ऑपरेशन किसान पार्ट-2: प्लाईवुड कंपनियों और भ्रष्ट अफसरों की सांठगांठ का पर्दाफाश, खुफिया कैमरे में सब हुआ रिकॉर्ड

जी न्यूज के स्टिंग ऑपरेशन 'ऑपरेशन किसान पार्ट-2' में खुलासा हुआ है कि किसानों के हक का सब्सिडी वाला कृषि यूरिया अवैध रूप से प्लाईवुड कंपनियों तक पहुंचाया जा रहा है. प्लाईवुड और एमडीएफ (MDF) बोर्ड बनाने के लिए जिस 'ग्लू' या रेजिन (Resin) की जरूरत होती है, उसे बनाने में ₹80-100 प्रति किलो वाले टेक्निकल ग्रेड यूरिया के बजाय ₹6 प्रति किलो वाला सरकारी कृषि यूरिया इस्तेमाल हो रहा है.
ऑपरेशन किसान पार्ट-2: प्लाईवुड कंपनियों और भ्रष्ट अफसरों की सांठगांठ का पर्दाफाश, खुफिया कैमरे में सब हुआ रिकॉर्ड

ZEE NEWS का महाखुलासा: ऑपरेशन किसान पार्ट-2! किसानों के हक पर सबसे बड़ा डाका! प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)

जी न्यूज (ZEE NEWS) की स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम (SIT) ने एक बार फिर देश के अन्नदाताओं के हक पर डाका डालने वाले माफियाओं के खिलाफ बड़ा खुलासा किया है. 'ऑपरेशन किसान पार्ट-2' के जरिए जी न्यूज के खुफिया कैमरों ने उस कड़वे सच को कैद किया है, जिसे जानकर पूरा देश हैरान है. बता दें कि कुछ दिन पहले ही ऑपरेशन किसान पार्ट-1 में हमने दिखाया था कि कैसे किसानों के हक का यूरिया.. प्लाईवुड बनाने वाली कंपनी ले जा रही हैं.

एक तरफ देश का गरीब किसान कड़ी धूप में सब्सिडी वाली खाद के लिए घंटों-घंटों लंबी लाइनों में खड़ा रहता है, वहीं दूसरी तरफ सिस्टम की नाकामी, पुलिस की लापरवाही और भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ से उसी सरकारी यूरिया की धड़ल्ले से कालाबाजारी हो रही है. इस यूरिया को चुराकर देश की बड़ी-बड़ी प्लाईवुड कंपनियां अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही हैं.

बुलंदशहर में पकड़ी गई यूरिया की बड़ी खेप

इस काले खेल की कड़ियां उत्तर प्रदेश से भी जुड़ी हैं. पिछले दिनों यूपी के बुलंदशहर में पुलिस ने समय रहते मुस्तैदी दिखाते हुए 3 ट्रकों को पकड़ा था. इन ट्रकों में कुल 1575 बैग सरकारी यूरिया लदा था, जिसे अवैध रूप से कालाबाजारी के लिए ले जाया जा रहा था. अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस सब्सिडी वाले यूरिया को उत्तर प्रदेश से बाहर किसी प्लाईवुड फैक्ट्री में भेजा जाना था? क्या इसका इस्तेमाल खेतों के बजाय फैक्ट्रियों में 'ग्लू' बनाने के लिए होना था?

कृषि यूरिया और टेक्निकल यूरिया का पूरा गणित

प्लाईवुड, एमडीएफ (MDF) और पार्टिकल बोर्ड बनाने के लिए कड़े गोंद यानी 'ग्लू' (Resin) की आवश्यकता होती है.

नियम क्या कहता है: ग्लू बनाने वाली फैक्ट्रियों को कानूनी रूप से 'टेक्निकल ग्रेड यूरिया' का ही इस्तेमाल करना होता है, जिसकी बाजार में कीमत ₹80 से ₹100 प्रति किलो होती है.

चोरी का खेल: मुनाफा कमाने के चक्कर में ये फैक्ट्रियां बिचौलियों के जरिए किसानों को मिलने वाला 'कृषि यूरिया' खरीद रही हैं, जिसकी कीमत सरकार की भारी सब्सिडी के कारण सिर्फ ₹6 प्रति किलो है.

नतीजा: फैक्ट्रियों को सीधे तौर पर ₹74 से ₹94 प्रति किलो का अवैध मुनाफा होता है. सस्ता यूरिया मिलने से वे सस्ता ग्लू बनाती हैं और उसे प्लाईवुड कंपनियों को बेचती हैं. सीधा फायदा कंपनियों को और सीधा नुकसान देश के किसानों और सरकारी खजाने को हो रहा है.

