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बीते कुछ सालों की तरह इस साल भी दिल्ली दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में से एक है. लगातार बढ़ते AQI का सीधा असर लोगों की सेहत पर भी दिखने लगा है. सर्दियों का मौसम शुरू होते ही पूरा उत्तर भारत स्मॉग और प्रदूषण की परत से ढंक जाता है. जबकि दक्षिण भारत अब भी राहत क सांसें ले रहा है.
उत्तर भारत में रहने वाले हर नागरिक के मन में कभी ना कभी ये सवाल जरुर उठता है. वो ये कि इंडस्ट्रीज और गाड़ियां तो साउथ में भी उतनी ही हैं जितनी नाॅर्थ में, तो फिर अक्टूबर आते ही दिल्ली क्यों गैस चेंबर बन जाता है? जबकि CPCB के डाटा के मुताबिक बेंगलुरु का AQI नवंबर के महीने में अधिकतम 115 रिकाॅर्ड किया गया था.
भारत में AQI के स्टैंडर्ड सेंट्रल पल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) ने तय किए हैं. हालांकि ये WHO द्वारा तय किए गए स्टैंडर्ड के मुकाबले बहुत कम सख्त हैं, लेकिन नार्थ और सेंट्रल भारत में ये स्टैंडर्ड मेंटेन करना भी मुश्किल होता जा रहा है. CPCB द्वारा तय किए गए स्टैंडर्ड ये बताते हैं कि अलग-अलग शहरों की हवा कितनी प्रदूषित है. भारत में नीचे दिए गए AQI स्टैंडर्ड का पालन किया जाता है.
AQI | Associated Health Impacts |
उत्तम (0–50) | न्यूनतम प्रभाव |
ठीक (51–100) | संवेदनशील लोगों को सांस लेने में हल्की तकलीफ हो सकती है |
मध्यम प्रदूषण (101–200) | छोटे बच्चों, बूढ़ों और अस्थमा या कोई हार्ट प्रॉब्लम वाले लोगों को तकलीफ हो सकती है |
खराब (201–300) | लंबे एक्सपोजर से तकलीफ हो सकती है, सांस लेने की या फेफड़ों की बिमारी हो सकती है |
बहुत खराब (301–400) | लंबे एक्सपोजर से सांस लेने की या फेफड़ों की बिमारी हो सकती है |
गंभीर (401-500) | गंभीर बीमारियां हो सकती हैं |
दिल्ली पॉल्यूशन कण्ट्रोल कमिटी की एक केस स्टडी के मुताबिक, आसपास के शहरों में जलती पराली, शहर की सैकड़ों गाड़ियों, और फैक्ट्रियों के अलावा - दिल्ली को गैस चेंबर बनाने में इन सबसे भी बड़ा हाथ है दिल्ली की जियोग्राफी का. आसपास के शहरों में जलती पराली, शहर की सैकड़ों गाड़ियां, और फैक्ट्रियां - दिल्ली को गैस चेंबर बनाने में इन सबसे भी बड़ा कारण है दिल्ली की जियोग्राफी.
दिल्ली और उसके आस-पास की जगहें सिंधु और गंगा नदी के मैदानी इलाके का हिस्सा हैं. ये पूरा इलाका एक कटोरे के आकार का है और इसके चारों तरफ नेचुरल बैरियर बने हुए हैं जो प्रदूषित हवा को यहां से निकलने नहीं देते. इसके नाॅर्थ में हिमालय है, साउथ में पेनिन्सुलर प्लेट्यू और साउथ वेस्ट में अरावली रेंज है. इसलिए जब सरदियों में हवा ठंडी होकर जमीन के पास आ जाती है तब इन बैरियर्स की वजह से दिल्ली और आसपास के इलाके से निकल नहीं पाती.
ऊपर से सर्दियों में हवा की गति भी थोड़ी धीमी हो जाती है. इसके अलावा पंजाब और हरियाणा की तरफ से आने वाली नॉर्थ वेस्टरली हवाएं वहां की प्रदूषित हवा को भी दिल्ली तक ले आती हैं लेकिन उन्हें यहां से बाहर जाने का मौका नहीं मिलता.
नॉर्थ इंडिया के उलट साउथ का इलाका पेनिन्सुलर प्लेट्यू है, जो तीन तरफ से पानी से घिरा ऊंची उठी हुई जमीन का हिस्सा होता है. ऊंची उठी जमीन हवा को दूर तक फैलने में मदद करती है. साथ ही यहां ईस्ट में ईस्टर्न घाट और वेस्ट वेस्टर्न घाट के जंगल का पहरा है. इनकी वजह से इस इलाके में अच्छी वेंटिलेशन होती है और प्रदूषित हवा हिन्द महासागर, अरबियन सी और बंगाल की खाड़ी से आने वाली शुद्ध हवा से बदल जाती है.
तीनों तरफ से पानी से घिरा होने के कारण यहां हवा का बहाव बहुत ज्यादा रहता है. अक्टूबर के एकदम पहले आने वाले साउथ वेस्ट मॉनसून सीजन के दौरान इस इलाके में पानी की तरफ से तेज हवाएं आती हैं. ये हवाएं अपने साथ प्रदूषित हवा को भी बहा ले जाती हैं.
अक्टूबर से दिसंबर के बीच आने वाला नॉर्थ ईस्ट मॉनसून, जो नार्थ ईस्ट से साउथ वेस्ट तक आने वाली हवाओं की वजह से आता है, प्रदूषण को कम करने में और भी मदद करता है. इसपर वेस्टर्न और ईस्टर्न घाट के घने जंगल तो अपना काम करते ही रहते हैं. ये सभी कारण मिलकर दक्षिण का AQI उत्तर भारत के मुकाबले कम रखते हैं.