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राजस्थान के सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का एक बड़ा सिंडिकेट उजागर हुआ है. यह मामला राजस्थान अक्षय ऊर्जा निगम (RRECL) से जुड़ा है, जहां बिजली बचाने के लिए शुरू किए गए 'रूफटॉप सोलर प्रोजेक्ट' की आड़ में करोड़ों रुपये का गबन कर लिया गया. इस पूरे खेल में सबसे बड़ी भूमिका 'फर्जी बैंक गारंटी' की रही, जिसके जरिए सरकारी सिस्टम की आंखों में धूल झोंकी गई.
आरोपी ने रूफटॉप सोलर प्रोजेक्ट के टेंडर हासिल करने के लिए जाली दस्तावेज पेश किए थे. चौंकाने वाली बात यह है कि आरोपी पहले से ही CBI द्वारा दर्ज एक अन्य मामले में इंदौर की जेल में बंद था, जहां से पुलिस ने उसे प्रोडक्शन वारंट पर गिरफ्तार किया है. आइए, इस पूरे घोटाले और पुलिस की कार्रवाई को विस्तार से समझते हैं.
राजस्थान सरकार ने सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए रूफटॉप सोलर प्रोजेक्ट के तहत टेंडर जारी किए थे.
टेंडर की प्रक्रिया: RRECL ने दो अलग-अलग टेंडर जारी किए थे. इन टेंडरों को हासिल करने के लिए कंपनियों को 'बैंक गारंटी' जमा करानी थी, जो एक तरह की वित्तीय सुरक्षा (Financial Security) होती है.
फर्जीवाड़ा: मुख्य आरोपी महेश भाई ने टेंडर हासिल करने के लिए कुल ₹65.67 करोड़ की 5 बैंक गारंटी विभाग में जमा कराईं.
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घोटाले की परतें तब खुलना शुरू हुईं जब निगम के सहायक लेखाधिकारी (Assistant Accounts Officer) विवेक मीणा ने इन बैंक गारंटियों के सत्यापन (Verification) की प्रक्रिया शुरू की.
जांच में खुलासा: जब संबंधित बैंकों से इन गारंटियों की पुष्टि की गई, तो पता चला कि ये सभी दस्तावेज पूरी तरह से फर्जी थे.
गबन की राशि: फर्जी दस्तावेजों के आधार पर टेंडर हासिल कर आरोपी ने करीब ₹46.30 करोड़ की राशि का गबन कर लिया. इसके बाद अशोक नगर थाने में मामला दर्ज कराया गया.
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इसे समझना जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसे गबन न हों:
FDR vs BG: FD में पैसा ब्लॉक होता है, जबकि बैंक गारंटी में बैंक भरोसा देता है कि अगर कंपनी काम पूरा नहीं करती, तो बैंक वह राशि चुकाएगा.
लूपहोल: कई बार विभाग केवल 'कागज' देख लेते हैं और बैंक के SFMS (Structured Financial Messaging System) के जरिए रसीद की ऑनलाइन पुष्टि नहीं करते. आरोपी ने इसी सुस्ती का फायदा उठाकर जाली कागज तैयार किए.
मुख्य आरोपी महेश भाई कोई छोटा-मोटा खिलाड़ी नहीं है. वह पहले से ही केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के रडार पर था.
CBI केस: आरोपी के खिलाफ CBI भोपाल ने पहले ही एक केस दर्ज किया था, जिसके सिलसिले में वह इंदौर में न्यायिक हिरासत में बंद था.
प्रोडक्शन वारंट: जयपुर की अशोक नगर थाना पुलिस को जब इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने अदालत से 'प्रोडक्शन वारंट' लिया. इसके बाद पुलिस की एक टीम इंदौर पहुंची और आरोपी को वहां से गिरफ्तार कर जयपुर लाया गया.
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सौर ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में इतना बड़ा गबन न केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि उन ईमानदार कंपनियों के लिए भी रास्ते बंद करता है जो सही तरीके से टेंडर प्रक्रिया में भाग लेती हैं. महेश भाई की गिरफ्तारी इस मामले की पहली बड़ी सफलता है, लेकिन अभी इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों का पकड़ा जाना बाकी है.
1- RRECL गबन मामले की कुल राशि कितनी है?
आरोपी ने करीब ₹46.30 करोड़ का गबन किया है.
2- आरोपी ने टेंडर हासिल करने के लिए क्या तरीका अपनाया?
उसने ₹65.67 करोड़ की 5 जाली बैंक गारंटी निगम में जमा कराई थीं.
3- बैंक गारंटी फर्जी होने का पता किसने लगाया?
RRECL के सहायक लेखाधिकारी विवेक मीणा ने जांच के बाद यह केस दर्ज कराया था.
4- प्रोडक्शन वारंट क्या होता है?
जब कोई अपराधी पहले से किसी दूसरी जेल में बंद होता है, तो पुलिस उसे दूसरे केस की जांच के लिए अदालत से अनुमति लेकर अपनी कस्टडी में लेती है, इसे प्रोडक्शन वारंट कहते हैं.
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