैफ़ीन वाले ड्रिंक्स और ऑनलाइन गेमिंग का लुत्फ लेना है उनपर 28% की जगह सीधे 40% टैक्स का बोझ डाल दिया गया है. यानी ये सिर्फ टैक्सेशन में बदलाव नहीं, बल्कि एक तरह की सोशल इंजीनियरिंग भी है जहां ज़रूरी और सेहतमंद विकल्पों को बढ़ावा दिया गया है और विलासिता पर महंगाई का हंटर चलाया गया है. इन ऐलानों से कुछ हद तक लोगों की लाइफस्टाइल चॉइसेज बदलेंगी, जिससे जरूरी सेक्टरों में ग्रोथ आएगी और लग्जरी और नुकसानदेह चीजों की डिमांड घटेगी. ये कहना भी गलत नहीं होगा कि GST को सरकार ने जनता की आदतें और सेहत को रेगुलेट करने के लिए भी इस्तेमाल किया है.

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टशन की चाह पर टैक्स का बोझ क्यों?

बरसों से सुनते आ रहे हैं कि हम विकासशील देश हैं. हमें विकसित देश बनना है. कैसा होता है विकसित देश? जो सिर्फ सर्वाइवल पर जीता है या जो अपनी ‘पर कैपिटा इनकम’ की धौंस अपनी लाइफस्टाइल चॉइसेज के ज़रिए जमाता है. हमारे यहां टीवी-फ्रिज सस्ता हो गया. तेल साबुन सस्ता हो गया. दूध, घी, पनीर से लेकर भुजिया, नमकीन तक सस्ता हो गया. अच्छी बात है. हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस सस्ता हो गया. डायबिटीज वालों के लिए ग्लूकोमीटर और टेस्ट स्ट्रिप्स सस्ते हो गए. पढ़ने-लिखने वाले बच्चों के लिए कॉपी, पेंसिल, शार्पनर, नक्शे और ग्लोब तक सस्ते हो गए. बहुत अच्छी बात है. लेकिन सवाल ये है कि क्या जो रोज़मर्रा के की ज़िंदगी के लिए ज़रूरी है, सिर्फ वो ही ज़रूरी है? क्या सिर्फ बुनियादी जरूरतों सही मानना और आकांक्षाओं को गलत गलत मानना ठीक है? क्या हम सिर्फ सरवाइवल को सपोर्ट कर रहे हैं और सपनों पर कैंची चला रहे हैं? सवाल ये है कि सरकार उस भारत के साथ भेदभाव क्यों कर रही है जिसे सुपरबाइक्स, महंगी कारों, ऑनलाइन गेमिंग और कसीनो का शौक है? सवाल ये है लग़्जरी और सिन को एक ही नज़र से क्यों देखा जा रहा है?

कितनी राहत, कितना परसेप्शन मैनेजमेंट?

टीवी, प्रिंट, डिजिटल हर तरफ हेडलाइंस का संदेश तकरीबन एक-सा है कि ढेर सारी चीजें एक झटके में सस्ती हो गईं. बताया यही जा रहा है किGST 2.0 आम कंज्यूमर के लिए किसी बोनांज़ा से कम नहीं. लेकिन क्या बात सचमुच इतनी सीधी और सरल है? समझने की बात ये है कि GST दरों में कटौती का मतलब ये नहीं कि चीजों के दाम खुद-ब-खुद घट जाएंगे. ये फैसला आखिरकार कंपनियों के हाथ में होता है कि कटौती का कितना फायदा कंज्यूमर तक पहुंचाना है. कुछ वैसे ही कि RBI के रेपो-रेट घटा देने का मतलब ये नहीं आपका लोन सस्ता हो गया. बीच में बैंक भी है जिसे फैसला लेना है. कई बार बढ़ते इनपुट कॉस्ट का हवाला देकर कंपनियां टैक्स दरों में कटौती का पूरा फायदा कंज्यूमर के हिस्से में नहीं डालती हैं. यानी पहली नज़र में भले ही लग रहा हो कि सरकार ने बहुत सी चीजें सस्ती कर दीं लेकिन सचमुच ऐसा ही होने की फुल गारंटी नहीं है. दूसरी तरफ ऐसी भी चीजों की लिस्ट छोटी नहीं है जिन्हें 40% टैक्स के दायरे में डाला गया है. ऐसी वस्तुओं और सेवाओं पर महंगाई का डंक शर्तिया महसूस होगा, इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं.

अच्छा डिजिटल बनाम बुरा डिजिटल

गौर करने की बात ये भी है कि ऑनलाइन गेमिंग, बेटिंग और कसीनों पर 40% टैक्स लगाकर उसे न सिर्फ आम लोगों की पहुंच से दूर किया गया है बल्कि इन क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों के लिए भी धंधा मुश्किल बना दिया गया है. लेकिन साथ ही दूसरी डिजिटल सेवाएं जैसे OTT सब्सक्रिप्शन, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स और ज्यादातर ऑनलाइन सेवाओं को महंगाई की चोट नहीं पड़ी है. यानी सरकार ने डिजिटल कंजम्प्शन में भी संस्कारी रेखा खींचने की कोशिश की है. जो काम की डिजिटल सेवाएं हैं जैसे शॉपिंग, स्ट्रीमिंग और डिजिटल यूटिलिटीज़ उनके लिए तो हरी झंडी है लेकिन लत डालने वाले या आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाले डिजिटल विकल्पों को हतोत्साहित किया गया है. यानी GST सुधार एक संस्कारी भारत की ओर बढ़ने का संकेत भी हैं जहां आपको साफ-साफ बताया जा रहा है कि आपके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा.

अंत में तो सब सियासत ही है!

ये समझने के लिए किसी को जीनियस होने की जरूरत नहीं कि जितने अहम GST 2.0 के रिफॉर्म्स हैं उससे कहीं ज्यादा अहम है इनकी टाइमिंग. देश में त्योहारी सीज़न की शुरुआत होने वाली है और उधर बिहार विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तेज हो चुकी है. ऐसे वक्त में हेल्थ इंश्योरेंस, लाइफ इंश्योरेंस, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और घरेलू इस्तेमाल के सामानों को सस्ता करना सीधे तौर पर मिडिल क्लास को रिझाने की कोशिश है. त्यौहारों के दौरान लोग वैसे भी औसत से ज्यादा खरीदारी करते हैं. ऊपर से कीमतें घट जाने का असर. जाहिर है लोगों की खरीदारी बढ़ेगी और इससे इकोनॉमी को भी बूस्टर मिलेगा. और साथ ही आम वोटर के बीच ये मैसेज भी पहुंच गया कि सरकार हमारी कितनी फिक्र करती है. चुनावी मौसम में बीजेपी के लिए इससे बेहतर बात क्या हो सकती है. तो कुल मिलाकर विन-विन सिचुएशन है. GST 2.0 भारत की एक बड़ी आबादी के लिए ही नहीं, खुद सरकार के सियासी भविष्य के लिए भी वरदान साबित हो सकती है.

(लेखक ज़ी बिज़नेस डिजिटल के एडिटर हैं)