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आज हम बात कर रहे हैं भारत के एक ऐसे महान दानवीर की, जिन्होंने अपनी कमाई से न सिर्फ खुद का नाम बनाया, बल्कि समाज की भलाई के लिए अपना सब कुछ दान कर दिया. उनका नाम है जमशेदजी जीजाभाई. वह 19वीं सदी के एक बहुत बड़े व्यापारी और समाज सुधारक थे, जिनकी दरियादिली से अंग्रेज भी इतने प्रभावित हुए कि उन्हें 'नाइट' (Sir) और 'बैरोनेट' की उपाधि से सम्मानित किया. वह यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय थे.
जमशेदजी का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि उस पैसे से दूसरों की जिंदगी बदलना है.
जमशेदजी जीजाभाई का जन्म 15 जुलाई 1783 को मुंबई के एक साधारण पारसी परिवार में हुआ था. बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया, जिसके बाद उनके मामा ने उन्हें पाला. ज्यादा पढ़े-लिखे न होने के बावजूद, उन्होंने अपनी मेहनत और तेज दिमाग से व्यापार की दुनिया में बहुत कम उम्र में ही अपनी जगह बना ली.
उन्होंने सिर्फ 15 साल की उम्र में बिजनेस शुरू किया. अपने मामा के साथ चीन जाकर उन्होंने कपास और अफीम का व्यापार सीखा और जल्द ही अपनी खुद की कंपनी बना ली. उनकी ईमानदारी की वजह से अंग्रेज और भारतीय व्यापारी, दोनों ही उन पर बहुत भरोसा करते थे. देखते ही देखते वह बॉम्बे के सबसे अमीर व्यापारियों में गिने जाने लगे.
जमशेदजी जितना कमाते थे, उतना ही दान भी करते थे. उन्होंने अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज की भलाई में लगा दिया.
कहा जाता है कि उन्होंने अपने जीवन में लाखों रुपये दान किए, जो उस समय एक बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी.
उनकी इसी दरियादिली और समाज सेवा को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कई सम्मान दिए. 1842 में उन्हें 'नाइट' (Sir) की उपाधि मिली और 1857 में वे 'बैरोनेट' की उपाधि पाने वाले पहले भारतीय बने.
14 अप्रैल 1859 को जमशेदजी जीजाभाई इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनके बनाए अस्पताल और स्कूल आज भी लाखों लोगों की सेवा कर रहे हैं और उनकी विरासत को जिंदा रखे हुए हैं.