स्टिंग ऑपरेशन: खुफिया कैमरों से सिस्टम बेनकाब

इस पूरे रैकेट की जड़ तक पहुंचने के लिए जी न्यूज की स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम (SIT) अपनी पहचान बदलकर हरियाणा के यमुनानगर की फैक्ट्रियों में खुफिया कैमरे (Hidden Camera) के साथ पहुंची. कैमरे में जो रिकॉर्ड हुआ, उसने सिस्टम को बेनकाब कर दिया:

रिपोर्टर: ये क्या है भाई?
कारीगर: आपके मतलब की चीज नहीं है.
रिपोर्टर: यहां क्या बनता है?
कारीगर: ग्लू (गोंद).
रिपोर्टर: इसमें खाद (यूरिया) डलता है? नुकसान नहीं है इस खाद का?
कारीगर: नहीं.
रिपोर्टर: टैंकरों में क्या है?
कारीगर: इसमें फॉर्मल होता है, और इसी से हम रेजिन (ग्लू) बनाते हैं.

"अफसरों को हर महीने जाएगा, चाहे काम चालू हो या बंद"

खुफिया कैमरे के सामने एक फैक्ट्री मालिक ने यह तक कबूल कर लिया कि इस धंधे में कोई भी दूध का धुला नहीं है और सरकारी अफसरों को हर महीने फिक्स 'चढ़ावा' (रिश्वत) जाता है, जिसके बाद कोई रेड (Raid) नहीं होती:

रिपोर्टर : क्या ठीक रहेगा ?
फैक्ट्री मालिक: "दबा के करिए, कोई टेंशन नहीं है. सब चल रहा है, कोई दूध का धुला नहीं है. दफ्तर में सब कर लेते हैं. ये देखो, ये बैठे हैं... ये अकेले ही सब संभाल लेते हैं. बाकी ऊपर वाला सब देखता है... सबको देता है, हर महीने देगा, आप काम करें न करें उसको कोई फर्क नहीं पड़ता. हर महीने देगा... आप एक रुपए से चलाइए या 50 रुपए से चलाइए... उसका (सरकारी अफसरों का) जाना है तो जाना है. उसको मतलब नहीं है कि आपका प्रोडक्शन चालू है या बंद है."

संसद की स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन ने भी माना 'सिंडिकेट' का सच

रसायन और खाद पर बनी संसद की स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन कीर्ति आजाद ने भी जी न्यूज से बातचीत में माना कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा नेक्सस काम कर रहा है. उन्होंने कहा- "ये लोग 200-300 लोगों का एक सिंडिकेट (गुट) बनाते हैं. वो सिंडिकेट में शामिल लोग अलग-अलग जगहों से जाकर सब्सिडी वाला खाद खरीदते हैं और खरीदने के बाद उसे बड़े ट्रकों में भर देते हैं. वहां से यह खाद सीधे बड़ी-बड़ी कंपनियों तक पहुंच जाता है."

कागजात खोल रहे हैं नामी ब्रांड्स की पोल

प्लाईवुड बनाने वाली कई नामचीन कंपनियां अक्सर कागजों पर दावा करती हैं कि वे बाहर से बना-बनाया ग्लू या रेजिन (Resin) नहीं खरीदती हैं. लेकिन जी न्यूज के हाथ लगे आधिकारिक बिल इन दावों के झूठ को उजागर करते हैं:

बिल नंबर 1: इस बिल में साफ तौर पर सामान के नाम की जगह बोल्ड अक्षरों में 'रेजिन' (ग्लू) लिखा है. इसकी क्वांटिटी 30,000 किलोग्राम है और रेट ₹32.50 प्रति किलो है. इस एक बिल के मुताबिक, 30 हजार किलो ग्लू की कुल कीमत ₹8,31,900 बनती है.

बिल नंबर 2: देश की इस दिग्गज कंपनी के बिल में भी सामान की जगह स्पष्ट रूप से 'एक्सटीरियर रेजिन' लिखा है. इसकी कुल क्वांटिटी 29,100 किलोग्राम है, जिसकी कीमत ₹10,16,000 से भी अधिक है.

ये पुख्ता दस्तावेज साबित करते हैं कि नामचीन ब्रांड्स धड़ल्ले से उसी ग्लू को खरीद रहे हैं, जिसे सरकारी यूरिया की चोरी करके अवैध फैक्ट्रियों में तैयार किया गया है.

टेस्टिंग लैब की रिपोर्ट में बड़ा धोखा

जी न्यूज की टीम ने यहीं पर तफ्तीश नहीं रोकी. देश के बड़े और नामी प्लाईवुड ब्रांड्स के प्रोडक्ट्स को लेकर टीम एक बड़ी सरकारी टेस्टिंग लैब में पहुंची. लैब की जांच रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाली निकली. ये बड़े ब्रांड अपनी वेबसाइट, विज्ञापनों और कैटलॉग में ग्राहकों से जो वादे करते हैं, वह पूरी तरह से झूठ साबित हुए. यह सीधे तौर पर देश के उपभोक्ताओं के साथ भी एक बड़ा धोखा है.

अभी ऑपरेशन किसान खत्म नहीं हुआ है.. आगे आपको दिखाएंगे कि कैसे कंपनियां सरकार और सिस्टम को नुकसान पहुंचाने के लिए शब्दों की बाजीगरी करती हैं.. और आखिर यूरिया की लूट को रोकने के लिए सरकार कहां चूक रही है.. ऑपरेशन किसान पर एक और बड़ा खुलासा बहुत जल्द.

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