IBC ने बदला डिफॉल्टरों का व्यवहार; NeSL प्रमुख देबज्योति रे चौधरी बोले- अब दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही हो रहे समझौते

देबज्योति रे चौधरी ने कहा कि NeSL का Record of Default Framework आने वाले सुधारों और नई व्यवस्थाओं को समर्थन देने के लिए तैयार है. उनका मानना है कि सूचना आधारित और तकनीक समर्थित ढांचा ही भविष्य में दिवाला समाधान प्रक्रिया को और प्रभावी बनाएगा.
IBC ने बदला डिफॉल्टरों का व्यवहार; NeSL प्रमुख देबज्योति रे चौधरी बोले- अब दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही हो रहे समझौते

National e-Governance Services Ltd. (NeSL) के MD एवं CEO देबज्योति रे चौधरी. (फाइल फोटो)

नई दिल्ली में आयोजित "IBC & NCLT @10- Celebrating a Decade of Insolvency Reforms" कार्यक्रम में National e-Governance Services Ltd. (NeSL) के MD एवं CEO देबज्योति रे चौधरी ने कहा कि Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) ने केवल दिवाला समाधान की प्रक्रिया को नहीं बदला, बल्कि देश में डिफॉल्टरों के व्यवहार पर भी बड़ा असर डाला है.

उन्होंने कहा कि IBC लागू होने के बाद कर्जदारों के बीच समय रहते समाधान निकालने की प्रवृत्ति बढ़ी है. अब कई मामलों में औपचारिक दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही बातचीत और समझौते के जरिए समाधान निकल रहा है.

देबज्योति रे चौधरी के मुताबिक, IBC ने कर्जदारों को यह संदेश दिया है कि डिफॉल्ट की स्थिति में मामले को अनिश्चित काल तक टालना आसान नहीं होगा. यही वजह है कि बड़ी संख्या में विवाद शुरुआती चरण में ही सुलझने लगे हैं.

सूचना आधारित सिस्टम ने बढ़ाया भरोसा

उन्होंने कहा कि Information Utilities ने कर्जदाताओं और कर्जदारों के बीच सूचना संबंधी असमानता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इससे वित्तीय संस्थानों का भरोसा मजबूत हुआ है और समाधान प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी बनी है.

NeSL इसी दिशा में काम करने वाली संस्था है, जो कर्जदाताओं से वित्तीय जानकारी लेकर उसे कर्जदारों से सत्यापित कराती है और प्रमाणित रिकॉर्ड उपलब्ध कराती है.

एक डिफॉल्ट की जानकारी सभी Creditors तक पहुंचती है

देबज्योति रे चौधरी ने बताया कि NeSL की व्यवस्था के तहत यदि किसी कर्जदार द्वारा किसी एक कर्जदाता के भुगतान में डिफॉल्ट किया जाता है, तो इसकी जानकारी अन्य संबंधित कर्जदाताओं तक भी पहुंच जाती है.

इससे कर्जदार पर वित्तीय दायित्वों को पूरा करने का दबाव बढ़ता है और कई मामलों में समाधान की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ती है.

32,000 मामलों में शुरुआती स्तर पर ही निकला समाधान

उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में 32,000 से अधिक ऐसे आवेदन रहे, जिनमें करीब ₹14 लाख करोड़ के कर्ज से जुड़े मामलों का समाधान NCLT में औपचारिक प्रवेश से पहले ही हो गया. उनके मुताबिक यह IBC द्वारा लाए गए व्यवहारिक बदलाव का बड़ा उदाहरण है.

डिजिटल सुधारों पर काम जारी

NeSL प्रमुख ने कहा कि संस्था अब स्टाम्प ड्यूटी को इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में लाने की दिशा में काम कर रही है. इसके अलावा E-Surety Bond जैसे डिजिटल समाधान भी विकसित किए जा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि भविष्य में Insolvency Ecosystem को और मजबूत बनाने के लिए डिजिटल रिकॉर्ड और प्रमाणित वित्तीय सूचना की भूमिका लगातार बढ़ेगी.

भविष्य के सुधारों को समर्थन देने के लिए तैयार

देबज्योति रे चौधरी ने कहा कि NeSL का Record of Default Framework आने वाले सुधारों और नई व्यवस्थाओं को समर्थन देने के लिए तैयार है. उनका मानना है कि सूचना आधारित और तकनीक समर्थित ढांचा ही भविष्य में दिवाला समाधान प्रक्रिया को और प्रभावी बनाएगा.

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