रुपये की 'बेकाबू' गिरावट पर SBI Research की बड़ी चेतावनी, RBI से की बड़े पैमाने पर दखल देने की मांग!

एसबीआई रिसर्च (SBI Research) ने भारतीय रुपये में आ रही रिकॉर्ड गिरावट पर चिंता जताते हुए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से तुरंत और बड़े पैमाने पर दखल देने की मांग की है. रिपोर्ट के मुताबिक, रुपये की यह गिरावट देश के मजबूत आर्थिक आंकड़ों (फंडामेंटल्स) से मेल नहीं खाती और इसकी रफ्तार जरूरत से ज्यादा तेज है.
रुपये की 'बेकाबू' गिरावट पर SBI Research की बड़ी चेतावनी, RBI से की बड़े पैमाने पर दखल देने की मांग!

एसबीआई रिसर्च ने अपनी ताजा रिपोर्ट में डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की गिरती कीमत पर गंभीर चिंता व्यक्त की है. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)

एसबीआई रिसर्च ने अपनी ताजा रिपोर्ट में डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की गिरती कीमत पर गंभीर चिंता व्यक्त की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के दिनों में रुपये की गिरावट की रफ्तार बेहद हैरान करने वाली और 'लापरवाह' (Reckless) रही है.

आंकड़ों के मुताबिक, रुपये को 90 रुपये प्रति डॉलर से गिरकर 95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंचने में महज 152 दिनों का बेहद कम समय लगा. इतना ही नहीं, बीते 20 मई को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.83 रुपये के रिकॉर्ड निचले स्तर पर भी जा पहुंचा था. एसबीआई रिसर्च का मानना है कि रुपये की यह कमजोरी भारत की मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था की स्थिति को बयां नहीं करती, बल्कि यह जरूरत से ज्यादा गिर चुका है.

मजबूत फंडामेंटल्स के बाद भी क्यों गिर रहा रुपया?

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत के व्यापक आर्थिक संकेतक (मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स) अभी भी काफी मजबूत हैं. इसके बावजूद अन्य वैश्विक मुद्राओं की तुलना में भारतीय रुपया डॉलर के सामने अधिक कमजोर साबित हो रहा है.

विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की इस कमजोरी के पीछे केवल अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना ही एकमात्र कारण नहीं है. इसके पीछे दो बड़े वैश्विक और घरेलू कारण जिम्मेदार हैं:

1- पश्चिम एशिया में तनाव: पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी युद्ध और तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर निवेशक जोखिम लेने से बच रहे हैं.

2- विदेशी फंड्स की भारी बिकवाली: इस भू-राजनीतिक तनाव के शुरू होने के बाद से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार से बड़े पैमाने पर पैसा निकाला है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान भारत से करीब 22.7 अरब डॉलर (USD 22.7 billion) की इक्विटी आउटफ्लो (पूंजी की निकासी) दर्ज की गई है.

आरबीआई के पास हैं पर्याप्त 'हथियार'

एसबीआई रिसर्च का कहना है कि रुपये की इस एकतरफा गिरावट को रोकने के लिए रिजर्व बैंक को बाजार में बड़े पैमाने पर कदम बढ़ाना चाहिए. अच्छी बात यह है कि केंद्रीय बैंक के पास इस स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं.

हालांकि, 27 फरवरी, 2026 से अब तक भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में करीब 47 अरब डॉलर की कमी आई है, लेकिन इसके बावजूद देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 680 अरब डॉलर (USD 680 billion) के बेहद मजबूत स्तर पर बना हुआ है. यह सुरक्षित कोष आरबीआई को मुद्रा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने और रुपये को स्थिरता देने के लिए पूरी छूट देता है. रिपोर्ट में पिछले उदाहरणों का हवाला देते हुए बताया गया है कि जब भी केंद्रीय बैंक ने बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप किया है, रुपये में मजबूती वापस लौटी है.

आगामी एमपीसी बैठक और ब्याज दरें

आर्थिक अनिश्चितताओं, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और ईंधन के दामों में बढ़ोतरी के कारण देश में महंगाई का खतरा एक बार फिर मंडराने लगा है. इन परिस्थितियों को देखते हुए एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अपनी आगामी मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में ब्याज दरों (Policy Rates) में कोई बदलाव नहीं करेगा, यानी स्टेटस को (यथास्थिति) बनाए रखेगा.

लेकिन ब्याज दरों को स्थिर रखने के साथ-साथ, आरबीआई को अपने अन्य सभी उपलब्ध वित्तीय टूल्स का इस्तेमाल करके करेंसी मार्केट की इस अत्यधिक अस्थिरता को रोकना होगा, ताकि रुपये का मूल्य देश की वास्तविक आर्थिक ताकत के अनुसार बना रहे.

Conclusion

एसबीआई रिसर्च की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि रुपये की मौजूदा कमजोरी देश की आंतरिक कमजोरी नहीं, बल्कि वैश्विक हालातों और विदेशी निवेशकों के डर का नतीजा है. चूंकि भारत के पास 680 अरब डॉलर का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, इसलिए अब समय आ गया है कि आरबीआई बाजार में उतरकर बड़े कदम उठाए. रुपये को इस तरह रिकॉर्ड निचले स्तरों पर खुला छोड़ने से देश के आयात बिल और महंगाई पर बुरा असर पड़ सकता है.

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