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TUCC ने 12 फरवरी की हड़ताल से बनाई दूरी.
12 फरवरी 2026 को प्रस्तावित देशव्यापी आम हड़ताल से पहले बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. ट्रेड यूनियन कोऑर्डिनेशन सेंटर (TUCC) ने इस हड़ताल से खुद को अलग कर लिया है. संगठन ने इसे राजनीति से प्रेरित और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताते हुए साफ किया कि मजदूरों की आवाज सड़क से नहीं, संवाद की मेज से उठनी चाहिए.
संगठन का कहना है कि यह आंदोलन मजदूर हित से ज्यादा राजनीतिक एजेंडों से प्रेरित है. TUCC ने साफ शब्दों में कहा कि वह इस प्रस्तावित हड़ताल का हिस्सा नहीं बनेगा.
TUCC का मानना है कि देश इस समय आर्थिक स्थिरता, औद्योगिक विस्तार और रोजगार सृजन की दिशा में आगे बढ़ रहा है. ऐसे में बड़े पैमाने पर हड़ताल जैसे कदम उद्योगों पर नकारात्मक असर डालते हैं और श्रमिकों की आय और रोजगार पर जोखिम पैदा करते हैं. संगठन का कहना है कि दशकों से चली आ रही “संवाद और वार्ता” की परंपरा को कमजोर करना मजदूर हित में नहीं है.
जहां कुछ यूनियनें चार नए श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) को वापस लेने की मांग कर रही हैं, वहीं TUCC इन्हें प्रगतिशील और आधुनिक सुधार मानता है.
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संगठन का दावा है कि वर्षों से केंद्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा उठाई गई कई मांगें इन संहिताओं में शामिल की गई हैं.
कुछ संगठनों ने MGNREGA में संशोधनों और “विकसित भारत ग्राम योजना” को लेकर सवाल उठाए हैं. TUCC ने इन आपत्तियों को “भ्रामक” बताया है. उसका कहना है कि:
राज्यों के वित्तीय योगदान को 10% से बढ़ाकर 40% करने को भी TUCC ने आत्मनिर्भर मॉडल की दिशा में कदम बताया.
विद्युत संशोधन विधेयक, केंद्रीय बीज अधिनियम, अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ संभावित मुक्त व्यापार समझौते, तथा कुछ सार्वजनिक उपक्रमों में रणनीतिक विनिवेश इन सबका विरोध कई यूनियनों ने किया है. लेकिन TUCC इसे अलग नजर से देखता है.
संगठन का मानना है कि ये पहल बुनियादी ढांचे में सुधार और नए अवसर खोलने के लिए जरूरी है. TUCC का कहना है कि भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना समय की मांग है.
TUCC का तर्क है कि अक्सर हड़ताल का सीधा असर मजदूरों की दैनिक आय पर पड़ता है. कई असंगठित और ठेका श्रमिकों को एक दिन की मजदूरी का नुकसान उठाना पड़ता है. संगठन का मानना है कि विघटनकारी कदमों के बजाय निरंतर बातचीत और नीति सुधार दीर्घकालिक समाधान देते हैं.
TUCC ने अपने बयान में ‘राष्ट्रहित’ और ‘रचनात्मक सहभागिता’ पर जोर दिया है. उसका कहना है कि जब देश आर्थिक विकास की गति पकड़ रहा हो, तब व्यापक बंद और हड़ताल से उद्योग, सेवा क्षेत्र और छोटे कारोबार प्रभावित होते हैं.
संगठन खुद को “राष्ट्रवादी और जिम्मेदार ट्रेड यूनियन” बताते हुए कहा कि वह सुधारोन्मुखी पहल और औद्योगिक विकास का समर्थन करेगा.
अब सवाल यह है कि जब एक बड़ा संगठन इस हड़ताल से अलग हो चुका है, तो उसका असर कितना व्यापक होगा? लेकिन कहा जा सकता है कि किसी भी देशव्यापी बंद की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि कितनी बड़ी यूनियनें और औद्योगिक क्षेत्र उसमें शामिल होते हैं.