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हेल्थ इंश्योरेंस (Health Policy) हर किसी के लिए लाइफ का अहम हिस्सा है. मेडिकल खर्चे (Medical Expenses) इतने बढ़ गए हैं कि बिना इंश्योरेंस (Insurance) के इलाज करवाना जेब पर भारी पड़ जाता है. यही वजह है कि लोग कम उम्र से ही हेल्थ इंश्योरेंस प्लान खरीदने लगे हैं. वहीं कुछ समय पहले ही सरकार ने हेल्थ इंश्योरेंस पर जीएसटी (GST on Insurance) जो 18 फीसदी से घटाकर 0 कर दिया (GST Rate Cut) है, जिसके चलते भी उम्मीद है कि बहुत सारे नए लोग इंश्योरेंस से जुड़ेंगे.
बहुत बार लोग बिना सोचे-समझे सिर्फ प्रीमियम की रकम देखकर पॉलिसी खरीद लेते हैं. बाद में जब अस्पताल (Hospital) में इलाज कराने की नौबत आती है तो पता चलता है कि पॉलिसी से उतना फायदा नहीं मिल पा रहा. इसलिए जरूरी है कि हेल्थ इंश्योरेंस लेने से पहले आपको इन 9 बातों पर ध्यान जरूर देना चाहिए.
हेल्थ इंश्योरेंस का सबसे बड़ा फायदा तभी मिलेगा, जब उसका कवरेज आपके और आपके परिवार की जरूरत के हिसाब से हो. कई बार लोग कम प्रीमियम के चक्कर में छोटा कवरेज चुन लेते हैं. लेकिन अस्पताल का बिल लाखों में पहुंच जाता है. इसलिए हमेशा ऐसी पॉलिसी चुनें जो कम से कम 5 लाख से शुरू हो और जरूरत के हिसाब से उसे बढ़ाया जा सके.
हर हेल्थ पॉलिसी में एक वेटिंग पीरियड होता है. इसका मतलब है कि अगर आपको पहले से कोई बीमारी है तो उसका इलाज पॉलिसी लेने के तुरंत बाद कवर नहीं होगा. आम तौर पर ये समय 2 से 4 साल तक होता है. इसलिए पॉलिसी खरीदने से पहले ये जरूर देखें कि किस बीमारी के लिए कितना वेटिंग पीरियड है.
कैशलेस इलाज की सुविधा तभी मिलेगी जब आपका अस्पताल कंपनी के नेटवर्क में शामिल होगा. अगर नेटवर्क हॉस्पिटल आपके शहर या आसपास में नहीं है तो कैशलेस इलाज मुश्किल हो जाएगा. इसलिए हेल्थ इंश्योरेंस लेने से पहले नेटवर्क हॉस्पिटल की लिस्ट जरूर देख लें.
हर कंपनी का क्लेम सेटलमेंट रेशियो (Claim Settlement Ratio) अलग होता है. यानी कितने क्लेम्स में से कंपनी ने कितनों को मंजूरी दी. अगर ये रेशियो ज्यादा है तो कंपनी भरोसेमंद मानी जाती है. क्लेम सेटलमेंट आसान होगा तो पॉलिसी का फायदा भी सही तरह से मिलेगा.
अगर एक साल आपने पॉलिसी का इस्तेमाल नहीं किया यानी कोई क्लेम नहीं किया, तो कंपनी आपको नो-क्लेम बोनस (NCB) देती है. इससे अगले साल का कवरेज बढ़ जाता है. पॉलिसी लेते वक्त ये जरूर देखें कि कंपनी कितने प्रतिशत का नो-क्लेम बोनस देती है.
कई हेल्थ पॉलिसीज में को-पेमेंट की शर्त होती है. इसका मतलब है कि अस्पताल का कुछ हिस्सा आपको खुद देना होगा और बाकी कंपनी देगी. अगर को-पेमेंट ज्यादा है तो आपके ऊपर बोझ बढ़ सकता है. इसलिए कोशिश करें कि ऐसी पॉलिसी चुनें जिसमें को-पेमेंट न हो या बहुत कम हो.
सिर्फ कम प्रीमियम देखकर पॉलिसी न खरीदें. हो सकता है प्रीमियम कम हो लेकिन कवरेज भी उतना ही छोटा मिले. हमेशा ऐसा बैलेंस चुनें, जिसमें प्रीमियम आपके बजट में भी आए और कवरेज भी अच्छा हो.
अगर परिवार में 3-4 लोग हैं तो फैमिली फ्लोटर पॉलिसी लेना सस्ता और फायदेमंद रहेगा. लेकिन अगर परिवार के किसी सदस्य को पहले से गंभीर बीमारी है तो उसके लिए अलग से इंडिविजुअल पॉलिसी लेना बेहतर होगा, वरना उसकी वजह से आपका प्रीमियम बहुत ज्यादा हो जाएगा.
कुछ पॉलिसीज हर साल फ्री हेल्थ चेकअप, एम्बुलेंस चार्ज, डे-केयर ट्रीटमेंट और यहां तक कि वेक्सिनेशन तक कवर करती हैं. पॉलिसी चुनते वक्त इन बेनेफिट्स को भी जरूर देखें.
हेल्थ इंश्योरेंस लेना अब किसी ऑप्शन की तरह नहीं, बल्कि जरूरत बन गया है. लेकिन सही पॉलिसी चुनने के लिए आपको सिर्फ सस्ता प्रीमियम नहीं देखना चाहिए, बल्कि कवरेज, क्लेम रेशियो और नेटवर्क हॉस्पिटल जैसी बातों को प्राथमिकता देनी चाहिए. याद रखें, हेल्थ इंश्योरेंस एक लंबी अवधि का निवेश है, इसलिए सोच-समझकर सही फैसले से ही आप और आपका परिवार सुरक्षित रह पाएंगे.
हां, ज्यादातर पॉलिसीज अस्पताल में भर्ती होने का खर्च कवर करती हैं.
कुछ पॉलिसी शर्तों के साथ ओपीडी खर्च भी कवर करती हैं, लेकिन सभी नहीं.
हां, एक परिवार के लिए फैमिली फ्लोटर पॉलिसी किफायती होती है.
जितना जल्दी लेंगे उतना सस्ता और फायदेमंद होगा.
नहीं, यह सुविधा सिर्फ कुछ पॉलिसीज में होती है.
नहीं, कुछ बीमारियों पर वेटिंग पीरियड या एक्सक्लूजन होता है.
हां, अगर कंपनी रजिस्टर्ड और भरोसेमंद है तो सुरक्षित है.
हां, जरूरत और बजट के हिसाब से ले सकते हैं.
हां, आप एक कंपनी से दूसरी में पोर्ट कर सकते हैं.
नहीं, कवरेज और बेनेफिट देखकर ही फैसला करें.
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