अपनी शर्तों पर जिएगा भारत, तेल से लेकर तालमेल तक सिर्फ 'स्वदेशी' फैसला! म्यूनिख में विदेश मंत्री एस जयशंकर की दोटूक

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन 2026 में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' पर बड़ा बयान दिया है. जानिए रूस-अमेरिका के बीच भारत की स्वतंत्र ऊर्जा नीति का असली सच.
अपनी शर्तों पर जिएगा भारत, तेल से लेकर तालमेल तक सिर्फ 'स्वदेशी' फैसला! म्यूनिख में विदेश मंत्री एस जयशंकर की दोटूक

विदेश मंत्री एस जयशंकर (इमेज सोर्स -/X/@DrSJaishankar)

दुनिया के मंच पर जब भी भारत के फैसलों की बात आती है, तो पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी होती हैं कि नई दिल्ली किसके पाले में खड़ी है. शनिवार को म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन 2026 में एक बार फिर यही सवाल उठा. सवाल था कि क्या अमेरिका के साथ हालिया व्यापार समझौता भारत को रूस से दूरी बनाने पर मजबूर कर देगा. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस पर जो जवाब दिया, उसने न केवल भारत का रुख साफ कर दिया, बल्कि दुनिया को यह संदेश भी दे दिया कि भारत अपने फैसले खुद लेना जानता है.

विदेश मंत्री जयशंकर ने बड़ी बेबाकी से कहा कि भारत अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' यानी 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है. यह कोई आज की बात नहीं है, बल्कि यह हमारे इतिहास और विकास का हिस्सा है. यह एक ऐसी सोच है जो भारत की रग-रग में बसी है और देश के हर राजनीतिक दल की भी यही राय है.

तेल का खेल और भारत का अपना गणित

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जब विदेश मंत्री एस जयशंकर से ऊर्जा सुरक्षा और रूस से तेल खरीदने को लेकर सवाल हुआ, तो उन्होंने इसे पूरी तरह प्रोफेशनल नजरिए से समझाया. उन्होंने कहा कि दुनिया का तेल बाजार आज बहुत उलझा हुआ और गतिशील है. भारत की तेल कंपनियां भी यूरोप या दुनिया के किसी भी अन्य हिस्से की कंपनियों की तरह ही काम करती हैं. वे उपलब्धता देखती हैं, कीमत देखती हैं और खतरे (Risk) का अंदाजा लगाती हैं.

कंपनियां वही फैसला लेती हैं जो उनके और देश के हित में सबसे बेहतर होता है. जयशंकर ने साफ किया कि बदलती दुनिया में हर देश अपनी गणना और गुणा-भाग कर रहा है. हम जरूरी नहीं कि हर मुद्दे पर अपने पार्टनर से सहमत हों, लेकिन हम बातचीत और साझा हितों को तलाशने में यकीन रखते हैं.

स्वतंत्र सोच से नहीं होगा कोई समझौता

एस जयशंकर ने अपनी बात को एक बेहद कड़े और स्पष्ट संदेश के साथ खत्म किया. उन्होंने कहा कि अगर आपके सवाल का निचोड़ यह है कि क्या मैं स्वतंत्र सोच के साथ अपने फैसले लूंगा? और क्या मेरे फैसले कभी आपकी या किसी और की सोच से अलग हो सकते हैं? तो मेरा जवाब है- हां, ऐसा बिल्कुल हो सकता है. भारत अपनी जरूरतों को किसी दूसरे के चश्मे से नहीं देखता.

सुरक्षा के मोर्चे पर भारत की बढ़ती भूमिका

म्यूनिख में विदेश मंत्री जयशंकर ने न केवल ऊर्जा पर बात की, बल्कि जी7 (G7) देशों के विदेश मंत्रियों के साथ मुलाकात कर वैश्विक सुरक्षा पर भी चर्चा की. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के 'UN80' एजेंडे के प्रति भारत का समर्थन दोहराया. भारत आज दुनिया में 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' यानी मुसीबत के समय सबसे पहले पहुंचने वाला देश बन चुका है. समुद्र के रास्तों की सुरक्षा, पोर्ट सिक्योरिटी और समुद्र के नीचे बिछी केबल इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में भारत की भूमिका आज दुनिया मान रही है.

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भी साफ की तस्वीर

इससे पहले 9 फरवरी को विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भी भारत की ऊर्जा नीति को लेकर इसी तरह की स्पष्टता दी थी. उन्होंने कहा था कि चाहे सरकार हो या बिजनेस, हमारा हर फैसला 'नेशनल इंटरेस्ट' यानी राष्ट्रीय हित से ही प्रेरित होगा. भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है और हमें अपने उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करनी है. अगर हम आयात पर निर्भर हैं, तो हमें महंगाई का भी ध्यान रखना पड़ता है.

एक देश पर निर्भरता नहीं, विविधता ही सुरक्षा

मिस्री ने बताया कि भारत अपनी जरूरतों के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं है. हम दर्जनों देशों से कच्चा तेल मंगवाते हैं. बाजार के हालात के हिसाब से यह स्रोत बदलते रहते हैं. हमारी पॉलिसी के तीन मुख्य स्तंभ हैं:

  • पर्याप्त उपलब्धता
  • वाजिब कीमत
  • सप्लाई का भरोसा

भारत आज वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक 'स्टेबलाइजिंग फैक्टर' यानी स्थिरता लाने वाली ताकत है. हम जितना ज्यादा अपने स्रोतों में विविधता लाएंगे, उतने ही ज्यादा सुरक्षित रहेंगे.

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