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कार एक्सीडेंट के मामले में हर कोई चाहता है कि इंश्योरेंस क्लेम का काम फटाफट हो ताकि नुकसान की भरपाई जल्द से जल्द हो और गाड़ी की मरम्मत भी समय रहते करवाई जा सके. लेकिन तमाम लोग इस मामले में देरी होने की शिकायत करते हैं. लेकिन क्लेम में देरी की वजह कई बार हमारी कुछ गलतियां भी होती हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर सही समय पर सूचना दी जाए और सभी दस्तावेज़ दुरुस्त हों, तो 70% से ज़्यादा मामलों में क्लेम जल्दी सेटल हो जाता है. यहां जानिए इंश्योरेंस क्लेम में देरी या रिजेक्शन की वजह और इसे जल्दी सेटल करने का तरीका.
दुर्घटना के बाद बीमा कंपनी को सूचित करने में देरी करना क्लेम रिजेक्ट होने का एक बड़ा कारण है. ज़्यादातर कंपनियां चाहती हैं कि घटना के 24 से 48 घंटों के भीतर उन्हें जानकारी दे दी जाए.
ये सबसे आम कारण है. क्लेम फॉर्म में गलत जानकारी भरना, FIR की कॉपी न होना, ड्राइविंग लाइसेंस या रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (RC) जैसे ज़रूरी कागज़ों का पूरा न होना प्रक्रिया को धीमा कर देता है. ऐसे में कंपनियां हर जानकारी को वेरिफाई करती हैं, जिसमें समय लगता है.
थर्ड-पार्टी लायबिलिटी, चोरी या किसी बड़ी दुर्घटना के मामले में FIR दर्ज कराना कानूनी रूप से अनिवार्य है. FIR की कॉपी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जिसे बीमा कंपनियां क्लेम प्रोसेस करने के लिए मांगती हैं.
अगर ड्राइवर ने शराब पी रखी थी या किसी ट्रैफिक नियम का उल्लंघन किया है, तो बीमा कंपनी क्लेम को सीधे तौर पर खारिज कर सकती है.
कई बार लोगों को ये पता ही नहीं होता कि उनकी पॉलिसी में क्या-क्या कवर होता है और क्या नहीं. पॉलिसी के नियमों (Exclusions) के अंतर्गत आने वाले नुकसान का क्लेम करने पर वह खारिज हो जाता है.
भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) के नियमों के अनुसार, बीमा कंपनियों को सभी ज़रूरी दस्तावेज़ मिलने के 30 दिनों के भीतर क्लेम का निपटान करना होता है. अगर 30 दिनों के बाद भी आपका क्लेम सेटल नहीं होता या कंपनी बिना किसी ठोस कारण के देरी करती है, तो आप IRDAI के शिकायत निवारण पोर्टल 'बीमा भरोसा' पर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं.
आमतौर पर, आपको दुर्घटना के 24 से 48 घंटों के भीतर बीमा कंपनी को सूचित करने की कोशिश करें. हालांकि, क्लेम फाइल करने की अंतिम समय-सीमा कंपनी और पॉलिसी के नियमों पर निर्भर करती है, जो 7 दिन से लेकर 90 दिन तक हो सकती है.
नहीं, छोटे-मोटे नुकसान के लिए FIR अनिवार्य नहीं है. लेकिन अगर दुर्घटना में किसी तीसरे व्यक्ति को चोट लगी है, किसी की संपत्ति को नुकसान हुआ है, आपकी गाड़ी चोरी हो गई है या कोई बड़ा हादसा हुआ है, तो FIR दर्ज कराना कानूनी रूप से ज़रूरी है.
कैशलेस क्लेम में, आप अपनी कार की मरम्मत बीमा कंपनी के नेटवर्क गैरेज में कराते हैं और बिल का भुगतान कंपनी सीधे गैरेज को करती है. रीइम्बर्समेंट क्लेम में, आप किसी भी गैरेज में मरम्मत कराकर पहले खुद भुगतान करते हैं और बाद में बिल जमा करके कंपनी से पैसे वापस लेते हैं.
सबसे पहले कंपनी से लिखित में क्लेम रिजेक्ट करने का कारण पूछें. अगर आपको लगता है कि कारण गलत है, तो आप कंपनी के शिकायत निवारण अधिकारी (GRO) से संपर्क कर सकते हैं. वहां से भी समाधान न मिलने पर आप बीमा लोकपाल या IRDAI में शिकायत कर सकते हैं.
ये नुकसान की राशि और आपके नो-क्लेम बोनस (NCB) पर निर्भर करता है. अगर मरम्मत का खर्च कम है, तो क्लेम न करना बेहतर हो सकता है, क्योंकि क्लेम करने से आपका NCB खत्म हो जाएगा और अगले साल पॉलिसी रिन्यू करते समय मिलने वाली छूट नहीं मिलेगी.